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संपादकीय: बेकाबू महंगाई से बढ़ रहीं जनता की मुश्किलें, थोक एवं खुदरा मूल्य में उतार-चढ़ाव से संकट

विश्व अर्थव्यवस्था मंदी के दौर से गुजर रही है। जाहिर है, इसका असर कच्चे तेल की कीमतों पर पड़ा है। मगर यह कोई पहला मौका नहीं है, जब कच्चे तेल की कीमतें बढ़ी हैं।
Written by: जनसत्ता
नई दिल्ली | Updated: June 15, 2024 08:20 IST
संपादकीय  बेकाबू महंगाई से बढ़ रहीं जनता की मुश्किलें  थोक एवं खुदरा मूल्य में उतार चढ़ाव से संकट
प्रतीकात्मक तस्वीर। फोटो -(इंडियन एक्सप्रेस)।
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महंगाई पर काबू पाना सरकार के लिए टेढ़ी खीर बना हुआ है। मई में थोक महंगाई पिछले पंद्रह महीनों के उच्च स्तर पर पहुंच गई। अब यह 2.61 फीसद पर है, जबकि अप्रैल में यह 1.26 फीसद थी। इसी अवधि में पिछले वर्ष यह नकारात्मक 3.61 फीसद पर थी। जबकि इसके उलट खुदरा महंगाई मई में घट कर 4.75 फीसद पर पहुंच गई, जो इस वर्ष का सबसे निचला स्तर है। थोक महंगाई पिछले तीन महीने से लगातार बढ़ रही है।

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वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय का कहना है कि खाद्य वस्तुओं, खाद्य उत्पादों के विनिर्माण, कच्चे तेल और गैस तथा अन्य विनिर्माण उत्पादों की कीमतों में बढ़ोतरी की वजह से इस वर्ष मई में थोक महंगाई बढ़ी। खासकर सब्जियों की थोक कीमतों में बेतहाशा वृद्धि देखी गई। सब्जियों की थोक महंगाई दर 32.42 फीसद रही। प्याज की थोक महंगाई दर 58.05 फीसद और आलू की 64.05 फीसद दर्ज की गई। भारतीय रिजर्व बैंक आमतौर पर खुदरा महंगाई दर के आधार पर अपनी मौद्रिक नीतियों में बदलाव करता है। मगर मई में खुदरा महंगाई पांच फीसद से कम होने के बावजूद उसने रेपो रेट में कोई बदलाव न करने का फैसला किया। इसलिए कि उसका अनुमान है कि अभी महंगाई का रुख अनिश्चित बना रहेगा और उसमें उतार-चढ़ाव आ सकता है।

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आमतौर पर थोक महंगाई का असर खुदरा महंगाई पर पड़ता है। जो चीजें थोक में महंगी होती हैं, उनकी खुदरा कीमतें भी बढ़ती हैं। मगर बीते मई महीने में यह क्रम उलटा देखा गया। थोक महंगाई बढ़ी, पर खुदरा महंगाई कम हुई। महंगाई बढ़ने के पीछे आमतौर पर कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी का तर्क दिया जाता है। पिछले कुछ वर्षों से रूस-यूक्रेन युद्ध और फिर इजराइल-हमास संघर्ष के चलते दुनिया भर में आपूर्ति शृृंखला बाधित हुई है।

विश्व अर्थव्यवस्था मंदी के दौर से गुजर रही है। जाहिर है, इसका असर कच्चे तेल की कीमतों पर पड़ा है। मगर यह कोई पहला मौका नहीं है, जब कच्चे तेल की कीमतें बढ़ी हैं। भारत में तेल की कीमतों में बढ़ोतरी कई वर्ष से हो रही है, जिसका प्रभाव माल ढुलाई पर देखा गया है। मई महीने में तेल की कीमतें इतनी बढ़ी भी नहीं कि उसका सीधा प्रभाव थोक महंगाई पर पड़े। फिर, खुदरा महंगाई घटी हुई कैसे दर्ज हुई, जबकि इसका असर उस पर भी पड़ना चाहिए था। दरअसल, खाने-पीने की चीजों की कीमतों में असंतुलन की बड़ी वजह अंतरराष्ट्रीय व्यापार है।

महाराष्ट्र के किसान लंबे समय से संघर्ष कर रहे हैं कि प्याज को निर्यात के लिए खोल दिया जाए, मगर सरकार ने उस पर प्रतिबंध लगा रखा है। इसकी वजह से उन्हें अपनी लागत भी नहीं मिल पा रही और खुदरा बाजार में औने-पौने दाम पर बेचना पड़ रहा है। इसके उलट, बाहर से दालों, फलों, खाद्य तेल आदि पर आयात शुल्क घटा या हटा देने की वजह से घरेलू जिंस की जगह विदेशी चीजें थोक बाजार में अधिक पहुंचने लगी हैं। यह समझना मुश्किल है कि जो खाद्य वस्तुएं अपने यहां जरूरत से अधिक पैदा हो रही हैं, उनकी घरेलू बाजार में खपत बढ़ाने पर जोर देने के बजाय विदेशी वस्तुओं की आवक क्यों बढ़ाई जाती है। खानेपीने की चीजों की कीमतें बढ़ने से आम लोगों के जीवन पर बुरा प्रभाव पड़ता है। उनकी क्रयशक्ति बढ़ाना पहले ही बड़ी चुनौती है, तिस पर महंगाई की मार उनका जीवन दूभर बना देती है।

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