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मोदी सरकार का 'मेडिकल राष्ट्रवाद', पतंजलि को समर्थन देकर ऐसे साधी गई सियासत

पतंजलि इस समय विवादों में चल रहा है, अपने भ्रामक विज्ञापनों की वजह से उसे सुप्रीम कोर्ट से फटकार पड़ रही है। लेकिन इस फटकार के बीच उसे लंबे समय से एक सरकार का समर्थन भी हासिल है।
Written by: Sudhanshu Maheshwari
नई दिल्ली | Updated: April 12, 2024 02:56 IST
मोदी सरकार का  मेडिकल राष्ट्रवाद   पतंजलि को समर्थन देकर ऐसे साधी गई सियासत
मोदी सरकार और पतंजलि का विस्तार
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योग गुरू बाबा रामदेव इस समय विवादों में चल रहे हैं। भ्रामक विज्ञापन दिखाने के मामले में जिस तरह से सुप्रीम कोर्ट ने फटकार लगाई है, पतंजलि और उनकी खुद की छवि को जोरदार झटका लगा है। लेकिन इन झटकों से पहले पिछले 10 सालों में पतंजलि ने काफी कुछ हासिल भी किया है, खुद बाबा रामदेव की लोकप्रियता भी चरम पर पहुंची है। इसका एक बड़ा कारण मोदी सरकार का लगातार पतंजलि को समर्थन देना है। अलग-अलग तरहों से ना सिर्फ विस्तार में मदद की गई है, बल्कि उस विचारधारा का भी प्रसार बड़े स्तर पर होता दिखा है। अब इन्हीं बिंदुओं पर बात करेंगे, लेकिन सबसे पहले समझते हैं कि किस मामले में पतंजलि फंसी है और आखिर क्यों सुप्रीम कोर्ट इतना आगबबूला चल रहा है।

पतंजलि का पूरा विवाद समझिए

असल में ये बात जुलाई 2022 की है जब पतंजलि की तरफ से अखबार में एक विज्ञापन चलाया गया। उस विज्ञापन में कहा गया कि एलोपैथी द्वारा कई गलतफहमियां फैलाई जा रही हैं। यहां तक कहा गया आंख-कान, अस्थमा, थायरॉइड जैसी बीमारियों का इलाज करने में एलोपेथी फेल हुआ है। उसके बाद ही विज्ञापन में दावा हुआ कि पतंजलि की दवाइयां और योग के जरिए इन सभी बीमारियों का इलाज किया जा सकता है। अब उस विज्ञापन को लेकर IMA अगस्त 2022 में ही सुप्रीम कोर्ट चला गया, कहा गया कि पतंजलि ने उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 2019 का उल्लंघन किया, उसकी तरफ से भ्रामक विज्ञापन दिखाए गए। उसी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सबसे पहले पिछले साल नवंबर में सुनवाई की।

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कोर्ट ने क्या-क्या कहा?

अपने पहले ही आदेश में स्वोच्च अदालत ने भ्रामक विज्ञापन दिखाने पर रोक लगा दी और उसके साथ-साथ दो टूक कहा कि मीडिया से कोई बातचीत नहीं की जाएगी। अब आरोप ये है कि बाबा रामदेव ने आदेश के अगले दिन ही मीडिया से बात की थी। इसके अलावा भ्रामक विज्ञापन पर भी पतंजलि ने कोई एक्शन नहीं लिया और कई जगर फिर वैसे ही बड़े-बड़े दावे देखने को मिल गए। इसी वजह से सुप्रीम कोर्ट नाराज हो गया और अपनी पिछली सुनवाई के दौरान उसने साफ कहा कि लिखित माफी से कुछ नहीं होने वाला है, अदालत का आदेश नहीं माना गया है, ऐसे में परिणाम तो भुगतने ही पड़ेंगे।

