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23 साल में पहली बार… मोदी-शाह की कार्यशैली के विपरीत है गठबंधन सरकार चलाना

क्या मोदी सभी दलों को साथ लेकर चल सकते हैं? क्या मोदी-शाह की जोड़ी सही मायनों में एक गठबंधन वाली सरकार चला सकती है?
Written by: Sudhanshu Maheshwari
नई दिल्ली | Updated: June 05, 2024 17:50 IST
23 साल में पहली बार… मोदी शाह की कार्यशैली के विपरीत है गठबंधन सरकार चलाना
गठबंधन सरकार चलाना है बड़ी चुनौती
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लोकसभा चुनाव का जो जनादेश इस बार आया है, उसने सभी को चौका दिया है। चुनावी फिजा में चर्चा चल रही थी कि इस बार प्रचंड जनादेश मिलने वाला है, एक मजबूत सरकार का केंद्र में गठन होने वाला है। लेकिन जो नतीजे आए हैं, उसमें एनडीए को जरूर बहुमत दिया गया है, लेकिन बीजेपी उसी बहुमत वाले आंकड़े से काफी पीछे छूट चुकी है। बीजेपी को अपने दम पर सिर्फ 240 सीटें मिली हैं।

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मोदी-शाह को लेकर उठेंगे यह सवाल

अब एनडीए को बहुमत मिलने का मतलब यह है कि इस बार क्षेत्रीय दल ज्यादा मजबूत होंगे, इस बार सभी को साथ लेकर चलना जरूरी होगा। लेकिन सवाल भी इसी जरूरत से निकलता है, क्या मोदी सभी दलों को साथ लेकर चल सकते हैं? क्या मोदी-शाह की जोड़ी सही मायनों में एक गठबंधन वाली सरकार चला सकती है? अब सच्चाई यह है कि 2014 और 2019 में भी गठबंधन की सरकार थी, लेकिन तब बीजेपी के पास अपने दम पर बहुमत था। ऐसे में अगर सहयोगी साथ ना भी देते तो सरकार पर कोई खतरा नहीं था।

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मोदी-शाह को हमेशा मिला पूर्ण बहुमत

लेकिन इस बार बड़ा फर्क यह हो चुका है कि मोदी-शाह को पूरी तरह अपने सहयोगियों पर निर्भर रहना पड़ेगा। वहां भी चंद्रबाबू नायडू और नीतीश कुमार के साथ तो समंजस बैठाना और ज्यादा जरूरी है। अब मोदी-शाह के लिए यह एक बड़ी चुनौती इसलिए बनने वाला है क्योंकि इन दोनों ही नेताओं के पास गठबंधन वाली सरकार चलाने का अभी तक कोई अनुभव नहीं है। पीएम मोदी ने तो गुजरात से अपनी मुख्यमंत्री पारी की शुरुआत की थी। अब इसे लोकप्रियता बोला जाए या फिर बीजेपी का संगठन, उनकी अगुवाई में गुजरात में हर बार पार्टी को अपने दम पर पूर्ण बहुमत मिला।

मोदी की कार्यशैली गठबधंन पॉलिटिक्स के विपरीत

2001 के बाद से गुजरात में एक चुनाव भी ऐसा नहीं रहा जिसमें बीजेपी को अपने दम पर बहुमत ना मिला हो। हर बार बहुमत से ज्यादा सीटें आईं और इसी वजह से कभी भी सरकार पर कोई संकट नहीं रहा। इसके ऊपर उस प्रकार के जनादेश की वजह से ही मोदी को दूसरे सहयोगियों की ज्यादा जरूरत नहीं पड़ी। जानकार मानते हैं कि पीएम मोदी अपने साथी नेताओं से ज्यादा अधिकारियों के साथ तालमेल बैठाने में विश्वास रखते हैं। उनकी नजर में उनकी सभी योजनाओं को अमलीजामा पहनाने का काम तो ब्योरोक्रेट्स करते हैं, इसी वजह से अब जब सही मायनों में सहयोगियों के साथ बातचीत करनी पड़ेगी, तब असल परीक्षा देखने को मिलेगी।

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वैसे पीएम मोदी और अमित शाह को गठबंधन सरकार चलाने का कभी भी मौका नहीं मिला है। 2014 के बाद से जैसा रवैया दोनो नेताओं का रहा है, कई दल छोड़कर जा चुके हैं। उनका जाना ही बता रहा है कि वर्तमान बीजेपी नेता तालमेल बैठाने के मामले में कुछ कमजोर दिखाई पड़ते हैं। बड़ी बात यह है कि जो गठबंधन सरकार चलाने का अनुभव मोदी-शाह के पास नहीं है, अटल बिहारी वाजपेयी उसके माहिर खिलाड़ी माने जाते थे।

