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चीन, पाकिस्तान, नेपाल और अमेरिका… मोदी को मिले 'कमजोर जनादेश' का क्या असर?

पिछले दस सालों में भारत की विदेश नीति काफी आक्रमक रही है, अमेरिका से रिश्ते मजबूत हुए हैं, चीन के साथ तल्खी बड़ी है और नेपाल-बांग्लादेश के साथ उतार-चढ़ाव वाला दौर देखने को मिला है।
Written by: Sudhanshu Maheshwari
June 07, 2024 14:28 IST
चीन  पाकिस्तान  नेपाल और अमेरिका… मोदी को मिले  कमजोर जनादेश  का क्या असर
भारत की विदेश नीति और मोदी का तीसरा टर्म
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भारत के चुनाव परिणाम पर पूरी दुनिया की नजर थी। लोकतंत्र के सबसे बड़े चुनाव में मोदी की वापसी ने एक बार फिर इस बात पर चर्चा तेज कर दी है- दुनिया के बाकी बड़े देशों के साथ भारत के संबंध कैसे रहने वाले हैं? पिछले दस सालों में भारत की विदेश नीति काफी आक्रमक रही है, अमेरिका से रिश्ते मजबूत हुए हैं, चीन के साथ तल्खी बड़ी है और नेपाल-बांग्लादेश के साथ उतार-चढ़ाव वाला दौर देखने को मिला है। अब जब केंद्र में इस बार फिर एनडीए की सरकार बनने वाली है, इन सभी देशों पर क्या असर पड़ेगा, यह समझना जरूरी हो जाता है।

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अमेरिका पर जनादेश का असर

अमेरिका इस समय भारत को दो नजरियों से बहुत अहम मानता है। एक तरफ अमेरिका के लिए भारत वो जरिया है जिसके जरिए चीन की ताकत को सीमित किया जा सकता है। दूसरी तरफ पिछले दस सालों में भारत, अमेरिका के लिए एक भरोसेमंद डिफेंस पार्टनर बनकर उभरा है। हाल ही में अत्याधुनिक ड्रोनों की 4 बिलियन डॉलर की डील ने भारत और अमेरिका के रिश्तों को और मजबूत करने का काम किया है। इसके ऊपर QUAD का जो गठन हुआ है, उसकी सक्रियता भी मोदी 3.0 में जारी रहने वाली है। जानकार मानते हैं कि इस समय सबसे ज्यादा जरूरी चीन की बढ़ती ताकत को कंट्रोल करना है, उसमें भारत की भूमिका सबसे अहम रहने वाली है। ऐसे में भारत को मजबूत करने के लिए अमेरिका का समर्थन जारी रहने वाला है। राष्ट्रपति बाइडेन ने भी जब मोदी को तीसरे टर्म की बधाई दी, अमेरिका और भारत की बढ़ती नजदीकियों का जिक्र प्रमुखता से किया गया।

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इस समय मोदी के सामने यह चुनौती जरूर रहने वाल है कि विदेशी धरती पर हो रही संदिग्ध हत्याओं को लेकर भारत को घेरे में लिया जा रहा है। निज्जर की हत्या के बाद भी कनाडा को अमेरिका का साथ मिला। अब उस नेरेटिव से लड़ना तीसरे कार्यकाल में मोदी के लिए एक चुनौती रहने वाला है।

पाकिस्तान पर जनादेश का असर

पाकिस्तान के साथ वैसे तो पिछले कई दशकों से रिश्ते तनावपूर्ण रहे हैं, लेकिन पिछले 10 सालों में टकराव की स्थिति और ज्यादा बढ़ चुकी है। इसका एक बड़ा कारण भारत की आक्रमक विदेश नीति है। पाकिस्तान के अंदर तो बात चलती है कि मोदी के वापस आने का मतलब है- मुसलमानों को दबाने की कोशिश और ज्यादा तेज हो जाएगी। इसके ऊपर पाकिस्तान यह भी मानता है कि बीजेपी लगातार भारत में पड़ोसी मुल्क के साथ खराब रिश्तों की वकालत करता है। वो नफरत वाली राजनीति कर लोगों को एकजुट रखने की कोशिश करती है। लेकिन ऐसा पाकिस्तान का कहना है, इसी वजह से उसने इस चुनाव में इंडिया गठबंधन का खुलकर समर्थन किया था, मोदी को हराने के लिए सभी विपक्षी दलों की खुलकर तारीफ की थी।

