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Jansatta Editorial: एंटीबायोटिक मुद्दे पर डाक्टरों से लेकर दवा दुकानदारों तक के लिए सख्त नियम बनाने की जरूरत

तबीयत खराब होने पर लोग जब इलाज कराने जाते हैं, तो जरूरी न होने पर भी डाक्टर ऐसी दवाएं लेने की सलाह दे देते हैं।
Written by: जनसत्ता | Edited By: Bishwa Nath Jha
नई दिल्ली | Updated: January 22, 2024 00:28 IST
jansatta editorial  एंटीबायोटिक मुद्दे पर डाक्टरों से लेकर दवा दुकानदारों तक के लिए सख्त नियम बनाने की जरूरत
प्रतीकात्‍मक तस्‍वीर। फोटो- (इंडियन एक्‍सप्रेस)।
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दवा का इस्तेमाल किसी बीमारी से मुक्ति पाने के लिए किया जाता है, लेकिन अगर जाने-अनजाने और गैरजरूरी तरीके से कुछ दवाओं का सेवन किया जाए, तो उससे फायदे के बजाय नुकसान पहुंच सकता है। आधुनिक चिकित्सा पद्धति के संदर्भ में यह बात लंबे समय से कही जाती रही है कि जो दवा किसी तकलीफ को ठीक या कम कर सकती है, उसी का दुष्परिणाम किसी व्यक्ति की मुश्किलें बढ़ा सकता है।

खासकर जीवाणुनाशक या एंटीबायोटिक दवाओं के मनमाने इस्तेमाल के घातक नतीजे देखे गए हैं। इस मसले पर अब केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने देश के सभी चिकित्सा महाविद्यालयों और संगठनों के चिकित्सकों से कहा है कि वे किसी मरीज को एंटीबायोटिक दवाएं लेने का परामर्श देते समय अनिवार्य रूप से बीमारी के लक्षण और कारण बताएं। साथ ही मरीजों को यह भी बताना अनिवार्य होगा कि यह दवा उन्हें क्यों दी जा रही है, कितने दिनों तक खाना चाहिए और इसके क्या परिणाम होंगे।

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यह छिपी बात नहीं है कि किसी मरीज के इलाज के दौरान दवा लेने की सलाह देते हुए आमतौर पर चिकित्सक बिना किसी संकोच के एंटीबायोटिक दवाएं लेने को कह देते हैं। इसके अलावा, आम लोग भी तबीयत खराब होने पर कई बार बिना चिकित्सक की सलाह के, स्थानीय दवा दुकान से खरीद कर धड़ल्ले से एंटीबायोटिक दवा खा लेते हैं। इसलिए कि वे इसके दुष्प्रभावों से अनजान होते हैं।

ऐसे में एंटीबायोटिक देने को लेकर डाक्टरों से लेकर दवा दुकानों तक के लिए एक सख्त नियम वक्त का तकाजा है। यही वजह है कि सरकार ने सभी दवा विक्रेताओं से एंटीबायोटिक दवाओं की बिना पर्ची के होने वाली बिक्री बंद करने और उन्हें केवल योग्य डाक्टर के परामर्श पर ही बेचने की अपील की है।

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सरकार ने इस बारे में जो चिंता जताई है, वह वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित है और इन दवाओं के सेवन को लेकर लंबे समय से संतुलन और विवेक का इस्तेमाल करने की सलाह दी जाती रही है। अफसोस कि न तो चिकित्सकों की ओर से एंटीबायोटिक की सलाह देते हुए सावधानी बरती जाती है और न ही आम लोगों के बीच इस मसले पर जागरूकता दिखती है।

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ऐसे मामले आए दिन चिंता का कारण बनते रहते हैं जिनमें किसी बीमारी की स्थिति में मरीज को अगर कोई दवा दी जाती है तो उस पर उसका कोई खास असर नहीं देखा जाता है। इसकी जड़ में भी एंटीबायोटिक दवाओं का गलत इस्तेमाल ही है। तबीयत खराब होने पर लोग जब इलाज कराने जाते हैं, तो जरूरी न होने पर भी डाक्टर ऐसी दवाएं लेने की सलाह दे देते हैं।

फिर जरूरत से ज्यादा ऐसी दवा के सेवन की वजह से इनके दुष्परिणामों के बारे में आगाह नहीं किया जाता है। नतीजतन, मरीज पर दूसरी दवाओं का प्रभाव भी बेअसर होने लगता है और रोग-प्रतिरोधक क्षमता में कमी आने लगती है। अंदाजा लगाया जा सकता है कि ऐसी स्थिति में अगर व्यक्ति किसी गंभीर रोग की चपेट में आए तो उसे किस तरह के जोखिम और मौत के खतरे तक का सामना कर पड़ सकता है।

यों कोई भी रोग होने पर एलोपैथी दवाओं का सेवन करते हुए उसके दुष्परिणामों को लेकर सचेत रहने की जरूरत होती है, क्योंकि अगर किसी दवा से एक बीमारी में राहत मिलती है तो उसी से कोई अन्य दिक्कत पैदा होने की आशंका हो सकती है। इसलिए दवाओं के मामले में विवेकपूर्ण उपयोग सुनिश्चित करना जरूरी है।

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