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Lok Sabha Elections: 5 साल में कैसे फिसली कांग्रेस की दशकों पुरानी विरासत, चुनाव लड़ने तक में हो रही है उलझन

Lok Sabha Elections 2024: लोकसभा चुनाव के दौरान उत्तर भारत में पार्टी की हालत काफी खस्ता है और कांग्रेस अपनी परंपरागत सीटें रायबरेली और अमेठी तक में प्रत्याशी घोषित में माथापच्ची करने पर मजबूर हो गई है।
Written by: Krishna Bajpai
नई दिल्ली | Updated: April 03, 2024 21:46 IST
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Lok Sabha Elections 2024: प्रत्याशी उतारने तक में उलझ गई है कांग्रेस पार्टी (सोर्स - PTI/File)
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Lok Sabha Elections 2024: कांग्रेस पार्टी की फर्स्ट फैमिली यानी गांधी-नेहरू परिवार (Gandhi-Nehru Family) का यूपी की कुछ सीटों पर विशेष दबदबा रहा था। इसमें फूलपुर से लेकर प्रयागराज, अमेठी और रायबरेली अहम हैं। इन सीटों से ही कांग्रेस नेता जीतकर प्रधानमंत्री भी बने। पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी (Sonia Gandhi) से लेकर राहुल गांधी (Rahul Gandhi) तक, सभी की सियासी पारियां इन्हीं अमेठी और रायबरेली जैसी सीटों पर जीत के जरिए शुरू हुईं लेकिन पिछले 5-10 साल में इन सीटों पर पार्टी ने अपनी पकड़ खोई है, जिसका नतीजा ये है कि अब कांग्रेस अपने प्रत्याशी घोषित करने तक में उलझ गई है।

पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी रायबरेली सीट छोड़कर राज्यसभा के रास्ते संसद चली गईं है और राहुल गांधी दक्षिण भारत में केरल की वायनाड सीट से चुनाव लड़ रहे हैं। राहुल पिछले चुनाव में वायनाड और अमेठी से चुनाव लड़े थे लेकिन उन्हें अमेठी से हार का सामना करना पड़ा था, जिसके बाद कांग्रेस के हाथों से अमेठी की विरासत फिसलती गई और बीजेपी का किला मजबूत होता गया।

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साल 2014 के पहले आम तौर पर बीजेपी भी विरोधी दल के नेताओं के सामने डमी प्रत्याशियों को उतारती थी, जो कि आसानी से जीत जाते थे। यूपी की अमेठी और रायबरेली की सीटों पर सोनिया गांधी और राहुल गांधी को सपा तक चुनौती नहीं देती थी और ये दोनों ही नेता आसानी से संसद पहुंच जाते थे लेकिन इस कल्चर को बीजेपी ने साल 2014 के लोकसभा चुनावों के साथ ही बीजेपी ने खत्म कर दिया।

दिग्गजों को उतारकर BJP बनाती रही चक्रव्यूह

उदाहरण के लिए, साल 2024 के लोकसभा चुनावों के लिए बीजेपी ने कई ऐसे नेताओं को टिकट दिया है, जिनका मुकाबला कांग्रेग से के दिग्गजों से होगा। बीजेपी ने मोदी सरकार के मंत्री राजीव चंद्रशेखर को केरल की तिरुवनंतपुरम सीट से उतारा है। आम तौर पर पार्टियां अपने मंत्रियों के लिए सेफ सींटें ढूंढती हैं लेकिन बीजेपी ने ऐसा नहीं किया, क्योंकि बीजेपी की निगाह पार्टी के दिग्गज नेता शशि थरूर को इस सीट पर परेशान करने की है।

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बीजेपी विपक्षी दलों के फायरब्रांड नेताओं के सामने अपने बड़े नेताओं को लड़ाने में माहिर मानी जाती है। इसी के चलते पार्टी ने कर्नाटक में पूर्व पीएम एचडी देवगौड़ा के दामाद सीएन मंजूनाथ को कांग्रेस नेता डीके सुरेश के सामने उतारकर उनकी सीट पर मुकाबले को कड़ा कर दिया है। कुछ ऐसा ही पार्टी ने साल 2014 के लोकसभा चुनाव के लिए स्मृति इरानी को उतार कर किया था।

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2014 में हार के बावजूद बीजेपी ने स्मृति को दिया बढ़ावा

साल 2014 में अमेठी से लड़ने वाली स्मृति इरानी को राहुल गांधी के सामने हार का सामना करना पड़ा था। बीजेपी ने पूर्ण बहुमत हासिल किया था और स्मृति को केवल अमेठी से लड़ने का ही इनाम मोदी कैबिनेट में मंत्री पद के तौर पर मिला। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मंत्री बनने और साल 2017 में बीजेपी की सरकार यूपी में बनने के बाद स्मृति के दौरे अमेठी में जारी रहे, जबकि अमेठी के सांसद खुद राहुल गांधी तक ज्यादा दौरे नहीं कर पाते थे।

