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Lok Sabha Chunav: अधीर रंजन के गढ़ में आसान नहीं है यूसुफ पठान की राह? आंकड़े बता रहे कैसे साल दर साल पकड़ हुई मजबूत

Baharampur Lok Sabha Seat: ममता बनर्जी का कांग्रेस के साथ बंगाल में गठबंधन न करने की वजह भी अधिक रंजन चौधरी माने जाते हैं।
Written by: Nitesh Dubey
नई दिल्ली | Updated: March 11, 2024 10:52 IST
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अधीर रंजन चौधरी और यूसुफ पठान बहरामपुर से आमने-सामने हैं। (PHOTO SOURCE: Express/X-Yusuf Pathan)
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Baharampur Lok Sabha Seat, Adhir Ranjan vs Yusuf Pathan: बंगाल में इंडिया गठबंधन टूट चुका है। बंगाल की मुख्यमंत्री और टीएमसी सुप्रीमो ममता बनर्जी ने सभी 42 सीटों पर उम्मीदवारों की घोषणा कर दी है। सबसे अहम बहरामपुर लोकसभा सीट है, जहां से ममता बनर्जी ने पूर्व क्रिकेटर यूसुफ पठान को टिकट दिया है। यूसुफ पठान गुजरात के रहने वाले हैं लेकिन उन्हें मुस्लिम बाहुल्य बहरामपुर से टिकट मिला है। बहरामपुर लोकसभा सीट पर 2011 की जनगणना के अनुसार करीब 52 फीसदी मुस्लिम वोट है जबकि 13 फीसदी दलित वोटर है।

बहरामपुर लोकसभा है अधीर रंजन का अभेद किला

बहरामपुर लोकसभा सीट कांग्रेस का गढ़ है या यूं कहें यह कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अधीर रंजन चौधरी का अभेद किला है। 1999 से लेकर अब तक वह कोई भी चुनाव नहीं हारे हैं। सबसे अहम बात यह है कि उन्होंने यहां पर हमेशा से बड़ी जीत दर्ज की है। पिछले पांच लोकसभा चुनाव में अधीर रंजन चौधरी का वोट प्रतिशत 45 फीसदी से कम नहीं रहा है।

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अधीर अकेले पड़े हैं सब पर भारी

1999 के लोकसभा चुनाव में जब अधीर रंजन चौधरी ने पहली बार लोकसभा चुनाव लड़ा था तब उन्हें करीब 47 फ़ीसदी वोट मिले थे और अपने प्रतिद्वंदी आरएसपी के उम्मीदवार को करीब 96 हजार वोटों से हराया था। 2004 के लोकसभा चुनाव में अधीर रंजन ने फिर से बहरामपुर से ही ताल ठोकी और उनका वोट प्रतिशत 51.50 फीसदी हो गया और फिर जीत दर्ज की। 2009 के लोकसभा चुनाव में अधीर रंजीत चौधरी ने सभी रिकार्ड को ध्वस्त करते हुए 57 फ़ीसदी वोट प्राप्त कर जीत की हैट्रिक लगाई। 2014 में जब देशभर में मोदी लहर थी और बंगाल में ममता बनर्जी की लहर थी, उस दौरान भी अधीर रंजन के घर में कोई सेंध नहीं लगा पाया। अधीर रंजन चौधरी ने 50.54 फ़ीसदी वोट हासिल कर ढाई लाख से अधिक वोटों के अंतर से जीत दर्ज की। 2014 में स्थिति ऐसी थी कि अगर तृणमूल कांग्रेस, आरएसपी और बीजेपी के वोट को मिला भी दे, तो भी अधीर रंजन को कोई पीछे नहीं कर पाया।

पहली बार मुस्लिम उम्मीदवार से होगा सामना

2019 का लोकसभा चुनाव आया और बंगाल में बीजेपी एक बड़ी ताकत के रूप में उभर चुकी थी। इस चुनाव में पांचवीं बार अधीर रंजन चौधरी बहरामपुर से चुनाव लड़ रहे थे। अधीर रंजन चौधरी ने सभी चुनौतियों को पार करते हुए एक बार फिर से बड़े अंतर से जीत दर्ज की और उनका वोट शेयर 45.47 फीसदी रहा। हालांकि बड़ी बात यह रही है कि अधीर रंजन चौधरी के सामने अभी तक टीएमसी ने कभी मुस्लिम उम्मीदवार नहीं उतारा था। यह पहला चुनाव है जब अधीर रंजन चौधरी को मुस्लिम उम्मीदवार से सामना करना पड़ेगा।

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आसान नहीं है यूसुफ पठान की राह

लेकिन कुछ आंकड़े हैरान कर देने वाले हैं और जो बताते हैं कि यूसुफ पठान की राह आसान नहीं है। 2019 के चुनाव में बंगाल में टीएमसी ने 22 सीटों पर जीत दर्ज की, बीजेपी को 18 सीटें मिली जबकि कांग्रेस को केवल दो सीटों पर जीत हासिल हुई। अहम बात यह रही कि कांग्रेस की दोनों सीटों मुस्लिम बहुल क्षेत्र से थीं। जब पूरे बंगाल में 2019 में मुसलमानों ने टीएमसी को वोट किया लेकिन बहरामपुर और मालदा दक्षिण लोकसभा सीट पर उन्होंने कांग्रेस को वोट किया। इसका असर हुआ कि कांग्रेस ने दोनों सीटों पर जीत दर्ज की।टीएमसी पर बीजेपी आरोप लगाती है कि वह मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति करती है। लेकिन 2019 के चुनाव के आंकड़ों पर नजर डालें तो कांग्रेस 40 सीटों पर चुनाव लड़ी थी जिसमें 5 सीटों पर वह तीसरे नंबर पर थी, एक सीट पर दूसरे नंबर पर थी। एक सीट पर पांचवें नंबर पर थी, जबकि 31 सीटों पर चौथे नंबर पर थी। लेकिन दो सीटों पर उसने जीत दर्ज की थी और दोनों सीटों का नाम बहरामपुर और मालदा दक्षिण है। दोनों सीटें मुस्लिम बहुल हैं जहां पर 50 फीसदी से अधिक मुसलमान हैं।

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कहा जाता है कि ममता का कांग्रेस के साथ बंगाल में गठबंधन न करने की वजह भी अधिक रंजन चौधरी ही हैं। अधिक रंजन चौधरी लगातार प्रदेश सरकार पर निशाना साधते रहे हैं। बीजेपी ने बहरामपुर से निर्मल कुमार साहा को मैदान में उतारा है। हालांकि बहरामपुर में मुस्लिम वोटरों के हाथ में ही जीत की कुंजी होती है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार ममता बनर्जी ने कुछ हफ्ते पहले बहरामपुर लोकसभा सीट के टीएमसी नेताओं के साथ एक बैठक की थी और कहा था कि इस बार हर हाल में बहरामपुर सीट जीतना है।

मुस्लिम वोटरों को TMC के पक्ष में करना यूसुफ पठान के लिए बड़ी चुनौती

यूसुफ पठान के सामने बड़ी चुनौती होगी कि वह बहरामपुर लोकसभा सीट पर मुस्लिम वोटरों को टीएमसी के पक्ष में करें। उनके लिए चुनौती भी बड़ी है क्योंकि यह उनके गृह राज्य नहीं है और उनके सामने एक कद्दावर उम्मीदवार चुनाव लड़ रहा है जो 5 बार से सीट पर सांसद है।

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