पतंजलि के दावे और उन पर बवाल

अब पतंजलि पर इस समय जो भी आरोप लग रहे हैं, ये कोई अभी की बात नहीं है। अगर कोरोना काल के समय में जाया जाए तो वो दिन भी याद करना जरूरी है कि जब महामारी के बीच में बाबा रामदेव और बालकृष्ण ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर दावा कर दिया था कि कोरोना की दवाई उन्होंने खोज निकाली है। उस दवाई को नाम दिया गया- कोरोनिल। कहा गया कि ये कोरोना की पहली दवाई है और विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी इसे मंजूरी दे दी। जिस समय बाबा रामदेव ने कोरोनिल को लॉन्च किया, तब मंच पर उनके साथ तब के स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन सिंह और दूसरे केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी मौजूद थे। उनकी उपस्थिति ही तब बाबा रामदेव की सबसे बड़ी जीत थी और ऐसा संदेश गया कि मोदी सरकार की रजामंदी के बाद ही कोरोनिल जैसी दवाई को लाया गया।

लेकिन बाद में IMA ने उन मंत्रियों की उपस्थिति पर भी सवाल उठा दिए थे और खुद WHO ने भी किसी भी तरह की स्वीकृति देने से साफ मना कर दिया था। IMA ने तब कहा था कि हर्षवर्धन मंत्री के साथ-साथ एक डॉक्टर भी हैं, ऐसे में वे एक खास दवाई को कैसे प्रमोट कर सकते हैं। लेकिन उस समय बाबा रामदेव की उस दवा को उन मंत्रियों द्वारा ऐसा प्रचार मिला जिसने पूरी दुनिया को एक अलग ही संदेश देने का काम किया। संदेश था कि मोदी सरकार समय-समय पर बाबा रामदेव और पतंजलि के साथ मजबूती से खड़ी है। इसे ऐसे भी समझ सकते हैं कि कोरोनिल लॉन्च के बाद तब हर्षवर्धन ने अपने एक्स प्लेटफॉर्म पर लिखा था- आयुर्वेद को लेकर जो सपना बाबा रामदेव का है, वही भारत सरकार का सपना है।

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पतंजलि को मोदी सरकार की मदद

अब इस स्टेटमेंट को ही आधार बनाकर समझने की कोशिश करते हैं कि मोदी सरकार ने किस तरह से समय-समय पर पतंजलि को मदद दी है, किस तरह से बाबा रामदेव को सहायता देने का काम हुआ है। सबसे पहले भ्रामक विज्ञापन वाले विवाद से ही शुरू करते हैं जहां पर सुप्रीम कोर्ट ने उत्तराखंड के साथ केंद्र सरकार के रवैये पर नाराजगी जाहिर की है। माना गया है कि केंद्र की तरफ से सख्त एक्शन नहीं लिया गया, वहीं उत्तराखंड सरकार पर तो लापरवाही बरतने के आरोप लगे हैं। इसे ऐसे समझ सकते हैं कि आरटीआई कार्यकर्ता के वी बाबू ने पतंजलि के खिलाफ एक शिकायत दर्ज करवाई, लेकिन वो मामला 2022 से ही आयुष मंत्रालय और उत्तराखंड की State Licensing Authority के पास लंबित रहा। ये तो कोर्ट की फटकार के बाद इस साल फरवरी में PMO द्वारा आयुष मंत्रालय को पतंजलि के भ्रामक विज्ञापन के खिलाफ एक्शन लेने के लिए कहा गया।

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सस्ते दाम में जमीन का इंतजाम

इसी तरह देश कई राज्यों में इस समय पंतजलि के मेगा फूड पार्क खुल रहे हैं, उनके लिए जो जमीनें मिली रही हैं। एक खास पैटर्न ये है कि बीजेपी शासित राज्य जमीन देने में सबसे आगे दिखाई दे रहे हैं। किसी भी बड़े प्रोजेक्ट के शुरू होने के लिए समय रहते जमीन मिलना जरूरी है, अब ये काम ही बाबा रामदेव की कंपनी के लिए बीजेपी शासित राज्यों ने पूरा किया है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण तो उत्तर प्रदेश है जहां से लगातार पतंजलि को बड़े-बड़े प्रोजेक्ट्स के लिए सब्सिडी तक दी जा रही है।