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वाजपेयी से सीखें- गठबंधन सरकार चलाना

अटल बिहारी वाजपेयी को कई मौकों पर पीएम बनने का मैंडेट मिला था, लेकिन कभी भी वे पूर्ण बहुमत वाली सरकार नहीं बना पाए। इसी वजह से उन मजबूरियों ने उन्हें दूसरे नेताओं के साथ आपसी तालमेल करना सिखा दिया था। इसी का नतीजा रहा कि जब अटल बिहारी वाजपेयी एनडीए का गठन किया तो उन्होंने पूरे पांच सालों तक 20 दलों के साथ मिलकर सरकार चलाई। उनके साथ अरुण जेटली, सुषमा स्वराज और प्रमोद महाजन जैसे ऐसे नेता भी रहे जिनके पार्टी लाइन से ऊपर उठकर कई दलों के साथ अच्छे रिश्ते दिखे। उसी वजह से विकास कार्य भी हुए, सड़कों का विस्तार भी हुआ, लेकिन बीजेपी को अपने कई बड़े एजेंडे को बैकफुट भी रखना पड़ा।

बीजेपी हिंदुत्व के मुद्दे पर तेजी से आगे चलती है, मोदी-शाह ने तो अपने कार्याकाल में उसे नया आयाम देने का काम किया है। बात चाहे सीएए लाने की हो या फिर अनुच्छेद 370 को खत्म करने की, बात चाहे ट्रिपल तलाक हटाने की हो या फिर किसी दूसरे बड़े कदम की, मोदी-शाह के पास क्योंकि प्रचंड बहुमत था, ऐसे में सभी फैसले लिए जा सके। लेकिन अब उतनी आसानी फैसले नहीं हो पाएंगे, हर दल से बात करनी पड़ेगी, हर फैसले से पहले उनसे पूछना पड़ेगा, यह मजबूरी ही वर्तमान लीडरशिप की कार्यशैली से बिल्कुल विपरीत दिखाई देती है।

गुजरात दंगे और नायडू ने मांगा था मोदी का इस्तीफा

एक समझने वाली बात यह भी है कि इस बार मोदी-शाह की सबसे ज्यादा निर्भरता चंद्रबाबू नायडू और नीतीश कुमार पर है, दोनों वो नेता हैं जिनके वर्तमान लीडरशिप के साथ बहुत अच्छे संबंध नहीं माने जाते हैं। राजनीति में कोई किसी का परमनेंट दुश्मन नहीं होता, लेकिन सारे गिले शिकवे एक बार में भुला दिए जाएं, ऐसा भी होता नहीं दिखता है। चंद्रबाबू नायडू और पीएम मोदी के रिश्तों में कई मौकों पर टकराव देखने को मिला है।

नीतीश से मोदी के कैसे बिगड़े रिश्ते?

यह बात साल 2002 की है जब गुजरात में भयंकर दंगे देखने को मिले थे। उन दंगों के बाद एनडीए के पहले नेता चंद्रबाबू नायडू थे जिन्होंने खुलकर मोदी का इस्तीफा मांगा था। उनकी तरफ से एक प्रस्ताव तक पारित करवा दिया गया था मोदी दंगे रोकने में पूरी तरह विफल रहे। इसी तरह नीतीश कुमार के साथ भी मोदी की निजी केमिस्ट्री कभी भी ज्यादा मधुर नहीं रही है। 2005 के विधानसभा चुनाव में नीतीश ने मोदी को प्रचार करने के लिए राज्य में आने नहीं दिया था, 2010 में भी वही स्थिति देखने को मिली, 2013 में जब मोदी को पीएम उम्मीदवार बनाया गया, फिर नीतीश ही सबसे पहले खफा हुए थे।

ऐसे में गठबंधन सरकार चलाना तो चुनौती है ही, इसके साथ-साथ नायडू और नीतीश को साथ लेकर चलना भी अपने आप में बड़ी चुनौती है। दोनों ही नेता गठबंधन सरकारों में रह चुके हैं, अपनी बातें मनवाना जानते हैं, ऐसे में प्रेशर पॉलिटिक्स काफी ज्यादा देखने को मिलेगी। उस पॉलिटिक्स के बीच मोदी-शाह कैसे आगे बढ़ते हैं, तीसका कार्यकाल पूरी तरह उसी बात पर निर्भर करने वाला है।

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