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राम आएंगे, क्या वोट भी लाएंगे? इतना सरल नहीं ये गणित, बीजेपी के सामने बड़ी चुनौती

अब बीजेपी इस मंदिर पॉलिटिक्स की राह पर जरूर चलती है, लेकिन उसका ये मानकर चलना कि इसी राम मंदिर के जरिए उसे 400 प्लस सीटें मिल जाएंगी, ये गलत है।
Written by: Sudhanshu Maheshwari
नई दिल्ली | Updated: January 25, 2024 17:25 IST
राम आएंगे  क्या वोट भी लाएंगे  इतना सरल नहीं ये गणित  बीजेपी के सामने बड़ी चुनौती
राम मंदिर और बीजेपी की राजनीति
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राम मंदिर को लेकर सारी तैयारी कर ली गई है। 22 जनवरी को प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम होने जा रहा है। अब जिस तरह से और जिस स्तर पर उस कार्यक्रम को लेकर आयोजन किया जा रहा है, उसके सियासी मायने निकलना लाजमी है। लोकसभा चुनाव बिल्कुल नजदीक है, ऐसे में मंदिर पॉलिटिक्स के जरिए भी बीजेपी इंडिया गठबंधन को घेरना चाहती है। अब तो वैसे भी कई विपक्षी दलों ने क्योंकि इस मंदिर कार्यक्रम से दूरी बना ली है, ऐसे में बीजेपी काफी आसानी से उन्हें हिंदू विरोधी बात कर एक विशेष वर्ग को अपने पाले में करना चाहती है।

अब बीजेपी इस मंदिर पॉलिटिक्स की राह पर जरूर चलती है, लेकिन उसका ये मानकर चलना कि इसी राम मंदिर के जरिए उसे 400 प्लस सीटें मिल जाएंगी, ये गलत है। नेरेटिव अपनी जगह लेकिन जो तथ्य हैं, वो कुछ अलग ही कहानी बयां करते हैं। ये बात अब जग जाहिर हो चुकी है कि हिंदी पट्टी राज्यों में भाजपा विपक्ष के मुकाबले ज्यादा मजबूत स्थिति में है। बात चाहे 2014 के चुनाव की हो या फिर 2019 के लोकसभा चुनाव की, पार्टी ने हिंदी भाषी राज्यों में एक तरह से क्लीन स्वीप किया था। अगर हिंदी पट्टी राज्यों के साथ दक्षिण के कर्नाटक को भी जोड़ लिया जाए तो बीजेपी ने 2019 के चुनाव में 211 सीटें अपने नाम की थी। 2014 में ये आंकड़ा 210 सीटों का था। लेकिन बड़ा खेल ये रहा कि पिछले लोकसभा चुनाव में बीजेपी का वोट शेयर 12 फिसदी के करीब बढ़ गया, लेकिन सीटों में बढ़ोतरी सिर्फ एक रही। अब यही बीजेपी की सबसे बड़ी चिंता भी है, उसे भी इस बात का एहसास है कि बढ़े हुए वोट बैंक का मतलब ये नहीं कि सीटों में भी उतना ही इजाफा हो जाएगा।

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राम मंदिर की फुल कवरेज यहां देखिए

जानकार तो यहां तक मानते हैं कि हिंदी भाषी राज्यों में बीजेपी ने पहले 14 और फिर 19 के चुनाव में अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन कर दिया है, यानी कि सुधार की गुंजाइश न के बराबर चल रही है। वहीं दूसरी बात ये है कि मंदिर पॉलिटिक्स का सबसे ज्यादा असर भी इन्हीं हिंदी भाषा राज्यों में दिखता है, ऐसे में बीजेपी को किस तरह से इस हिंदुत्व की राजनीति से फायदा मिलेगा, इसका जवाब अभी देना मुश्किल है। बीजेपी को ये समझना भी जरूरी है कि वो उत्तर प्रदेश में सारी 80 की 80 सीटें जीतने का दावा जरूर कर रही है, लेकिन जमीनी हकीकत और वोटिंग पैटर्न उसके लिए चुनौतियां पेश कर रहे हैं। असल में 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी का यूपी में 8 फीसदी के करीब वोट शेयर बढ़ गया था। उसने 50% का बेंचमार्क छू लिया था, लेकिन हैरानी इस बात की रही कि इस प्रचंड वोट शेयर के बाद भी उत्तर प्रदेश में बीजेपी को 2014 की तुलना में 9 सीटों का नुकसान हुआ।

वैसे बीजेपी समर्थक कहते हैं कि इस अयोध्या में होने जा रहे प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम के जरिए दक्षिण की राजनीति को भी पार्टी साधने की कोशिश करेगी। प्रधानमंत्री मोदी भी जिस तरह से पिछले कुछ दिनों में लगातार दक्षिण भारत के दौरे पर हैं, उनकी तरफ से जिस तरह से अलग-अलग मंदिरों का दौरा किया जा रहा है, रणनीति साफ पता चल रही है। लेकिन यहां भी आंकड़ों वाली हकीकत बीजेपी की राह को मुश्किल कर रही है। दक्षिण से कुल 130 सीटें लोकसभा की निकलती हैं, पिछली बार बीजेपी को इन्हीं 130 सीटों में से मात्र 29 पर संतुष्ट करना पड़ गया था। वहां भी कर्नाटक से ही उसे अकेले 25 सिम मिली थीं।

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इस बार बीजेपी तमिलनाडु में कुछ सीटें जीतने की कोशिश कर रही है, लेकिन पार्टी की राजनीति और तमिलनाडु का सियासी मिजाज कभी भी मेल नहीं खाता है। ऐसा नहीं है कि तमिलनाडु में या केरल में धर्म के लिए कोई जगह नहीं, वहां भी कई राम मंदिर हैं, वहां पर हिंदुओं के कई धार्मिक स्थल हैं, लेकिन जिस तरह से धर्म की राजनीति को उत्तर भारत में तवज्जो दी जाती है, वैसा हाल तमिलनाडु या फिर केरल में देखने को नहीं मिलता है। बात अगर अकेले तमिलनाडु की हो तो वहां पर जिस तरह से कई सामाजिक आंदोलन चलाए गए, जिस तरह से द्रविड़ आंदोलन को धार दी गई, उसने भी वहां के लोगों के लिए धर्म वाली राजनीति को कम सक्रिय कर दिया था। इसी वजह से बीजेपी जब भी तमिलनाडु में मंदिर पॉलिटिक्स का जिक्र करती है या फिर हिंदुत्व वाली राजनीति के नाम पर वोट मांगने की कोशिश करती है, वहां की जनता उसे नकार देती है। ऐसे में मंदिर पॉलिटिक्स के जरिए इस बार दक्षिण में पार्टी कितना बड़ा उलट फिर कर पाएगी, इसे लेकर जानकारों के मन में ही कई प्रकार के संशय हैं।

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