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2014 के बाद से अब तक भ्रष्टाचार में फंसे विपक्षी दलों के 25 राजनेताओं ने ली BJP की शरण, इतने नेताओं को मिली राहत

ईडी के एक अधिकारी ने कहा कि उसके मामले अन्य एजेंसियों की एफआईआर पर आधारित हैं। “अगर अन्य एजेंसियां अपना मामला बंद कर देती हैं, तो ईडी के लिए आगे बढ़ना मुश्किल हो जाता है। फिर भी, हमने ऐसे कई मामलों में आरोपपत्र दायर किए हैं।' जिन मामलों में जांच चल रही है, जरूरत पड़ने पर कार्रवाई की जाएगी।''
Written by: दीप्‍त‍िमान तिवारी | Edited By: संजय दुबे
नई दिल्ली | Updated: April 03, 2024 12:34 IST
2014 के बाद से अब तक भ्रष्टाचार में फंसे विपक्षी दलों के 25 राजनेताओं ने ली bjp की शरण  इतने नेताओं को मिली राहत
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सत्ताधारी राजनेता अक्सर बोलते हैं कि कानून अपना काम करता है, जब तक कि यह राजनीति से प्रेरित न हो। 2014 के बाद से कथित भ्रष्टाचार के लिए केंद्रीय एजेंसियों की कार्रवाई का सामना करने वाले 25 प्रमुख राजनेता बीजेपी में शामिल हो चुके हैं। इनमें 10 कांग्रेस, एनसीपी और शिवसेना से चार-चार; टीएमसी से तीन; टीडीपी से दो; और एसपी और वाईएसआरसीपी से एक-एक हैं। इनमें से 23 मामलों में उनका राजनीतिक कदम राहत में बदल गया। द इंडियन एक्सप्रेस की एक जांच में इसका खुलासा हुआ।

तीन मामले बंद. 20 अन्य रुके हुए हैं या ठंडे बस्ते में हैं

पार्टी स्विच करने के बाद जांच एजेंसी की कार्रवाई अमूमन निष्क्रिय रही है। इस सूची में शामिल छह राजनेता आम चुनाव से कुछ हफ्ते पहले अकेले इसी साल बीजेपी में गए हैं। 2022 में द इंडियन एक्सप्रेस की एक जांच से पता चला था कि 2014 के बाद जब एनडीए सत्ता में आया तो कैसे प्रवर्तन निदेशालय (ED) और केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) ने 95 प्रतिशत प्रमुख विपक्षी राजनेताओं के खिलाफ कार्रवाई की। विपक्ष इसे "वॉशिंग मशीन" यानी वह तंत्र जिसके द्वारा भ्रष्टाचार के आरोपी राजनेताओं को अपनी पार्टी छोड़ने और बीजेपी में शामिल होने पर कानूनी परिणामों का सामना नहीं करना पड़ता है, कहता है।

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2009 में कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूपीए के दौर में भी ऐसा हुआ

ऐसा नहीं है कि यह नई परंपरा है। 2009 में कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूपीए के वर्षों में द इंडियन एक्सप्रेस की एक जांच में फ़ाइल नोटिंग से पता चला कि सीबीआई ने बसपा की मायावती और सपा के मुलायम सिंह यादव के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामलों में अपना रुख बदल दिया था, जब दोनों नेताओं को सत्तारूढ़ यूपीए के साथ अच्छे संबंध हो गए थे।

2022 और 2023 में जांच का मुख्य केद्र महाराष्ट्र रहा

नए निष्कर्षों से पता चलता है कि राज्य में 2022 और 2023 की राजनीतिक उथल-पुथल के दौरान केंद्रीय कार्रवाई का एक बड़ा हिस्सा महाराष्ट्र पर केंद्रित था। 2022 में एकनाथ शिंदे गुट ने शिवसेना से अलग होकर बीजेपी के साथ नई सरकार बना ली। एक साल बाद अजित पवार गुट एनसीपी से अलग हो गया और सत्तारूढ़ एनडीए गठबंधन में शामिल हो गया।

