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छलका दर्द: देश की नागरिक होने के बावजूूद मतदाता सूची में नाम शामिल नहीं

कोलकाता से 17 साल पहले पति के निधन के बाद वृंदावन आई अनिता दास की तरह ही हजारों विधवाएं ऐसी हैं जिन्हें परिवार ने ठुकरा दिया, समाज ने भी जगह नहीं दी और मतदाता पहचान पत्र नहीं होने के कारण अब लोकतंत्र के सबसे बड़े पर्व में भी उनकी सहभागिता नहीं है।
Written by: एजंसी | Edited By: Bishwa Nath Jha
नई दिल्ली | Updated: April 11, 2024 14:03 IST
छलका दर्द  देश की नागरिक होने के बावजूूद मतदाता सूची में नाम शामिल नहीं
प्रतीकात्मक तस्वीर। फोटो -(इंडियन एक्सप्रेस)।
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मेरी उम्र अब अस्सी साल हो गई है। इतने साल बहुत कोशिश की लेकिन अब इस उम्र में मतदाता के रूप में पहचान पाकर भी क्या करूंगी? दर- दर भटकने से अच्छा है कि आखिरी समय शांति से प्रभु के भजन में बिता दूं। यह कहना है वृंदावन में एक मंदिर में भजन के लिए अपनी बारी का इंतजार कर रही अनिता दास का।

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कोलकाता से 17 साल पहले पति के निधन के बाद वृंदावन आई अनिता दास की तरह ही हजारों विधवाएं ऐसी हैं जिन्हें परिवार ने ठुकरा दिया, समाज ने भी जगह नहीं दी और मतदाता पहचान पत्र नहीं होने के कारण अब लोकतंत्र के सबसे बड़े पर्व में भी उनकी सहभागिता नहीं है।

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मथुरा लोकसभा क्षेत्र में वृंदावन, राधाकुंड और गोवर्धन की तंग गलियों में कहीं भीख मांगती, कहीं तपती धूप में भंडारे की कतार में खड़ी तो कहीं मात्र दस रुपए के लिए चार घंटे भजन गाने के लिए अपनी बारी का इंतजार करती सफेद साड़ी में लिपटी ये महिलाएं किसी राजनीतिक दल का वोट बैंक नहीं हैं। लिहाजा राजनीतिक उदासीनता ही इनकी नियति है।

मथुरा के 18 लाख से अधिक मतदाताओं में इनकी संख्या एक प्रतिशत भी नहीं है। परिवार छोड़ा तो पहचान भी ये वहीं छोड़ आई। आश्रमों में रहने वाली इन महिलाओं में से नाममात्र के पास मतदाता के रूप में पहचान पत्र है लेकिन उम्र के आखिरी पड़ाव पर खड़ी इन अधिकांश महिलाओं का नाम किसी मतदाता सूची में दर्ज नहीं है।

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दास ने कहा कि मुझे पता है कि चुनाव हो रहे हैं। बंगाल की हालत भी गंभीर है लेकिन मैं यहां शांति से रहना चाहती हूं। ना तो वोट डालने में रूचि रह गई है और ना ही मतदाता पहचान पत्र बनवाने में। वहीं पति के निधन के बाद बहू की कथित प्रताड़ना से तंग आकर 15 साल पहले यहां आई महानंदा अपनी स्मृति पर जोर डालने की कोशिश करते हुए कहती हैं कि शायद दस साल पहले वोट डाला था। मेरे पास आधार कार्ड है लेकिन मतदाता पहचान पत्र नहीं है और बनवाने के लिए अब इधर किसको बोलूं?

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लेकिन 67 साल की गायत्री मुखर्जी को इसका मलाल है कि वह देश की नागरिक तो हैं लेकिन मतदाता नहीं। पति के न रहने के बाद इकलौती बेटी को कैंसर से खोने के कारण बेसहारा हुई मुखर्जी इलाज के लिए लिया गया कर्जा चुकाकर वृंदावन आई थीं। उन्होंने कहा कि पहले मैं किराए से रहती थी लेकिन हमेशा डर रहता था कि पास में थोड़ा बहुत जो भी सामान है, चोरी न हो जाये। इसके अलावा कदम- कदम पर अपमान होता था सो अलग।

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