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लेकिन अब जब कमजोर बहुमत के साथ ही सही, मोदी ने तीसरी बार वापसी की है, पाकिस्तान इसे अपने के लिए अच्छे संकेत नहीं मानता है। एक तरफ उसे भारत के मुसलमानों की चिंता होती है, दूसरी तरफ वो भारत की आक्रमक नीति से भी परेशान है। जिस तरह से गिलगिट-बलूचिस्तान में पाकिस्तान के खिलाफ और भारत के समर्थन में माहौल बन रहा है, मोदी का तीसरा कार्यकाल इन मुद्दों पर असर डालने वाला है। जानकार मानते हैं कि कमजोर जनादेश के बावजूद भी पाकिस्तान के खिलाफ जारी आक्रमकता में कोई कमी नहीं आने वाली है। आतंकवाद को लेकर भी जीरो टॉलरेंस की नीति जारी रहने वाली है।

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नेपाल पर जनादेश का असर

दिल्ली और नेपाल के रिश्ते हमेशा से ही काफी करीबी वाले रहे हैं। थोड़ी उथल-पुथल तो लगी रहती है, लेकिन हर कोई मानता है कि नेपाल के साथ भारत की आपसी साझेदारी आगे भी मजबूत रहने वाली है। जानकार जोर देकर कहते हैं कि नेपाल के साथ भारत के आर्थिक, सामाजिक और सांसकृतिक संबंधों पर ज्यादा प्रभाव नहीं पड़ने वाला है। लेकिन नेपाल के साथ आज भी भारत के कुछ ऐसे विवाद कायम है, जिसने चुनौतियां भी पेश की हैं। बात चाहे विवादित नक्शे की हो, बात चाहे नेपाल के नए नोटों पर छपे नक्शे की हो, बात चाहे अग्निवीर योजना पर नेपाल के रवैये की हो, इन सब से निपटना मोदी 3.0 के लिए एक चैलेंज रहने वाला है।

जानकार मानते हैं कि नेपाल में क्योंकि अब कम्युनिस्ट सरकार का शासन है, उस वजह से चीन की तरफ से हस्तक्षेप बढ़ता चला गया है। BRI प्रोजेक्ट में नेपाल को शामिल करना इसका प्रमाण है। ऐसे में नेपाल को किस तरह से चीन के प्रभाव से मुक्त रखा जाए, यह भी भारत की विदेश नीति का एक अहम हिस्सा रहने वाला है। यह नहीं भूलना चाहिए कि 2006 से पहले तक नेपाल खुद को हिंदू राष्ट्र मानता था, लेकिन लोकतंत्र को स्वीकार करने के बाद से ही उसके भारत के साथ रिश्ते भी बदले हैं। ऐसे में नेपाल के साथ आपसी तालमेल बैठा इस एनडीए सरकार के लिए जरूरी रहने वाला है।

चीन पर जनादेश का असर

चीन के साथ के रिश्ते उतार-चढ़ाव वाले तो रहे हैं, लेकिन 2020 की हिंसक झड़प के साथ ज्यादा तल्खी बढ़ी है। बीजेपी ने इस बार के अपने घोषणा पत्र में बॉर्डर पर और ज्यादा इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलप करने पर जोर दिया है, ज्यादा सड़कों का जाल बिछाने का ऐलान किया है। ऐसे में चीन के खिलाफ सीमा पर भारत का रुख बदलने नहीं वाला है। वो आज भी सीमा पर 2020 से पहले वाली स्थिति चाहता है। दूसरी तरफ चीन पर निर्भरता कम करना भी भारत की विदेश नीति का एक अहम हिस्सा है। मोदी 2.0 में आत्मनिर्भर भारत का नारा दिया गया था, अब तीसरे कार्यकाल में उस किस प्रकार से अमलीजामा पहनाया जाता है, उस पर सभी की नजर रहने वाली है। उस सपने के साकार होने के लिए चीन के साथ व्यापारिक रिश्तों को पूरी तरह बदलना एक चुनौती रहने वाला है।

चीन खुद इस समय भारत को एक चैजेंज के रूप में लेता है। उसे इस बात का अहसास है कि भारत जो लगातार इकोनॉमिक रिफॉर्म कर रहा है, उससे उसकी ताकत एशिया में कम होती जाएगी, भारत के साथ दूसरे देशों के रिश्ते ज्यादा मजबूत होंगे। लेकिन ग्लोबल टाइम्स में छपी रिपोर्ट के मुताबिक चीन इस बात से ज्यादा खुश है कि बीजेपी को अपने दम पर पूर्ण बहुमत नहीं मिली है। उसकी नजरों में गठबंधन सरकार की वजह से तेज गति से कई रिफॉर्म नहीं हो पाएंगे, ऐसे में मोदी के कई सपने उस गति से आगे नहीं बढ़ेंगे जिसकी उम्मीद लगाई जा रही थी।

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