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संपादकीय: असम में होगा उग्रवाद का अंत, त्रिपक्षीय समझौते से दिखी शांति की राह

अरबिंद राजखोवा के नेतृत्व वाले उल्फा के वार्ता समर्थक गुट ने हिंसा की राह छोड़ने, संगठन को भंग करने और लोकतांत्रिक प्रक्रिया में शामिल होने पर सहमति व्यक्त की।
Written by: जनसत्ता
नई दिल्ली | Updated: January 01, 2024 08:00 IST
संपादकीय  असम में होगा उग्रवाद का अंत  त्रिपक्षीय समझौते से दिखी शांति की राह
असम बीते कई दशक से उल्फा की हिंसक गतिविधियों से त्रस्त रहा है, जिसमें अब तक दस हजार से ज्यादा लोगों को जान गंवानी पड़ी।
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यह एक जगजाहिर तथ्य है कि असम में अलगाववादी समूहों की गतिविधियों की वजह से पूर्वोत्तर के राज्यों में हालात कितने जटिल रहे हैं। इसे सुलझाने के लिए लंबे समय से कई स्तर पर कोशिशें चलती रही हैं, लेकिन शुक्रवार को इस दिशा में बड़ी कामयाबी मिली। दरअसल, असम में सक्रिय यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट यानी उल्फा के एक गुट के साथ केंद्र और असम सरकार के बीच दिल्ली में हुई बैठक में एक त्रिपक्षीय शांति समझौता हुआ। यह पहल इसलिए बेहद महत्त्वपूर्ण है कि पिछले चार दशक में पहली बार सशस्त्र उग्रवादी संगठन उल्फा के किसी समूह के साथ एक शांति समझौते के मसविदे पर हस्ताक्षर हुए हैं। इसके तहत अरबिंद राजखोवा के नेतृत्व वाले उल्फा के वार्ता समर्थक गुट ने हिंसा की राह छोड़ने, संगठन को भंग करने और लोकतांत्रिक प्रक्रिया में शामिल होने पर सहमति व्यक्त की।

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गौरतलब है कि असम बीते कई दशक से उल्फा की हिंसक गतिविधियों से त्रस्त रहा है, जिसमें अब तक दस हजार से ज्यादा लोगों को जान गंवानी पड़ी। काफी जद्दोजहद के बाद अब आकार में आ सके इस त्रिपक्षीय समझौते से यह उम्मीद की जा रही है कि असम में दशकों पुराने उग्रवाद के दौर के अंत की राह खुल सकेगी।

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दरअसल, असम में उल्फा के अलगाववाद की मांग की जड़ में जिस तरह के सवाल थे, उसकी जड़ें राज्य के विकास और उसमें स्थानीय तबकों की भागीदारी के मुद्दे अहम रहे हैं। मगर इन मुद्दों की जटिलता इससे समझी जा सकती है कि 1979 में उल्फा का गठन ही ‘संप्रभु असम’ की मांग को लेकर किया गया था। तब से यह संगठन विध्वंसक गतिविधियों में शामिल रहा। यों उल्फा का जो गुट ताजा समझौते में शामिल हुआ है, उसने 2011 से ही हथियार नहीं उठाए हैं और पहले ही हिंसा छोड़ दी थी। जाहिर है, इस दौरान इस समूह को उग्रवाद और हिंसा के जरिए किसी समाधान या अपने मकसद तक पहुंचने की कोशिशों के बेमानी होने की वास्तविकता का आभास हुआ।

वहीं सरकार के स्तर पर इस जटिल समस्या के हल की राह निकालने के क्रम में असम के विकास को लेकर अनेक कदम उठाए गए, मगर राज्य में अलग-अलग खेमों में काम कर रहे उग्रवादी गुटों के बीच असंतोष बना रहा। अब ताजा समझौते में इसी मुद्दे को केंद्र में रखते हुए केंद्रीय गृहमंत्री ने कहा है कि असम को एक बड़ा विकास पैकेज दिया जाएगा और मसविदे के प्रत्येक खंड को पूरी तरह लागू किया जाएगा।

असम में अलगाववादी गतिविधियों को खुराक राज्य की सांस्कृतिक पहचान और संसाधनों पर उनके हक के सवाल से मिल रही थी। दूसरी ओर, तथ्य यह भी है कि उल्फा के विद्रोह और उग्रवादी गतिविधियों की वजह से राज्य में विकास कार्य बाधित हुए थे। केंद्र सरकार के साथ समझौते में इससे संबंधित मुख्य बिंदुओं को भी संबोधित किया गया है। मसलन, राज्य के लोगों की सांस्कृतिक विरासत बरकरार रहेगी और लोगों के लिए बेहतर रोजगार के साधन मुहैया कराए जाएंगे। इसके अलावा, सशस्त्र आंदोलन की राह छोड़ने वाले उल्फा के सदस्यों को मुख्यधारा में लाने का भारत सरकार हर संभव प्रयास करेगी।

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हालांकि यह भी ध्यान रखने की जरूरत है कि असम में परेश बरुआ के नेतृत्व वाला उल्फा का एक अन्य कट्टरपंथी समूह इस समझौते का हिस्सा नहीं है और उसने इस समझौते में शामिल होने से इनकार कर दिया। इसके बावजूद, यह एक अहम पक्ष है कि उल्फा के ही एक प्रभावशाली रहे समूह के साथ समझौते के बाद अगर शांति की स्थिति बनती है तो विकास की राह आसान होगी। स्थिरता और विश्वास में निरंतरता से लोगों में उम्मीद पैदा होगी और यही संभवत: शांति की चाबी भी साबित हो।

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