अजीत पवार और प्रफुल्ल पटेल के मामले भी बंद हो गये हैं

रिकॉर्ड बताते हैं कि एनसीपी गुट के दो शीर्ष नेताओं, अजीत पवार और प्रफुल्ल पटेल के सामने आए मामलों को बाद में बंद कर दिया गया था। कुल मिलाकर महाराष्ट्र के 12 प्रमुख राजनेता 25 की सूची में हैं, जिनमें से ग्यारह 2022 या उसके बाद बीजेपी में चले गए, जिनमें एनसीपी, शिवसेना और कांग्रेस के चार-चार शामिल हैं। इनमें से कुछ मामले गंभीर हैं।

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अजीत पवार का केस पहले बंद किया, फिर खोला, फिर बंद

अजीत पवार के मामले में मुंबई पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा (EOW) ने अक्टूबर 2020 में जब वह पिछली एमवीए सरकार का हिस्सा थे, एक क्लोजर रिपोर्ट दायर की। बीजेपी के सत्ता में लौटने पर मामले को फिर से खोलने की मांग की गई, लेकिन इस साल मार्च में फिर से एनडीए में शामिल होने के बाद फाइल बंद कर दी गई। ईओडब्ल्यू की कार्रवाई के आधार पर पवार के खिलाफ ईडी का मामला तब से निरर्थक हो गया है।

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फिर ऐसे मामले भी हैं जो खुले रहते हैं लेकिन केवल नाम के लिए, जिनमें कोई उल्लेखनीय प्रगति नहीं होती। उदाहरण के लिए सीबीआई 2019 से नारद स्टिंग ऑपरेशन मामले में कथित अपराध के समय सांसद रहे पश्चिम बंगाल के नेता प्रतिपक्ष सुवेंदु अधिकारी के खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए लोकसभा अध्यक्ष से मंजूरी का इंतजार कर रही है। अधिकारी 2020 में टीएमसी से बीजेपी में चले गए।

असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा और महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण के खिलाफ मामले भी अटके हुए हैं। हिमंता को 2014 में सारदा चिटफंड घोटाले में सीबीआई की पूछताछ और छापेमारी का सामना करना पड़ा था, लेकिन 2015 में उनके बीजेपी में शामिल होने के बाद से उनके खिलाफ मामला आगे नहीं बढ़ा है। चव्हाण इस साल बीजेपी में शामिल हो गए, जबकि आदर्श हाउसिंग मामले में सीबीआई और ईडी की कार्यवाही पर सुप्रीम कोर्ट की रोक लगी हुई है।

    25 मामलों में से केवल दो में कार्रवाई नहीं रुकी। इनमें पूर्व कांग्रेस सांसद ज्योति मिर्धा और पूर्व टीडीपी सांसद वाईएस चौधरी का है। दोनों नेताओं के बीजेपी में शामिल होने के बाद भी ईडी द्वारा ढील दिए जाने का कोई सबूत नहीं है। कम से कम अभी तक तो कोई सबूत नहीं मिला। सीबीआई, ईडी और आयकर विभाग से इस बारे में कमेंट मांगने पर उन्होंने द इंडियन एक्सप्रेस के सवालों का जवाब नहीं दिया।

    हालांकि, सीबीआई के एक अधिकारी ने कहा कि एजेंसी की सभी जांच "सबूतों पर आधारित" हैं। "जब भी सबूत मिलते हैं, उचित कार्रवाई की जाती है।" उन मामलों के बारे में पूछे जाने पर जहां आरोपी के पक्ष बदलने के बाद एजेंसी ने अपना रास्ता बदल लिया है, अधिकारी ने कहा: “कुछ मामलों में विभिन्न कारणों से कार्रवाई में देरी होती है। लेकिन वे खुले हैं।”

    ईडी के एक अधिकारी ने कहा कि उसके मामले अन्य एजेंसियों की एफआईआर पर आधारित हैं। “अगर अन्य एजेंसियां अपना मामला बंद कर देती हैं, तो ईडी के लिए आगे बढ़ना मुश्किल हो जाता है। फिर भी, हमने ऐसे कई मामलों में आरोपपत्र दायर किए हैं।' जिन मामलों में जांच चल रही है, जरूरत पड़ने पर कार्रवाई की जाएगी।''

    द इंडियन एक्सप्रेस की जांच से पता चला कि मामले को बंद करने से लेकर ठंडे बस्ते में डालने तक प्रवर्तन निदेशालय, सीबीआई और आईटी विभाग ने आरोपी के अपनी पार्टी बदलने और सत्तारूढ़ बीजेपी में जाने पर जांच का क्रम बदल दिया।

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