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PDA पर इतना फोकस क्यों कर रहे हैं अखिलेश यादव? समझिए क्या है सपा का 'गणित'

Akhilesh Yadav पीडीए के जरिए बीजेपी के सभी चुनावी फॉर्मूलों को फेल करने का दावा कर रहे हैं। उनका दावा है कि इस बार लोकसभा चुनाव में सिर्फ पीडीए का सिक्का चलेगा।
Written by: Asad Rehman | Edited By: Yashveer Singh
Updated: February 06, 2024 14:43 IST
pda पर इतना फोकस क्यों कर रहे हैं अखिलेश यादव  समझिए क्या है सपा का  गणित
अखिलेश यादव को पीडीए पर क्यों है इतना भरोसा? (Twitter/yadavakhilesh)
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Lok Sabha Elections 2024: लोकसभा चुनाव के लिए समाजवादी पार्टी अपने प्रत्याशियों की पहली लिस्ट जारी कर चुकी है। लोकसभा चुनाव 2024 के लिए सपा अपनी हर रणनीति PDA को ध्यान में रखकर बना रही है। सपा की पहली लिस्ट में भी पीडीए की झलक दिखाई दी। सपा प्रमुख का दावा है कि राज्य के ज्यादातर लोग पीडीए का समर्थन कर रहे हैं और चुनाव परिणाम में पीडीए का असर साफ दिखाई देगा और बीजेपी के सारे 'फॉर्मूले' फेल हो जाएंगे।

हाल ही में अखिलेश यादव ने एक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक पोस्ट में कहा था, "PDA में विश्वास करनेवालों का सर्वे : कुल मिलाकर 90% की बात = 49% पिछड़ों का विश्वास PDA में, 16% दलितों का विश्वास PDA में, 21% अल्पसंख्यकों का विश्वास PDA में (मुस्लिम+सिख+बौद्ध+ईसाई+जैन व अन्य+आदिवासी), 4% अगड़ों में पिछड़ों का विश्वास PDA में (उपरोक्त सभी में आधी-आबादी मतलब महिलाएं सम्मिलित हैं), इन 90% में से अधिकांश इस बार PDA के लिए एकजुट होकर वोट करेंगे।"

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अपनी इस पोस्ट में अखिलेश यादव ने यह भी दावा किया कि BJP इसी कारण न कोई गणित बैठा पा रही है, न कोई समीकरण, इसीलिए उसके पिछले सारे फ़ार्मूले, इस बार फ़ेल हो गये हैं। इसीलिए बीजेपी उम्मीदवारों के चयन में बहुत पीछे छूट गयी है। बीजेपी को उम्मीदवार ही नहीं मिल रहे हैं। बीजेपी का टिकट लेकर हारने के लिए कोई लड़ना नहीं चाहता है। अपनी इसी पोस्ट में अखिलेश यादव ने दावा किया, "ली है ‘PDA’ ने अंगड़ाई, भाजपा की शामत आई"

क्या है पीडीए?

अखिलेश यादव द्वारा पहली बार पीडीए शब्द का जिक्र जून 2023 में किया गया था। उन्होंने कहा था कि पीडीए एनडीए को हराएगा। पीडीए के जरिए उनका मतलब पिछड़ों, दलितों और अल्पसंख्यक समुदाय से था। यूपी में मुस्लिम और यादव परंपरागत तौर से सपा के कोर वोटर माने जाते हैं। दोनों समुदाय मिलकर यूपी की कई सीटों का रिजल्ट तय करते है या प्रभावित करते हैं, बावजूद इसके  2014 के लोकसभा चुनाव में सपा को सिर्फ पांच और 2019 के लोकसभा चुनाव में बसपा से गठबंधन के बाद भी इतनी ही सीटें नसीब हुईं। इसी तरह 2017 के विधानसभा में सपा की 47 सीटों के साथ करारी हार हुई। 2022 के विधानसभा चुनाव में सपा का ग्राफ जरूर कुछ बड़ा लेकिन उसे सिर्फ 111 सीटें ही नसीब हुईं।

क्या है अखिलेश का प्लान?

अखिलेश यादव पीडीए के जरिए अपने परंपरागत वोट बैंक को बढ़ाना चाहते हैं। वह यादव और मुस्लिमों के साथ-साथ दलित व अन्य ओबीसी जातियों को भी साधना चाहते हैं। उन्होंने पीडीए में फॉरवर्ड जातियों के पिछड़े लोगों को भी शामिल किया है। ये लोग परंपरागत रूप से बीजेपी के वोटर माने जाते हैं।

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सपा प्रमुख का मानना है कि पीडीए इंद्रधनुष की तरह समाज के हर वर्ग का प्रतिनिधित्व करता है और यह ज्यादा लोगों तक पहुंचने में पार्टी की मदद करेगा। सपा के कुछ नेताओं का मानना है कि दलित वोटर मायावती से दूरी बना रहा है क्योंकि मायावती बीजेपी का मुकाबला नहीं कर रही हैं और इसलिए वजह से अब ये वोटर विकल्प तलाश रहा है।

