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BJP से किस डर के चलते स्पीकर की कुर्सी मांग रहे TDP और JDU, जानें क्यों इतनी अहम है यह कुर्सी

Lok Sabha Results 2024: आज एनडीए के सभी दल सरकार बनाने के लिए दिल्ली में अहम बैठक करने वाले हैं जिसमें TDP और JDU दोनों ही बीजेपी से सरकार में भागीदारी के लिए कई अहम पद मांग सकती हैं।
Written by: Krishna Bajpai
नई दिल्ली | Updated: June 05, 2024 15:41 IST
bjp से किस डर के चलते स्पीकर की कुर्सी मांग रहे tdp और jdu  जानें क्यों इतनी अहम है यह कुर्सी
NDA Government: स्पीकर की कुर्सी को लेकर रस्साकशी (सोर्स - PTI/File)
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Lok Sabha Chunav Results 2024: लोकसभा चुनाव 2024 के चुनाव नतीजे घोषित होने के बाद एनडीए सरकार के गठन की प्रक्रिया शुरू हो गई है। बीजेपी के बहुमत में न होने के चलते एनडीए के घटक दलों से बीजेपी को काफी समझौते करने पड़ सकते हैं। इसमें सबसे अहम भूमिका टीडीपी और जेडीयू की होगी। ऐसे में दोनों ही दलों के नेता यानी बिहार सीएम नीतीश कुमार और चंद्रबाबू नायडू एनडीए की बैठक होने के लिए दिल्ली पहुंच गए हैं।

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एनडीए की बैठक के दौरान सरकार बनाने में सबसे अहम यानी टीडीपी और जेडीयू जैसे दोनों ही दल कई मंत्री पद मांग और सरकार में भागीदारी मांग सकते हैं। इन सभी में सबसे दिलचस्प पद स्पीकर का है और सूत्रों का कहना है कि दोनों ही दल स्पीकर का पद अपने-अपने कोटे में रखने की मांग उठा सकते हैं और एनडीए की आज की बैठक में यह मुद्दा उठ सकता है। इसकी वजह भी बीजेपी से इन दोनों ही दलों को सताने वाला बड़ा डर है।

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क्यों अहम है स्पीकर का पद

सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबक जेडीयू और टीडीपी दोनों ही दलों ने यह मांग इसलिए उठाई हैं क्योंकि उन्हें भविष्य में अपनी ही पार्टी को विभाजन से बचाना चाहते हैं। स्पीकर की भूमिका दल-बदल वाले कानून के चलते सबसे अहम होती है।

इसीलिए दोनों ही दल यह स्पीकर का पद अपने कोटे में रखने के लिए एनडीए की बैठक में मोर्चा खोल सकते हैं। बता दें कि दल-बदल कानून को लेकर सुप्रीम कोर्ट के पास बेहद ही सीमित अधिकार है।

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महाराष्ट्र है सबसे बड़ा उदाहरण

ऐसे कई उदाहरण हैं कि जहां आरोप लगाए गए कि स्पीकर ने अयोग्यता वाली याचिकाओं पर फैसला करने में पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाया था।पिछले साल सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र विधानसभा अध्यक्ष राहुल नार्वेकर को सीएम एकनाथ शिंदे और उनके विधायकों के खिलाफ दलबल कार्यवाही करने का फैसला दिया था, लेकिन इन इन याचिकाओं पर सुनवाई में देरी के चलते पार्टी का विभाजन हो गया था।

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सत्तारूढ़ दल या गठबंधन के लिए अहम है स्पीकर की कुर्सी

इतना ही नहीं, लोकसभा के संवैधानिक और औपचारिक प्रमुख अध्यक्ष पद आम तौर पर सत्तारूठ गठबंधन के पास ही जाता है, उपाध्यक्ष का पद पारंपरिक रूप से विपक्षी दलों के सदस्य के पास जाता है। हालांकि अहम बात यह भी है कि लोकसभा के इतिहास में पहली बार 17वीं लोकसभा उपाध्यक्ष के चुनाव के बिना ही संपन्न हो गई थी।

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