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संपादकीय: पंजाब में नशे का कारोबार, मुख्यमंत्री के शहर में भी जहरीली शराब का 'काला धंधा'

नकली शराब पीकर मरने वाले ज्यादातर गरीब लोग होते हैं, जो कम पैसे में नशे के लिए ऐसी शराब खरीदते हैं। इनमें से ज्यादातर अपने परिवार के लिए रोटी कमाने वाले होते हैं। उनके मरने से पूरे परिवार के सामने संकट खड़ा हो जाता है।
Written by: जनसत्ता
नई दिल्ली | Updated: March 25, 2024 00:45 IST
संपादकीय  पंजाब में नशे का कारोबार  मुख्यमंत्री के शहर में भी जहरीली शराब का  काला धंधा
नकली शराब के धंधे में अक्सर देखा जाता है कि इसे चलाने वालों की पुलिस से सांठगांठ होती है।
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पंजाब में नशे के कारोबार पर नकेल कसना लंबे समय से चुनौती बना हुआ है। पिछले विधानसभा चुनाव में यह सबसे बड़ा मुद्दा था। आम आदमी पार्टी ने वादा किया था कि अगर वह सरकार में आएगी, तो इस धंधे पर पूरी तरह रोक लगा देगी। मगर अभी तक इस दिशा में कोई कामयाबी नजर नहीं आ रही। ताजा मामला यह है कि मुख्यमंत्री के जिले संगरूर में जहरीली शराब पीने से इक्कीस लोगों की मौत हो चुकी है। कई लोगों का इलाज चल रहा है।

राज्य में काफी समय से नशे की वजह से जारी है मौतों का सिलसिला

इसे लेकर यह प्रश्न लोगों की जेहन में अटक गया है कि जब मुख्यमंत्री के जिले में जहरीली शराब के धंधे और मादक पदार्थों की पहुंच पर रोक नहीं लग पाई है, तो बाकी जगहों पर क्या स्थिति होगी। पंजाब में काफी समय से नशे की वजह से हो रही नौजवानों की मौतों को लेकर चिंता जताई जाती रही है। सीमावर्ती राज्य होने के कारण वहां पाकिस्तान के रास्ते मादक पदार्थों की पहुंच पर रोक लगाना भी कठिन बना हुआ है। ऐसे में अगर जहरीली शराब से मौतों का नया मामला आया है, तो उसे लेकर स्वाभाविक ही नए सवाल उठने शुरू हो गए हैं। हालांकि प्रशासन ने छह लोगों को गिरफ्तार कर इस मामले में कार्रवाई शुरू कर दी है।

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नकली शराब का कारोबार कमोबेश हर राज्य की है बड़ी समस्या

नकली शराब का कारोबार कमोबेश हर राज्य की समस्या है। चोरी-छिपे शराब बनाने और बेचने वाले हर कहीं मौजूद हैं, मगर जो सरकारें सचमुच इस समस्या से पार पाने को लेकर संजीदा होती हैं, वे ऐसे कारोबारियों पर नकेल कसने में कामयाब ही देखी जाती हैं। पंजाब की तुलना दूसरे राज्यों से फिलहाल इसलिए नहीं की जा सकती, क्योंकि वहां नशे पर काबू पाना सरकार की प्राथमिकता है। वहां नशे के कारोबार के फलने-फूलने की वजहें भी अब काफी हद तक साफ हैं। उसमें अनेक रसूखदार लोगों और बड़े अधिकारियों की गिरफ्तारियां भी हो चुकी हैं।

इस तरह माना जा सकता है कि वहां का प्रशासन इस समस्या को लेकर सतर्क है। फिर यह समझना मुश्किल है कि संगरूर में किस तरह नकली शराब बनाई जा रही थी और प्रशासन को इसकी भनक तब मिल सकी, जब जहरीली शराब पीकर लोग मरने लगे। इस तरह के धंधे स्थानीय लोगों की जानकारी से बाहर नहीं होते। फिर स्थानीय लोगों से पुलिस का तालमेल ठीक हो, तो उसे भी इस तरह के धंधे की जानकारी मिल ही जाती है। मगर नकली शराब के धंधे में अक्सर देखा जाता है कि इसे चलाने वालों की पुलिस से सांठगांठ होती है। संगरूर में भी ऐसी किसी गठजोड़ से इनकार नहीं किया जा सकता।

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नकली शराब पीकर मरने वाले ज्यादातर गरीब लोग होते हैं, जो कम पैसे में नशे के लिए ऐसी शराब खरीदते हैं। इनमें से ज्यादातर अपने परिवार के लिए रोटी कमाने वाले होते हैं। उनके मरने से पूरे परिवार के सामने संकट खड़ा हो जाता है। उनका संकट कुछ मुआवजा देकर दूर नहीं किया जा सकता। इसलिए हमेशा से नकली शराब बनाने वालों के खिलाफ कठोर कदम उठाने की सिफारिश की जाती रही है। मगर सरकारों और प्रशासन की लापरवाही का नतीजा यह निकलता है कि हर घटना के बाद कुछ लोगों को गिरफ्तार तो कर लिया जाता है, पर उन्हें ऐसी कोई सजा नहीं मिल पाती, जो दूसरों के लिए नजीर बने। इसलिए भी जहरीली शराब के कारोबारियों पर शिकंजा कसना मुश्किल बना हुआ है। पंजाब सरकार इस सच्चाई से अनजान नहीं है।

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