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संपादकीय: रेलगाड़ियों की लेटलतीफी से सुविधाओं की खुली पोल, मौसम को वजह बताकर जिम्मेदारी से बचना अनुचित

विडंबना यह है कि जब ट्रेनों के परिचालन से जुड़ी समस्या गहराने लगती है और इससे जुड़े सवाल तूल पकड़ने लगते हैं, तब सरकार या रेल महकमे की ओर से इसके हल के लिए आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल और अन्य उपाय करने की बात कही जाती है। मगर कुछ समय बाद फिर आने वाली ऐसी शिकायतें बताती हैं कि आश्वासनों पर अमल की हकीकत क्या है।
Written by: जनसत्ता
नई दिल्ली | Updated: January 29, 2024 08:27 IST
संपादकीय  रेलगाड़ियों की लेटलतीफी से सुविधाओं की खुली पोल  मौसम को वजह बताकर जिम्मेदारी से बचना अनुचित
घने कोहरे और ठंड की वजह से ट्रेनों को चलाने में काफी मुश्किलें आ रही हैं।
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हाल के दिनों में ट्रेनों की लेटलतीफी, इसके परिचालन में अव्यवस्था और आए दिन होने वाले हादसों से फिर यही सवाल उठा है कि आधुनिकीकरण और अंतरराष्ट्रीय स्तर की सेवा मुहैया कराने के दावे के बरक्स भारतीय रेल कहां है। फिलहाल हालत यह है कि राजधानी दिल्ली से खुलने वाली ट्रेनें समय से नहीं खुल पा रही हैं और कई-कई घंटे देरी से चल रही हैं। राजधानी एक्सप्रेस जैसी गाड़ियां भी पंद्रह-सोलह या इससे भी ज्यादा देरी से अपने गंतव्य पर पहुंचीं। यह माना जा सकता है कि बीते कुछ दिनों से घना कोहरा छाए रहने की वजह से ट्रेनों का परिचालन बाधित हुआ है, लेकिन अगर इसके अलावा भी सभी स्तरों पर अव्यवस्था दिख रही हो, तब इसके लिए किसे जिम्मेदार ठहराया जाएगा।

ऐसी शिकायतों का स्पष्टीकरण प्राकृतिक कारण के रूप में नहीं दिया जा सकता कि यात्रियों के सामने खानपान की मुश्किल पैदा हो रही और ट्रेनों में साफ-सफाई अव्यवस्था का शिकार है। ऐसे में लंबी यात्रा कर रहे लोगों और उनके परिवारों और बच्चों के सामने कैसी समस्या पैदा हो रही होगी, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है।

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फाग सेफ डिवाइस लगाने पर भी देर से चल रहीं ट्रेनें

मौसम की वजह से उपजी मुश्किल एक पहलू जरूर है, लेकिन व्यवस्थागत रूप से प्रबंधन बेहतर हो, तो समस्या और असुविधा कम की जा सकती है। इस मामले में रेलवे में बहुस्तरीय कमी साफ देखी जा सकती है। कहने को बीते कुछ वर्षों में कोहरे के दौरान भी ट्रेनों के परिचालन को सामान्य बनाए रखने के लिए ‘फाग सेफ डिवाइस’ यानी कोहरा-रोधी यंत्र के इस्तेमाल की बात कही गई, मगर आज भी अगर गाड़ियां अपने निर्धारित समय से पंद्रह-सोलह या बीस घंटे देरी से चल रही हैं तो इसकी क्या वजह है? क्या ये यंत्र वास्तव में उपयोगी नहीं हैं या फिर ट्रेनों में इसे लगाने और उचित इस्तेमाल को लेकर प्रबंधन के स्तर पर कोई कमी है?

ट्रेनों को देर से चलने से कई तरह की समस्याएं आती हैं

विडंबना यह है कि जब ट्रेनों के परिचालन से जुड़ी समस्या गहराने लगती है और इससे जुड़े सवाल तूल पकड़ने लगते हैं, तब सरकार या रेल महकमे की ओर से इसके हल के लिए आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल और अन्य उपाय करने की बात कही जाती है। मगर कुछ समय बाद फिर आने वाली ऐसी शिकायतें बताती हैं कि आश्वासनों पर अमल की हकीकत क्या है।

पिछले कुछ सालों में पटरियों और डिब्बों की गुणवत्ता में सुधार से लेकर रेलवे के बुनियादी ढांचे के विकास के मामले में तेज आधुनिकीकरण करने का दावा किया गया है। ट्रेनों को हादसे से बचाने के लिए ‘कवच प्रणाली’ के सफल परीक्षण की खबरें भी आईं। तेज रफ्तार और आधुनिक तकनीक के साथ अन्य सुविधाओं से लैस ट्रेनों के संचालन की शुरुआत लोगों के बीच उम्मीद जगाने के लिहाज से अच्छी बातें हैं। मगर पिछले कुछ समय के दौरान लगातार ट्रेनों के पटरियों से उतरने की घटनाएं जिस तरह आम हो गई हैं, कई बड़े हादसे सामने आए, वे बताते हैं कि केवल संसाधनों के स्तर पर कमी को दूर करने के दावे से सेवा की गुणवत्ता में सुधार लाना संभव नहीं है।

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प्रबंधन के मामले में जब तक कोताही या लापरवाही बरती जाएगी, तब तक यात्रियों को बेहतरीन सुविधा मुहैया कराने की बातें बेमानी ही रहेंगी। यह ध्यान रखने की जरूरत है कि ट्रेन यात्रा आज लगातार महंगी होती जा रही है और साधारण लोगों के लिए उसमें जगह सिमट रही है। त्योहारों के मौके पर रेलवे स्टेशनों पर जितनी बड़ी तादाद में लोग अपने गांव-घर जाने के लिए जमा होते हैं, उससे पता चलता है कि जरूरत के मुकाबले ट्रेन सुविधाओं की हालत क्या है।

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