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उत्तर प्रदेश: लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के लिए उठ खड़े होने की चुनौती

संभल , फतेहपुर सीकरी, हाथरस, फिरोजाबाद, एटा, मैनपुरी, आगरा, बदायूं और आंवला लोकसभा सीट ऐसी हैं जहां इस बार यादव परिवार की सियासी ताकत आंकी जानी है। इन सीटों पर मतदाताओं की संख्या सपा के लिए संजीवनी साबित हो सकती है लेकिन भाजपा की चुनौती तगड़ी है।
Written by: अंशुमान शुक्ल | Edited By: Bishwa Nath Jha
नई दिल्ली | Updated: May 03, 2024 11:48 IST
उत्तर प्रदेश  लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के लिए उठ खड़े होने की चुनौती
अखिलेश यादव । फोटो -(इंडियन एक्सप्रेस)
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लगातार 2014 के लोकसभा चुनाव से हार का सामना करती आ रही समाजवादी पार्टी के सामने इस लोकसभा चुनाव में उठ खड़े होने की चुनौती है। बीते दस वर्षों में कांग्रेस और बहुजन समाज पार्टी के साथ गठबंधन करने के बाद भी सपा जीत का स्वाद चखने से मरहूम रह गई। ऐसा ही हाल उसके गठबंधन के साथियों का रहा। इस बार के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस का हाथ थाम कर अखिलेश यादव जीत की आस लगाए चुनावी मैदान में हैं।

उत्तर प्रदेश की संभल, फतेहपुर सीकरी, हाथरस, फिरोजाबाद, एटा, मैनपुरी, आगरा, बदायूं और आंवला लोकसभा सीटें ऐसी हैं जहां इस बार यादव परिवार की सियासी ताकत आंकी जानी है। इन सीटों पर मतदाताओं की संख्या समाजवादी पार्टी के लिए संजीवनी साबित हो सकती है लेकिन भारतीय जनता पार्टी के सियासी रसूख से मुकाबला कर पाना न ही कांग्रेस के लिए आसान है और न ही समाजवादी पार्टी के लिए।

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पहले बात संभल की। कभी ये सीट समाजवादी पार्टी के खाते में शफीकुर्रहमान बर्क जीत कर लाया करते थे। उनके निधन के बाद अखिलेश ने जियाउर्रहमान को यहां से मैदान में उतारा है। 2014 में इस सीट को भाजपा ने सपा से छीना था। इस बार परमेश्वर लाल सैनी इस मुसलिम बहुल्य सीट पर अपनी किस्मत आजमाने सियासी मैदान में उतरे हैं। फतेहपुर सीकरी को राजकुमार चाहर ने करीब पांच लाख मतों से पिछली बार जीत कर इसे भाजपा के पाले में डाली थी। इस बार भी पार्टी ने उन्हें मैदान में उतारा है।

कांग्रेस ने यहां से रामनाथ सिकरवार को उतार कर क्षत्रिय बिरादरी के मतों को अपने पाले में करने की कोशिश की है। जबकि बहुजन समाज पार्टी ने राम निवास शर्मा को टिकट दे कर ब्राह्मण मतदाताओं पर डोरे डाले हैं। तीनों दलों ने यहां मुकाबला त्रिकोणीय बना दिया है। हाथरस में भाजपा ने अपने सांसद राजवीर सिंह दिलेर का टिकट काट कर योगी सरकार के राज्यमंत्री अनूप वाल्मीकि को प्रत्याशी बनाया है।

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जिसकी वजह से पार्टी यहां भितरघात की आशंका से दोहरी हुई जा रही है। सपा ने जसवीर वाल्मीकि को यहां से प्रत्याशी बनाया है जबकि बसपा ने हेमबाबू धनगर पर भरोसा जताया है। अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित इस सीट पर मुकाबला त्रिकोणीय होने के चलते कोई भी सियासी दल अपनी जीत के प्रति पूरी तरह आश्वस्त नजर नहीं आ रहा है।

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फिरोजाबाद को कभी सपा का गढ़ माना जाता था। प्रो रामगोपाल यादव के साहबजादे अक्षय यादव ने 2014 में इस सीट पर जीत दर्ज कर अपनी सियासी पारी का आगाज किया था। 2019 के लोकसभा चुनाव में शिवपाल यादव के यहां से निर्दलीय चुनाव मैदान में उतरने के चलते अक्षय को हार का सामना करना पड़ा था और ये सीट भाजपा के पाले में चली गई थी। इस बार अक्षय को यहां से खासी आस है। भाजपा ने यहां से विश्वदीप सिंह को चुनाव मैदान में उतारा है। जबकि बसपा ने चौ बशीर को टिकट दे कर यहां मुकाबले को दिलचस्प बना दिया है।

आगरा में भाजपा ने एसपी सिंह बघेल को फिर टिकट दिया है। पिछली बार भी वो यहां से सांसद चुने गए थे। बसपा ने पूजा अमरोही को टिकट दे कर आगरा के सियासी रंग को नीला करने की कोशिश की है। जबकि सपा ने सुरो चंद्र कर्दम को साइकिल की सवारी दी है। मैनपुरी को हमेशा से समाजवादी पार्टी का गढ़ माना जाता रहा है। डिम्पल यादव यहां से सपा के टिकट पर मैदान में हैं।

भाजपा ने जयवीर सिंह को टिकट दे कर मैनपुरी फतह का ख्वाब देखा है जबकि बसपा ने यादव मतों में सेंधमारी के लिए शिव प्रसाद यादव को चुनाव मैदान में उतारा है। एटा में कल्याण सिंह के पुत्र राजवीर सिंह जीत की हैट्रिक लगाने के उद्देश्य से चुनाव मैदान में हैं। उनका मुकाबला सपा के देवेश शाक्य और बसपा के मो इरफान से है।

बदायूं में भाजपा ने अपनी मौजूदा सांसद संघमित्र मौर्य का टिकट काट कर दुर्विजय सिंह शाक्य को टिकट दिया है। लंबे समय तक सपा का गढ़ रही इस संदीय सीट पर सपा ने शिवपाल यादव के पुत्र आदित्य यादव को मैदान में उतारा है। जबकि बसपा ने मुसलिम खां को टिकट दे कर यहां मुकाबले को त्रिकोणीय बना दिया है।

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