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बहुमत के बावजूद 1989 में राजीव गांधी ने सरकार बनाने से कर दिया था इनकार, यह थी बड़ी वजह

वर्ष 1984 के चुनाव में राजीव गांधी को 414 सीट पर सफलता मिली थी। इस नाते 1989 में 217 सीट का नुकसान हुआ तो उन्होंने इसे अपने खिलाफ जनादेश मानते हुए प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था।
Written by: अनिल बंसल
नई दिल्ली | Updated: May 28, 2024 11:04 IST
बहुमत के बावजूद 1989 में राजीव गांधी ने सरकार बनाने से कर दिया था इनकार  यह थी बड़ी वजह
राजीव गांधी ने कम सीट मिलने को अपने खिलाफ जनादेश माना था। (फाइल फोटो)
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त्रिशंकु लोकसभा की सूरत में आमतौर पर सबसे बड़े दल की तरफ से सरकार बनाने का दावा पेश किया जाता है। अटल बिहारी वाजपेयी ने वर्ष 1996 में इसी आधार पर न केवल सरकार बनाने का दावा किया था बल्कि तत्कालीन राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा ने उन्हें प्रधानमंत्री पद की शपथ भी दिला दी थी। यह बात अलग है कि 13 दिन बाद उन्हें इस्तीफा देना पड़ा था, क्योंकि किसी भी दल ने उनकी सरकार का समर्थन करने से इनकार कर दिया था और वे बहुमत का दावा नहीं पेश कर पाए थे।
लेकिन परंपरा के उलट राजीव गांधी ने वर्ष 1989 में सरकार बनाने से इनकार कर दिया था।

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राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे और चुनाव में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी थी

हालांकि वे उस समय प्रधानमंत्री थे और लोकसभा चुनाव में हारने के बावजूद 197 सीट जीतकर कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी थी। जनता दल को महज 143 सीट पर ही सफलता मिली थी। दरअसल, 1984 के चुनाव में राजीव गांधी को 414 सीट पर सफलता मिली थी। इस नाते 1989 में 217 सीट का नुकसान हुआ तो उन्होंने इसे अपने खिलाफ जनादेश मानते हुए प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था।

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वीपी सिंह के नेतृत्व में बनी जनता दल सरकार 11 महीने में ही गिर गई

विश्वनाथ प्रताप सिंह के नेतृत्व में 1989 में बनी जनता दल की सरकार को दो परस्पर धुरविरोधी विचारधारा वाले दलों ने बाहर से समर्थन दिया था। इस सरकार को एक तरफ भाजपा का सहारा था तो दूसरी तरफ वामपंथी दलों का। यह बात अलग है कि भाजपा ने समर्थन वापस लेकर इस सरकार को 11 महीने में ही गिरा दिया था और इसके बाद जनता दल टूट गया था। चंद्रशेखर के नेतृत्व वाले धड़े को राजीव गांधी ने बाहर से समर्थन देकर चंद्रशेखर को प्रधानमंत्री बनवा दिया था।

संजय गांधी के निधन के बाद 1980 में राजीव गांधी राजनीति में आए थे

राजीव गांधी अपने छोटे भाई संजय गांधी की 1980 में विमान हादसे में हुई मौत के बाद इंडियन एअरलाइंस की पायलट की नौकरी छोड़कर अकेली पड़ गई अपनी मां इंदिरा गांधी की मदद के लिए राजनीति में आए थे। लेकिन 31 अक्तूबर 1984 को प्रधानमंत्री रहते इंदिरा गांधी की हत्या हो गई तो राजीव गांधी ने प्रधानमंत्री पद संभाला था। तब वे महज 40 वर्ष के थे। उन्होंने लोकसभा भंग कर 1984 में ही मध्यावधि चुनाव की घोषणा कर दी थी।

राजीव गांधी ने इंदिरा गांधी और जवाहर लाल नेहरू के कीर्तिमान तोड़ा था

उन दिनों पंजाब और असम में आतंकवाद का बोलबाला था। लिहाजा इन दोनों राज्यों की 27 सीट पर चुनाव 1984 में नहीं हो पाए थे। तीन चरणों में हुए चुनाव में कांग्रेस को जबर्दस्त सफलता मिली थी। पहले 404 और फिर असम व पंजाब में दस और सीट यानि कुल 414 सीटें जीतकर राजीव गांधी ने अपनी मां इंदिरा और अपने नाना जवाहर लाल नेहरू के कीर्तिमान को तोड़ा था।

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भाजपा को 1984 में महज दो सीट पर सफलता मिल पाई थी। उत्तर प्रदेश में तब 85 सीट थी। बागपत और एटा को छोड़ बाकी सभी 83 सीट पर कांग्रेस के उम्मीदवार जीते थे। इस चुनाव में कांग्रेस को राष्ट्रीय स्तर पर 49 फीसद से ज्यादा मत मिले थे। बागपत में चौधरी चरण सिंह और एटा में उन्हीं की पार्टी के प्यारे मियां चुनाव जीत गए थे। भाजपा के शिखर पुरुष अटल बिहारी वाजपेयी को ग्वालियर में हार का मुंह देखना पड़ा था। कद्दावर नेता हेमवती नंदन बहुगुणा को इलाहबाद में फिल्म अभिनेता अमिताभ बच्चन ने धूल चटा दी थी।

इसी चुनाव में एक नया इतिहास और रचा गया था। एनटी रामाराव की पार्टी तेलगुदेशम ने कांग्रेस के बाद सबसे ज्यादा तीस सीट जीती थी। आंध्र में इस पार्टी ने कांग्रेस के अश्वमेध यज्ञ के घोड़े को रोक दिया था। भाजपा के जो दो उम्मीदवार विजयी हुए थे, वे थे-जंगा रेडडी और एके पटेल। जंगा रेडडी ने आंध्र प्रदेश की हनमकोंडा सीट पर पीवी नरसिंह राव को पटखनी दी थी। वहीं राव जो केंद्र में मंत्री रह चुके थे और 1991 में देश के प्रधानमंत्री बने थे। एके पटेल गुजरात की मेहसाणा सीट से विजयी हुए थे।

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