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Jansatta Editorial: रूस- यूक्रेन युद्ध के बीच अंतरराष्ट्रीय संगठनों की चुप्पी हैरान करने वाली

रूस की यूक्रेन से नाराजगी इस बात को लेकर है कि उसने यूरोपीय देशों के सुरक्षा संगठन नाटो की सदस्यता ले ली।
Written by: जनसत्ता | Edited By: Bishwa Nath Jha
Updated: March 14, 2024 08:40 IST
jansatta editorial  रूस  यूक्रेन युद्ध के बीच अंतरराष्ट्रीय संगठनों की चुप्पी हैरान करने वाली
प्रतीकात्मक तस्वीर। फोटो -(इंडियन एक्सप्रेस)।
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यूक्रेन के साथ संघर्ष को लेकर रूस का रवैया अब भी बहुत बदला नहीं है। राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने फिर से दोहराया है कि अगर देश की संप्रभुता या स्वतंत्रता को कोई खतरा पैदा होगा, तो रूस परमाणु हथियारों का इस्तेमाल करने के लिए तैयार है। परमाणु हमले की धौंस वे पहले भी दे चुके हैं। यूक्रेन पर रूस के हमले को दो वर्ष से अधिक समय हो गया।

इस बीच कई देशों ने युद्ध विराम के लिए मध्यस्थता करने की कोशिश की, मगर उसमें कोई कामयाबी नहीं मिल पाई। अब भी रूस किसी न किसी बहाने यूक्रेन पर हमले करता रहता है। इस युद्ध की वजह से अब तक यूक्रेन के करीब दस लाख नागरिक अपने देश में ही बंदी बन कर रह गए हैं और करीब इतने ही लोग विस्थापित हो चुके हैं। दोनों देशों के बीच चल रहे संघर्ष के कारण पूरी दुनिया की आपूर्ति शृंखला बाधित है। यूक्रेन पर रूसी हमले के बाद शुरू में जिस तरह विश्व शक्तियों का ध्रुवीकरण होने लगा था, उससे लगा था कि यह विश्वयुद्ध का कारण बन सकता है, मगर वह खतरा टल गया।

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रूस की यूक्रेन से नाराजगी इस बात को लेकर है कि उसने यूरोपीय देशों के सुरक्षा संगठन नाटो की सदस्यता ले ली। जब तक यूक्रेन उससे अलग नहीं होता, तब तक रूस उससे किसी भी प्रकार की बातचीत को तैयार नहीं है। वह यूक्रेन को काफी नुकसान पहुंचा और उसके कई इलाकों पर कब्जा कर चुका है। वह चाहता है कि यूक्रेन उसके सामने समर्पण कर दे।

मगर यूक्रेन झुकने को तैयार नहीं। इसलिए यह संघर्ष अब रूस के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न बन चुका है। परमाणु हमले की धौंस भी पुतिन ने इसी जुनून में दी है। जिस तरह रूस कई बार गढ़े हुए बहाने बना कर और अंतरराष्ट्रीय युद्ध नियमों का उल्लंघन करते हुए यूक्रेन पर हमले कर चुका है, उसे देखते हुए पुतिन के बयान को बहुत हल्के में लेना भी ठीक नहीं। मगर आज की स्थिति में परमाणु हथियारों का इस्तेमाल दुनिया में कैसी तबाही ला सकता है, कल्पना से परे है। इस पर अंतरराष्ट्रीय संगठनों की चुप्पी हैरान करती है।

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