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Sarbananda Sonowal Biography: सर्बानंद सोनोवाल को बीजेपी ने डिब्रूगढ़ लोकसभा सीट से मैदान में उतारा, जानिए मोदी कैबिनेट के इस मंत्री ने क्यों नहीं की शादी

Sarbananda Sonowal Biography: सर्वानंद सोनोवाल मोदी कैबिनेट मंत्री हैं। उनकी गिनती पूर्वोत्तर भारत के दिग्गज नेताओं में होती है। सोनोवाल असम के 14वें मुख्यमंत्री रहे हैं।
Written by: vivek awasthi
नई दिल्ली | Updated: March 31, 2024 19:32 IST
sarbananda sonowal biography  सर्बानंद सोनोवाल को बीजेपी ने डिब्रूगढ़ लोकसभा सीट से मैदान में उतारा  जानिए मोदी कैबिनेट के इस मंत्री ने क्यों नहीं की शादी
Sarbananda Sonowal Biography: बीजेपी ने केंद्रीय मंत्री सर्बानंद सोनोवाल डिब्रूगढ़ लोकसभा सीट से मैदान में उतारा है। (एक्सप्रेस फाइल)
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Lok Sabha Elections: लोकसभा चुनाव 2024 को लेकर बीजेपी ने केंद्रीय मंत्री सर्बानंद सोनोवाल को असम के डिब्रूगढ़ संसदीय क्षेत्र से मैदान में उतारा है। डिब्रूगढ़ सीट पर आम चुनाव के पहले चरण में 19 अप्रैल को मतदान होगा। असम में 14 लोकसभा सीटें हैं।

केंद्रीय जहाजरानी, ​​बंदरगाह, जलमार्ग और आयुष मंत्री सोनोवाल ने 2004 में एजीपी उम्मीदवार के रूप में इस निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया था। वो इस बार इंडी एलायंस में शामिल यूओएफए के उम्मीदवार लुरिनज्योति गोगोई के खिलाफ चुनाव लड़ेंगे।

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सोनोवाल असम के मुख्यमंत्री भी रहे

सर्वानंद सोनोवाल मोदी कैबिनेट मंत्री हैं। उनकी गिनती पूर्वोत्तर भारत के दिग्गज नेताओं में होती है। सोनोवाल असम के 14वें मुख्यमंत्री रहे हैं। मई 2016 में हुए असम विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी की जीत होने के बाद सोनोवाल ने 24 मई को मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी। वह मई 2016 से लेकर मई 2021 तक असम के मुख्यमंत्री रहे हैं।

मई, 2014 में पहली बार केंद्र में मंत्री बने

सोनोवाल ने 2021 के विधानसभा चुनावों में भी जीत दर्ज करके खुद को साबित किया, लेकिन हाईकमान ने जब मुख्यमंत्री पद के लिए हिमंता बिस्बा सरमा को चुना तो सोनोवाल ने मुख्यमंत्री की कुर्सी खाली कर दी। असम का मुख्यमंत्री बनने से पहले सोनोवाल मई 2014 से मई 2016 तक केंद्र में मंत्री थे। केंद्रीय मंत्रिमंडल में उन्हें खेल एवं युवा मामलों के राज्‍यमंत्री (स्‍वतंत्र प्रभार) का पद दिया गया था। इसके अलावा उन्होंने कौशल विकास और उद्यमिता मंत्रालय की भी जिम्मेदारी संभाली थी। 2014 के लोकसभा चुनावों में वह असम की लखीमपुर सीट से भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़कर निर्वाचित हुए थे।

2004 में पहली बार लोकसभा का चुनाव लड़ा

2001 में असम गण परिषद के उम्मीदवार के रूप में ही वह सबसे पहले विधानसभा के सदस्य निर्वाचित हुए और 2004 में उन्होंने पहली बार लोकसभा का चुनाव जीता था। हालांकि 2011 में बीजेपी में आने के बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। 2012 एवं 2014 में वह असम बीजेपी के अध्यक्ष बने और फिर 2016 में वह राज्य के मुख्यमंत्री बने।

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असम गण परिषद के सदस्य भी रहे

वह असम गण परिषद के स्टूडेंट विंग ऑल असम स्टूडेंट यूनियन (AASU) और पूर्वोत्तर के राज्यों में असर रखने वाले नॉर्थ इस्ट स्टुडेंट्स यूनियन (NESU) के अध्यक्ष रह चुके हैं। भारतीय जनता पार्टी का हाथ थामने से पहले सोनोवाल असम गण परिषद के सदस्य थे।

सर्बानंद ने जनवरी 2011 में एजीपी के भीतर सभी कार्यकारी पदों से इस्तीफ़ा देते हुए पार्टी छोड़ दी और उसके ठीक कुछ दिन बाद 8 फ़रवरी को तत्कालीन बीजेपी राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी तथा कई वरिष्ठ नेताओं की उपस्थिति में वे बीजेपी में शामिल हो गए। यह दिन उनके राजनीतिक जीवन का टर्निंग पॉइंट साबित हुआ और 24 मई 2016 को वे असम में पहली बार शासन में आई बीजेपी सरकार के पहले मुख्यमंत्री बनाए गए।

31 अक्टूबर, 1961 को जन्म हुआ

59 साल के सर्बानंद का जन्म 31 अक्तूबर 1961 को असम में डिब्रूगढ़ ज़िले के एक छोटे से मोलोक गांव में हुआ था। आठ भाई-बहनों में सर्बानंद सबसे छोटे हैं। उनके पिता जिबेश्वर सोनोवाल चबुआ बोकदुम पंचायत में सचिव थे और मां दिनेश्वरी सोनोवाल एक गृहिणी थीं।