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उन्होंने आगे कहा कि हमारी पार्टी के चीफ लगातार अंबेडकर और अन्य दलित प्रतीकों की बात कर रहे हैं, जो साफ दर्शाता है कि हम दलितों तक पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं। सपा नेता ने बताया कि पार्टी के टारगेट वोटर्स में यादवों के अलावा ओबीसी में आने वाले अन्य वोटर भी हैं। जनसंख्या के मामले में ये सबसे ज्यादा है।

सपा नेता ने कहा कि मुस्लिम राज्य में सबसे बड़ा अल्पसंख्यक ग्रुप हैं, जिन्होंने हमेशा सपा का समर्थन किया है। उन्होंने कहा कि पीडीए जैसा बड़ा मंच न सिर्फ मुसलमानों को बल्कि अन्य अल्पसंख्यक समूहों को भी सपा के पक्ष में आकर्षित करेगा।

जातिगत जनगणना की डिमांड कर रहे अखिलेश

अखिलेश यादव पिछले कुछ समय से लगातार अपनी सभाओं में जातिगत जनगणना की डिमांड उठा रहे हैं। अखिलेश डिमांड कर रहे हैं कि कास्ट सर्वे करवाने के बाद उसके डेटा के अनुसार रिजर्वेशन और स्कीम्स लागू की जानी चाहिए। इसके अलावा सपा प्रमुख बीजेपी पर कथित तौर पर संविधान द्वारा सुनिश्चित आरक्षण व्यवस्था को कमजोर करने का प्रयास करने का भी आरोप लगाते रहे हैं। ये ओबीसी और दलित समुदायों को लुभाने की उनकी कोशिशों का हिस्सा हैं, जिन्हें नौकरियों और शिक्षा में कोटा से फायदा होता है।

अब समझिए सपा का गणित

2014 से लेकर 2022 तक यूपी में हुए विधानसभा चुनाव के परिणाम से सपा यह तो समझ चुकी है कि अगर उसे जीतना है तो सिर्फ मुस्लिम वोट से काम नहीं चलेगा। बीजेपी को हराने के लिए उसे मुस्लिम यादव के साथ-साथ अन्य जातियों का वोट भी चाहिए। यूपी में मुस्लिम जनसंख्या का करीब बीस फीसदी हैं, इनके एकतरफा वोट की वजह से ही 2022 में सपा की सीटों की संख्या में इजाफा हुआ।

सपा इस बात से अच्छी तरह वाकिफ है कि पिछले सभी चुनाव में बीजेपी को मिली जीत में नॉन यादव ओबीसी बीजेपी की जीत में सबसे बड़ा फैक्टर रहा है। एक अनुमान के मुताबिक, यूपी की जनसंख्या में ओबीसी समुदाय की संख्या चालीस से पचास फीसदी है, इसमें यादव जाति आठ से दस फीसदी है। इसलिए सपा यादवों के अलावा ओबीसी में आने वाले अन्य लोगों को भी अपनी पार्टी से जोड़ने का प्रयास कर रही है।

यूपी में दलितों की आबादी करीब बीस फीसदी है। ये बसपा का परंपरागत वोटर माना जाता है। अखिलेश यादव दलितों के उस तबके को साधने का प्रयास कर रहे हैं जो बसपा के कमजोर होने से हतोत्साहित है।

अखिलेश के पीडीए से निपटने के लिए क्या कर रही बीजेपी?

एक तरफ जहां अखिलेश लगातार पीडीए की बात कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ बीजेपी इस बात को लेकर आश्वस्त है कि यूपी के वोटर उनकी किसी भी 'चालबाजी' में नहीं फंसेंगे। बीजेपी नेताओं का मानना है कि सपा ऐसे प्रयास कई बार कर चुकी है लेकिन चुनाव में उन्हें इसका कोई फायदा नहीं मिला है।

यूपी में बीजेपी के पास डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य के रूप में पिछड़े समुदाय से आने वाला बड़ा नेता है। उन्होंने हाल ही में पीडीए को पर्सनल डेवलपमेंट अथॉरिटी कह कर खारिज कर दिया था। उन्होंने आरोप लगाया था कि पीडीए की बात सिर्फ अखिलेश यादव को फायदा पहुंचाने के लिए हो रही है।

बीजेपी नेताओं का यह भी मानना है कि लोकसभा का चुनाव पीएम मोदी की गांरटी पर होगा। पीएम मोदी ने राम मंदिर का निर्माण करवाया है। बीजेपी का यह भी मानना है कि जब सपा और बसपा मिलकर भी यूपी में बीजेपी को रोक नहीं पाए तो इस बार यह वैसे भी संभव नहीं है। इसके अलावा सपा जिस इंडिया गठबंधन का हिस्सा है वहां भी सीट शेयरिंग को लेकर खींचतान चल रही है।

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