असल में चार साल पहले ही यमुना एक्सप्रेस वे के किनारे पतंजलि फूड पार्क बनाने के लिए 6000 करोड़ निवेश करने की बात हुई थी। तब योगी सरकार ने बकायदा कैबिनेट मीटिंग कर पतंजलि को सब्सिडी देने का ऐलान किया था। इससे पहले योगी सरकार ने ही पतंजलि आयुर्वेद लिमिटेड को सब्सिडी दी थी। इसी तरह अगर महाराष्ट्र चलें तो वहां पर साल 2017 में जब बीजेपी की सरकार थी, तब पतंजलि को काफी कम दाम में 230 एकड़ जमीन दी गई थी। तब कांग्रेस ने तो आरोप लगाया था कि 268 करोड़ की जमीन को मात्र 58 करोड़ में दे दिया गया, यानी कि सीधे-सीधे 209 करोड़ का नुकसान।

महाराष्ट्र से तो पतंजलि को आगे भी काफी मदद मिलती रही है। अगर साल 2019 पर चलें तो तब पतंजलि को 400 एकड़ जमीन दी गई। बताया गया कि वो जमीन भी असल रेट पर 50 प्रतिशत छूट देने के बाद दी गई। इसके अलावा कई दूसरे तरह के ऑफर भी रामदेव की कंपनी को दिए गए। यानी कि जहां-जहां बीजेपी की सरकार बनी, वहां पतंजलि को आसानी से जमीन भी मिली और उसका विस्तार भी हुआ।

सरकार बनते ही 300 करोड़ की पतंजलि को छूट

अगर थोड़ा और फ्लैशबैक में चले तो चौंकाने वाले आंकड़े पता चलते हैं। 2014 में जब पहली बार केंद्र में मोदी सरकार बनी थी, पतंजलि पर कृपा बरसना भी शुरू हो गया था। ऐसी कृपा जहां पर सरकार बनाने के तीन साल के अंदर ही भाजपा शासित राज्यों में भूमि अधिग्रहण में तकरीबन 46 मिलियन डॉलर (करीब 300 करोड़ रुपए) की भारी छूट दी गई। वहां भी पूर्वोत्तर के राज्य असम में तो रामदेव की कंपनी को मुफ्त में ही गाय संरक्षण के लिए 1200 एकड़ जमीन दी गई थी।

पतंजलि को दर्द देने वाला कानून होगा खत्म!

एक हैरानी वाली बात ये भी सामने आ रही है कि केंद्र सरकार उस कानून को ही खत्म कर सकती है जिसके तहत भ्रामक एड्स पर रोक लगे। बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक आयुष मंत्रालय द्वारा पिछले साल ही अगस्त में सभी राज्यों को एक चिट्ठी लिख दी गई थी। उस चिट्ठी में कहा गया था कि ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स क़ानून की धारा 170 और उससे संबंधित दूसरे प्रावधानों को खत्म किया जाएगा। इसे लेकर बकायदा एक अधिसूचना जारी करने की बात हुई थी। अब सरकार का ये फैसला साफ इशारा करता है कि इससे किसे फायदा पहुंच सकता है, किसे इम्युनिटी मिल सकती है, ये भी नहीं भूलना चाहिए कि पतंजलि अभी भ्रामक विज्ञापन वाले विवाद में ही फंसी हुई है।