सर्वानंद की शुरुआती पढ़ाई गांव से हुई

कक्षा छह तक की शुरुआती पढ़ाई गांव के प्राथमिक स्कूल से करने के बाद बड़े भाई मिस्टा प्रसाद सोनोवाल उन्हें अपने पास डिब्रूगढ़ ले आए और आगे की पढ़ाई यहां के डॉन बोस्को स्कूल से पूरी की। दरअसल सर्बानंद जब महज 15 साल के थे उस समय उनके पिता का देहांत हो गया था। इसलिए डिब्रूगढ़ स्टेट बैंक में नौकरी करने वाले उनके सबसे बड़े भाई मिस्टा प्रसाद ने ही सभी पांच भाइयों को पढ़ाया।उस दौरान डॉन बोस्को स्कूल में सर्बानंद के और दो भाई पढ़ा करते थे।

अपनी स्कूली पढ़ाई पूरी करने के बाद सर्बानंद जब कॉलेज पहुंचे उस दौरान राज्य में असम आंदोलन की शुरुआत हुई थी। सर्बानंद को स्कूली दिनों से खेल और बॉडी बिल्डिंग का शौक था। उन्होंने कानोई कॉलेज में एक बार मिस्टर डिब्रूगढ़ स्ट्रॉन्गमैन का खिताब भी जीता था। वे कॉलेज के छात्रों के बीच लोकप्रिय थे। इस तरह वे अपने दोस्तों और कुछ शिक्षकों के प्रोत्साहन से छात्र आंदोलन में शामिल हो गए।

LLB की और पत्रकारिता से स्नातक की-

असम में बांग्लादेश से होने वाली अवैध घुसपैठ के ख़िलाफ़ आसू के नेतृत्व में साल 1979 से छह साल तक चला असम आंदोलन आज़ाद भारत का सबसे बड़ा आंदोलन था जिसने दुनिया का ध्यान अपनी तरफ़ खींचा था। यही वजह थी कि साल 1985 में भारत सरकार और आंदोलनकारी छात्र नेताओं के बीच हुए असम समझौते के बाद आसू से आए प्रफुल्ल कुमार महंत महज 33 साल की उम्र में असम के मुख्यमंत्री बन गए थे और उनके कई साथी सरकार में मंत्री बनाए गए। आसू ने साल 1985 में असम गण परिषद को जन्म दिया था।

लिहाजा आसू में रहकर छात्र राजनीति करने वाले कई युवाओं ने उस समय प्रदेश का बड़ा नेता बनने के सपने संजोए थे, उनमें सर्बानंद भी एक थे। डिब्रूगढ़ विश्वविद्यालय के तहत हनुमानबक्श कानोई कॉलेज से अंग्रेज़ी ऑनर्स के साथ अपनी स्नातक की डिग्री पूरी करने के बाद इसी विश्वविद्यालय से उन्होंने एलएलबी की डिग्री प्राप्त की।इसके अलावा सर्बानंद ने गौहाटी विश्वविद्यालय से संचार और पत्रकारिता में स्नातक की डिग्री भी ली है।

मोरान विधानसभा से पहला चुनाव लड़ा

सर्बानंद की असली राजनीतिक यात्रा साल 1992 में शुरू हुई जब वे आसू के अध्यक्ष बने। इस तरह वे साल 1999 तक आसू प्रमुख रहे और घुसपैठ के मसले पर बेबाकी से अपनी बात कहते रहे. अपने छात्र जीवन से ही सोनोवाल अवैध प्रवासियों के मुद्दे पर मुखर रहे हैं।

यह वो वक्त था जब सर्बानंद खुद को असमिया समुदाय के नेता के तौर पर स्थापित कर रहे थे। उनकी इसी बेबाकी के कारण पूर्वोत्तर राज्यों के छात्र संगठनों ने उन्हें साल 1996 से साल 2000 तक नॉर्थ ईस्ट स्टूडेंट्स ऑर्गेनाइजेशन के अध्यक्ष तौर पर चुना।

असल में आसू से क़रीब सभी छात्र नेताओं का अगला पड़ाव क्षेत्रीय पार्टी एजीपी ही थी। लिहाजा साल 2001 में सर्बानंद एजीपी में शामिल हो गए और उसी साल पार्टी ने उन्हें मोरान विधानसभा से अपना उम्मीदवार बनाया। पहली बार वे महज 850 वोटों से विधानसभा चुनाव जीतकर विधायक बने थे। तीन साल असम विधानसभा के सदस्य के तौर पर काम करने के बाद एजीपी ने उन्हें साल 2004 में डिब्रूगढ़ लोकसभा सीट से खड़ा किया और वे जीतकर संसद पहुंचे।

सर्बानंद ने नहीं की शादी-

स्थानीय लोगों के मुताबिक, सर्बानंद काफी भावुक और ईश्वर को मानने वाले व्यक्ति हैं। जब वह कॉलेज में थे तो असम आंदोलन हुआ था और वह समाज-जाति के काम में इतनी गंभीरता से जुड़ गए कि कई-कई दिन तक घर नहीं आते थे। परिवार के सभी लोगों ने उन पर शादी करने का दबाव भी बनाया था, लेकिन उन्होंने शादी नहीं की। वह हमेशा शादी की बात को टालते रहे।

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