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Rajasthan Election: इस सीट पर गहलोत, वसुंधरा और पायलट के वफादार बने कांग्रेस-बीजेपी की सिरदर्दी

राजस्थान की खंडेला की सीट अलग कारणों की वजह से चर्चा में बनी हुई है। इस बार कांग्रेस और बीजेपी ने जिन उम्मीदवारों पर दांव चला है, वो कभी दूसरी पार्टियों में रहे हैं, किसी बड़े नेता के वफादार भी माने गए हैं।
Written by: दीप मुखर्जी | Edited By: Sudhanshu Maheshwari
Updated: November 23, 2023 20:36 IST
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राजस्थान चुनाव और सियासी समीकरण
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राजस्थान चुनाव अपने चरम पर है, वोटिंग करीब है और प्रचार थम चुका है। हर सीट पर अलग समीकरण चल रहा है, अलग-अलग दांव-पेच लगाए जा रहे हैं। बीजेपी को सत्ता वापसी करनी है तो वहीं कांग्रेस को इतिहास रचते हुए रिवाज को बदलना है। लेकिन राजस्थान की एक ऐसी सीट है जहां पर पिछले 51 सालों से रिवाज नहीं बदला है। यहां पर ना कांग्रेस का राज है, ना बीजेपी का कमल है बल्कि दो परिवारों का दबदबा देखने को मिल रहा है। इस सीट का नाम है खंडेला।

खंडेला सीट के समीकरण

राजस्थान की खंडेला की सीट अलग कारणों की वजह से चर्चा में बनी हुई है। इस बार कांग्रेस और बीजेपी ने जिन उम्मीदवारों पर दांव चला है, वो कभी दूसरी पार्टियों में रहे हैं, किसी बड़े नेता के वफादार भी माने गए हैं। उदाहरण के लिए खंडेला सीट से इस बार बीजेपी ने सुभाष मील को चुनावी मैदान में उतारा है। ये वो नेता हैं जो सचिन पायलट के वफादार माने जाते हैं लेकिन इस बार कांग्रेस की तरफ से उन्हें टिकट नहीं मिला। इसी तरह कांग्रेस ने इस बार महादेव सिंह खंडेला पर दांव चल रहा है जो वर्तमान में भी इस सीट से विधायक हैं।

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महादेव सिंह खंडेला, अशोक गहलोत के करीबी माने जाते हैं लेकिन पिछली बार निर्दलीय चुनाव लड़ जीतने में कामयाब हो गए थे। इसी तरह वसुंधरा राजे के करीबी रहे बंशीधर बाजिया इस चुनाव में निर्दलीय उतरे हुए हैं। बीजेपी ने उन्हें टिकट नहीं दिया है। वैसे खंडेला सीट ट्रैक रिकॉर्ड ऐसा रहा है कि यहां पर पिछले 51 सालों से बंशीधर बाजिया या फिर उनके ही परिवार का दूसरा सदस्य जीतता आ रहा है।

जाट बाहुल इलाका

इस बार बंशीधर बाजिया निर्दलीय मैदान में खड़े हैं, उनका साफ कहना है कि बीजेपी ने जिस प्रत्याशी पर भरोसा जताया है वो असल में पैराशूट कैंडिडेट है। उन्होंने ये भी दावा कर दिया है कि बीजेपी के ही 90 फीसदी कार्यकर्ता उनका समर्थन करते हैं। खंडेल सीट की बात करें तो यहां पर कुल 50 हजार वोटर हैं, वहां भी जाट की संख्या सबसे ज्यादा चल रही है। ऐसे में इसी समुदाय के दम पर यहां हार-जीत तय हो जाती है।

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