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Explained: कैदी चुनाव लड़ सकता है लेकिन वोट नहीं दे सकता, ऐसा क्यों है?

Lok Sabha Elections: इस आर्टिकल में हम वोट देने के अधिकार और चुनाव लड़ने के अधिकार की कानूनी स्थिति जानेंगे।
Written by: ईएनएस | Edited By: Mohammad Qasim
नई दिल्ली | Updated: May 02, 2024 00:19 IST
explained  कैदी चुनाव लड़ सकता है लेकिन वोट नहीं दे सकता  ऐसा क्यों है
कैदी क्यों नहीं दे सकता वोट? (Photo : Pavan Khengre)
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खालिस्तान समर्थक अमृतपाल सिंह फिलहाल जेल में कैद है। पिछले हफ्ते पंजाब की खडूर साहिब सीट से लोकसभा चुनाव लड़ने के उसके इरादे के बाद काफी चर्चा हुई थी। जनता के बीच चर्चित सवालों में से एक अहम सवाल यह भी था कि क्या एक शख्स जेल में रहते हुए चुनाव लड़ सकता है? तो इसका जवाब यह दिया गया कि प्रचार करने की एक लिमिट हो सकती है लेकिन आपराधिक आरोपों का सामना करते हुए चुनाव लड़ने का अधिकार तब तक सवालों के घेरे में नहीं रहेगा जब तक कि चुनाव लड़ रहा शख्स दोषी नहीं ठहराया जाता। लेकिन वह वोट नहीं डाल सकता। इस आर्टिकल में हम वोट देने के अधिकार और चुनाव लड़ने के अधिकार की कानूनी स्थिति जानेंगे।

दोष साबित होने पर नहीं लड़ सकते चुनाव

जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 (RP Act) की धारा 8 के मुताबिक उन लोगों को संसद और राज्य विधानमंडलों की सदस्यता से अयोग्य घोषित कर दिया जाता है जिन्हें किसी अपराध के लिए दोषी ठहराया गया हो और दो साल या उससे अधिक की जेल की सजा दी गई हो।

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अधिनियम की धारा 8 (3) कहती है, “किसी भी अपराध के लिए दोषी ठहराया गया व्यक्ति और जिसे कम से कम दो साल के कारावास की सजा सुनाई गई, उसे सजा की तारीख से अयोग्य घोषित कर दिया जाएगा और रिहाई के बाद भी छह साल की अवधि के लिए अयोग्य बना रहेगा।” लेकिन अधिनियम विचाराधीन कैदियों को चुनाव लड़ने से नहीं रोकता है।

दोष साबित नहीं हुआ है तो लड़ सकते हैं चुनाव?

यहां अमृतपाल सिंह के मामले को समझा जा सकता है कि एक सांसद\विधायक को दोष साबित होने पर ही अयोग्य करार दिया जा सकता है यानी सिर्फ आरोपों के तहत जेल में बंद व्यक्ति पर यह नियम लागू नहीं होता। एक शख्स जो जेल में ट्रायल से गुज़र रहा है और उसका दोष साबित नहीं हुआ है तो वह चुनाव लड़ सकता है।

पिछले कुछ सालों में इस धारा के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में दो बड़ी चुनौतियां देखने को मिली हैं। 2011 में पब्लिक इंटरेस्ट फाउंडेशन ने एक याचिका दायर कर तर्क दिया कि जिन व्यक्तियों के खिलाफ आपराधिक आरोप तय किए गए हैं या जो अपने आपराधिक इतिहास के बारे में गलत हलफनामा दायर करते हों उन्हें भी अयोग्य घोषित किया जाना चाहिए। हालाँकि पाँच-न्यायाधीशों की पीठ ने सर्वसम्मति से कहा कि केवल विधायिका ही जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 (RP Act) को बदल सकती है यह कोर्ट के हाथ में नहीं है। बीजेपी नेता अश्विनी उपाध्याय ने भी एक एसी ही याचिका कोर्ट में दायर की थी जिसपर मामला अभी चल रहा है।

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कैदी क्यों नहीं दे सकता वोट?

जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 (5) यह कहती है कि कोई व्यक्ति मतदान नहीं कर सकता है यदि वह किसी कारावास में बंद है, या फिर वह पुलिस की कानूनी हिरासत में है। यानी जेल में बंद एक अंडर ट्रायल कैदी भी वोट नहीं दे सकता है जब तक कि उसे जमानत पर रिहा नहीं किया गया हो।

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इस नियम को भी 1997 में सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी। याचिका में कहा गया था कि यह ऐसे लोगों को वोट देने के अधिकार से वंचित कर रहा है जो पैसों की कमी के रहते जमानत नहीं ले पा रहे हैं। जबकि वह लोग जो जमानत पर बाहर हैं वोट दे सकते हैं। इसे वोट देने के अधिकार और समानता के अधिकार का उल्लंघन कहा गया था।

हालांकि कोर्ट ने इस याचिका को खारिज कर दिया था और कहा था कि वोट देने का अधिकार एक वैधानिक अधिकार है इसे संवैधानिक अधिकार के उल्लंघन से जोड़ कर नहीं देखा जा सकता। कोर्ट ने कहा कि अपने आचरण के कारण जेल में बंद व्यक्ति अभिव्यक्ति की समान स्वतंत्रता का दावा नहीं कर सकता। कोर्ट ने यह भी कहा कि कैदियों के वोट देने के अधिकार पर प्रतिबंध ठीक है क्योंकि यह आपराधिक मामलों से जुड़े लोगों का चुनाव से दूर रहने के लिए जरूरी है।

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