आयुर्वेद और मोदी सरकार की हिंदुत्व विचारधारा

अब अगर पतंजलि विवाद से थोड़ा ऊपर उठकर देखने की कोशिश करें तो पता चलता है कि पिछले 10 सालों में मोदी सरकार ने आर्युवेदा के विस्तार में कई कदम उठाए हैं। ऐसा इसलिए हुआ है क्योंकि सरकार की नजर में आयुर्वेदा देश की संस्कृति से जुड़ा हुआ है, देश की संस्कृति बीजेपी के लिए हिंदुत्व से कनेक्टेड है, ऐसे में आयुर्वेद का प्रचार-प्रसार कर एक तरह से बड़े हिंदू वोटबैंक को भी एकमुश्त करने का काम किया जा रहा है। मोदी सरकार को लेकर ये भी कहा जाता है कि इसने हाईपर नेशनलिज्म पर आगे बढ़कर देश की जनता को अपने पक्ष में किया है। लेकिन अब एक पैटर्न बताता है कि ये सरकार मेडिकल राष्ट्रवाद भी कर रही है। एक ऐसा राष्ट्रवाद जहां पर आयुर्वेद को भी देश की प्रतिष्ठा से जोड़ दिया गया है, जहां पर भारत की साख का मतलब ही आयुर्वेदा का आगे बढ़ना है।

योग दिवस और बाबा रामदेव की लोकप्रियता

पीएम मोदी ने इसी तरह पहली बार सत्ता में आते ही अंतरराष्ट्रीय योग दिवस की शुरुवात करवा दी थी। 21 जून 2015 को सबसे पहले दुनिया के कई देशों में योग दिवस मनाया गया था। अब योग के फायदे हैं, इस पर कोई बहस नहीं है, लेकिन इसके होने वाले सियासी फायदे समझना भी जरूरी है। योग भी भारत की ही एक पुरानी विरासत है जिसका जिक्र रिग वेदा में सबसे पहले किया गया है। रिग वेदा हिंदू धर्म का एक अहम हिस्सा है, ऐसे में योग को प्रमोट कर सरकार ने हिंदुओं को ही संदेश देने का काम किया था। योग का विस्तार होना यानी कि हिंदू धर्म का भी विस्तार होने के समान है। यहां भी अगर योग प्रचलित हो रहा है तो उससे सीधा कनेक्शन बाबा रामदेव का जुड़ता है।

आज तो हर कोई बाबा रामदेव को एक उद्योगपति के रूप में भी देखता है, लेकिन उनकी असल पहचान तो योग गुरू की ही है, ऐसे में सरकार ने जब योग दिवस शुरू करवाया था, उसका चेहरा रामदेव ही थे। दुनिया में भी जो योग का विस्तार हुआ है, उसमें सबसे ज्यादा योगदान रामदेव का माना जाता है। ऐसे में योग के जरिए भी सरकार और बाबा रामदेव की नजदीकियों को बखूबी समझा जा सकता है।

आयुष मंत्रालय का बनना और पतंजलि विस्तार

इसके अलावा सरकार ने एक बड़ी पहल करते हुए आयुष मंत्रालय बनाने का फैसला भी अपने पहले ही कार्यकाल में ले लिया था। इस मंत्रालय को बनाने को लेकर खुद सरकार ने अपनी वेबसाइट पर लिखा- आयुष मंत्रालय के जरिए आयुर्वेद, योग और प्राकृतिक चिकित्‍सा, यूनानी, सिद्ध और होम्‍योपैथी प्रणाली की शिक्षा और अनुसंधान का विकास करने पर विशेष बल दिया जाएगा। अब आयुर्वेद पतंजलि से जुड़ा हुआ है, योग पतंजलि से जुड़ा है, प्राकृतिक चिकित्सा का भी प्रचार भी सबसे ज्यादा रामदेव और बालकृष्ण ही करते हैं। यानी कि आयुष मंत्रालय का बनना भी पतंजलि के लिए एक बड़ा अवसर था जिसका फायदा भी उसे समय-समय पर मिलता रहा।

वर्तमान में जब लोकसभा चुनाव फिर करीब है, बीजेपी पूरी तरह हिंदुत्व की पिच पर खेलने को तैयार है, वो बाबा रामदेव और उनकी विचारधारा को चुनौती देने का काम नहीं करने वाली है। अदालत का आदेश है तो पालन तो होगा ही, लेकिन सियासत में हर शिकायत की भरपाई समय के साथ कर दी जाती है। यानी कि आज का एक्शन कब फिर अवसर के नए दरवाजे खोल दे, कोई नहीं बता सकता।

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