जनता के बीच रहने का मिला फायदा

ऐसे मे राहुल की तुलना में पहली बार एक बड़े वर्ग को किसी दूसरे नेता में उम्मीद दिखने लगी थी, जिसके चलते वहां के कई कांग्रेसी नेताओं ने भी स्मृति से हाथ मिला लिया था। इसका फायदा स्मृति इरानी को 2019 के लोकसभा चुनावों में मिला। राहुल गांधी को भी एहसास हो गया था कि अमेठी में अब उनकी जमीन खिसक गई है, जिसके चलते पार्टी ने अमेठी से हजारों किलोमीटर दूर केरल के वायनाड की सेफ सीट से भी उन्हें चुनाव में उतार दिया। नतीजे आए तो राहुल वायनाड से जीत गए और अमेठी स्मृति के खाते में चली गई।

कांग्रेसी भी हो गए हैं खफा!

2019 के बाद कांग्रेस के लिए जरूरी यह था कि वह अपनी इस विरासत को बचाने के लिए जमीन पर रहती लेकिन राहुल गांधी ने तो अमेठी को नजरंदाज ही कर दिया। 5 साल बाद जब भारत जोड़ो न्याय यात्रा अमेठी से गुजरी तो राहुल लोगों को नजर आए। कांग्रेस पार्टी के नेता इसलिए भी नाराज थे कि राहुल ने अमेठी की धरती पर पैर फिऱ भी नहीं रखा और बस कार से ही हाथ हिलाते हुए शहर से गुजर गए। इसके चलते कांग्रेस कार्यकर्ताओं को वर्ग भी अब राहुल से नाराज हो गया है।

अमेठी ने मुश्किल कर दी रायबरेली

अमेठी और रायबरेली दोनों ही अगल-बगल की सीटें हैं और अमेठी जीतने वाली स्मृति इरानी को बीजेपी ने उसी समय से बीजेपी के लिए रायबरेली में पैठ बनाने का काम दे दिया था। अमेठी से सांसद सोनिया गांधी का तो संसदीय क्षेत्र में दौरा नहीं हुई लेकिन स्मृति इरानी इस क्षेत्र में लगातार सक्रिय रही। रायबरेली की मशहूर नेता अदिति सिंह राहुल और पार्टी की नाराजगी के चलते बीजेपी में शामिल हो गई और पार्टी के टिकट पर 2022 में जीत भी गईं थीं।

इसके बाद हाल ही में राज्यसभा चुनावों के दौरान सपा के चीफ व्हिप मनोज कुमार पांडे ने भी बीजेपी प्रत्याशी के पक्ष में वोट डाल कर बता दिया था कि वे भी अब भगवा पटका पहनने वाले हैं। रायबरेली में 5 विधानसभा सीटें हैं, 2022 में जिनमें से एक भी कांग्रेस नहीं जीती थी। 1 बीजेपी और 4 सपा के पास गई थी और अब तो मनोज कुमार पांडे ने भी बीजेपी से दोस्ती कर ली है, जिसके चलते सपा के कोटे के वहां केवल 3 ही विधायक बचे हैं।

प्रत्याशियों को लेकर कन्फ्यूजन

ऐसे में कांग्रेस अपने गढ़ में ही विधानसभा का एक विधायक तक नहीं जीत पाई, जो कि बता रहा था कि पार्टी की अमेठी के बाद रायबरेली में भी इस बार फजीहत हो सकती है। इसके चलते ही सोनिया गांधी ने राज्यसभा से संसद जाने का फैसला कर लिया। ऐसे में पार्टी के लिए यह तय करना मुश्किल हो रहा है कि वह 2024 के लिए अमेठी या रायबरेली सीट से किसे उतारे। पहले माना जा रहा था कि अमेठी से राहुल और रायबरेली से प्रियंका गांधी चुनाव लड़ सकती है, लेकिन बीजेपी द्वारा अभी तक रायबरेली सीट पर प्रत्याशी न उतारा जाना बता रहा है कि पार्टी किसी बड़े नेता को मैदान में उतारने वाली है, जो बताता है कि पार्टी अमेठी के बाद रायबरेली छीन यूपी से कांग्रेस को शून्य पर लाने की कवायद कर रही है।

वर्तमान परिस्थिति बता रही है कि बीजेपी ने कांग्रेस की विरासत को तगड़ा नुकसान पहुंचाय है। अब यह देखना अहम होगा कि क्या 2024 में पार्टी अपनी खोई हुई जमीन बीजेपी से छीन पाती है या नहीं। बड़ी सवाल यह भी है कि क्या वह छीनने के लिए मशक्कत करने की कोशिश भी करेगी या बीजेपी को वॉक ओवर ही दे देगी।

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