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संपादकीय: चीन के कर्जे से दबे पाकिस्तान में आतंकी हमले, हुकूमत की मजबूरी और रिश्तों का दबाव

विचित्र है कि जब भी अंतरराष्ट्रीय मंचों पर आतंकवाद के विरुद्ध जंग छेड़ने की बात उठती है, तो पाकिस्तान उसमें सहयोग करने का आश्वासन देता है, मगर हकीकत यह है कि वह आतंकवादियों का सबसे सुरक्षित पनाहगाह बना हुआ है।
Written by: जनसत्ता
नई दिल्ली | Updated: March 27, 2024 06:46 IST
संपादकीय  चीन के कर्जे से दबे पाकिस्तान में आतंकी हमले  हुकूमत की मजबूरी और रिश्तों का दबाव
बलूचिस्तान प्रांत के लोगों का मानना है कि पाकिस्तान सरकार उनके प्रांत के हितों की अनदेखी करती है।
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आतंकवाद को लेकर पाकिस्तान दोहरा रवैया अख्तियार करता रहा है। एक तरफ तो वह भारत के खिलाफ आतंकी संगठनों को हथियार की तरह इस्तेमाल करता रहा है, मगर दूसरी तरफ अपने ही बलूचिस्तान इलाके में आतंकवाद से लड़ना उसके लिए चुनौती बना हुआ है। सोमवार को बलूचिस्तान प्रांत के तुरबाद शहर में नौसैनिक अड्डे पर आतंकवादियों ने हमला किया और गोली बरसाते हुए अंदर घुसने का प्रयास किया। इसके बाद खैबर पख्तूनख्वा इलाके में चीनी नागरिकों के एक काफिले पर हमला किया, जिसमें पांच चीनी इंजीनियरों की मौत हो गई। इन दोनों हमलों की जिम्मेदारी बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी नाम के आतंकी संगठन ने ली है।

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बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी पर नियंत्रण में सेना नाकाम

सैनिक ठिकानों या फिर चीनी नागरिकों पर ये हमले नए नहीं हैं और न ये केवल बलूचिस्तान प्रांत तक सीमित हैं। बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी वहां इस कदर ताकतवर है कि वह जब-तब पाकिस्तानी सुरक्षाबलों को चुनौती देती रहती है। पाकिस्तानी सेना और पुलिस ने बलूचिस्तान प्रांत से आतंकवाद को नेस्तनाबूद करने के इरादे से हर तरह के कड़े कदम उठाए हैं, वहां के बेगुनाह लोगों पर भी खूब अत्याचार किए हैं, मगर उनके इरादे कमजोर करने में उन्हें कोई कामयाबी नहीं मिल पाई है।

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चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा परियोजना का विरोध

दरअसल, बलूचिस्तान प्रांत के लोगों का मानना है कि पाकिस्तान सरकार उनके प्रांत के हितों की अनदेखी करती है। फिर, उस इलाके के लोग पाकिस्तान में चीन की बढ़ती दखल का पुरजोर विरोध करते रहे हैं। उनकी कहना है कि चीन उनके इलाके में घुस कर उनके संसाधनों का दोहन कर रहा है। दरअसल, पाकिस्तान में ‘चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे’ के तहत कई परियोजनाएं चल रही हैं। बलूचिस्तान प्रांत के लोग उनका विरोध करते रहे हैं। इससे पहले भी चीनी नागरिकों पर कई बार हमले हो चुके हैं।

ताजा हमला उसी की एक कड़ी है। मगर पाकिस्तान हुकूमत की मजबूरी यह है कि वह इन परियोजनाओं के नाम पर चीन से काफी पैसा ले चुकी है और इन दिनों जिस आर्थिक बदहाली के दौर से देश गुजर रहा है, उसमें वह चीन का दामन छोड़ नहीं सकती। चीन से उसकी दोस्ती न केवल आर्थिक कारणों से, बल्कि भारत के साथ तनावपूर्ण रिश्तों की वजह से भी है। चीन से दोस्ती करके वह भारत पर मानसिक दबाव बनाने की कोशिश करता है, मगर हकीकत यह है कि अपनी इस लचर रणनीति में वह खुद चीन के पंजे में अपनी गर्दन फंसा चुका है। अगर वह बलूचिस्तान प्रांत के लोगों के विरोध पर गंभीरता दिखाता, तो शायद आतंकवादी उसे अपने हथियार के तौर पर इस्तेमाल नहीं कर पाते।

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बलूचिस्तान प्रांत में आतंकवाद इतना ताकतवर हो चुका है कि उसके चलते पाकिस्तान को ईरान और अफगानिस्तान के साथ रिश्तों में संतुलन साधना भी कठिन हो गया है। कुछ महीने पहले ही ईरान ने बलूचिस्तान प्रांत के कुछ आतंकी ठिकानों पर हवाई हमले किए, जिसके जवाब में पाकिस्तान ने भी उसके इलाके में हवाई हमले किए।

विचित्र है कि जब भी अंतरराष्ट्रीय मंचों पर आतंकवाद के विरुद्ध जंग छेड़ने की बात उठती है, तो पाकिस्तान उसमें सहयोग करने का आश्वासन देता है, मगर हकीकत यह है कि वह आतंकवादियों का सबसे सुरक्षित पनाहगाह बना हुआ है। पाकिस्तान खुद भी इस बात से वाकिफ है कि उसकी तरक्की के रास्ते में सबसे बड़ा रोड़ा आतंकवाद है, मगर वह उस पर अंकुश लगाने को लेकर कभी संजीदा नजर नहीं आता।

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