scorecardresearch
For the best experience, open
https://m.jansatta.com
on your mobile browser.

Jansatta Editorial: चुनावी चंदे का विवरण प्रस्तुत करने को लेकर एसबीआई का समय बढ़ाने की मांग सवालों के घेरे में

सर्वोच्च न्यायालय स्टेट बैंक की फरियाद पर क्या रुख अख्तियार करता है, देखने की बात है। मगर जिस तरह उसने इस पूरी प्रक्रिया को असंवैधानिक करार दिया, उससे उम्मीद बनती है कि इस पर वह कड़ा रुख अपना सकता है।
Written by: जनसत्ता | Edited By: Bishwa Nath Jha
नई दिल्ली | Updated: March 06, 2024 08:13 IST
jansatta editorial  चुनावी चंदे का विवरण प्रस्तुत करने को लेकर एसबीआई का समय बढ़ाने की मांग सवालों के घेरे में
प्रतीकात्मक तस्वीर। फोटो -(इंडियन एक्सप्रेस)।
Advertisement

चुनावी चंदे का विवरण देने को लेकर भारतीय स्टेट बैंक की समय बढ़ाने संबंधी फरियाद पर स्वाभाविक ही सवाल उठने शुरू हो गए हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने आज तक का समय दिया था कि वह सारा विवरण निर्वाचन आयोग को सौंप दे। उस विवरण को एक हफ्ते के भीतर निर्वाचन आयोग को सार्वजनिक करना था।

मगर अब स्टेट बैंक का कहना है कि बांड के रूप में जो भी चुनावी चंदा दिया और लिया गया था, उसका हिसाब-किताब दो जगहों पर जमा है और उनका मिलान करने में वक्त लग जाएगा, इसलिए उसे तीस जून तक का समय दिया जाए। उसकी यह दलील किसी के गले इसलिए नहीं उतर रही कि आज जब बैंकों का सारा कामकाज डिजिटलीकृत हो चुका है और किसी भी खाते के लेन-देन का विवरण एक बटन दबाते ही निकल आता है, तब स्टेट बैंक को कुल बाईस हजार दो सौ सत्रह बांडों का हिसाब-किताब निकालने में इतना वक्त क्यों लगना चाहिए।

Advertisement

स्टेट बैंक कोई छोटा-मोटा बैंक नहीं है। देश के छोटे से छोटे हिस्से, यहां तक कि दूसरे देशों में भी उसकी शाखाएं हैं, उसके लाखों ग्राहक हैं। इतने बड़े कारोबार को देखने के लिए हजारों कर्मचारी हैं, जो रोज लाखों लेन-देन का हिसाब-किताब रखते हैं। उसके पास अत्याधुनिक साफ्टवेयर हैं। फिर भी हैरानी की बात है कि उसे बाईस हजार बांडों का हिसाब जुटाने के लिए इतना वक्त चाहिए।

बांड के जरिए गुप्त तरीके से चुनावी चंदा लेने की प्रक्रिया को सर्वोच्च न्यायालय ने पिछले महीने असंवैधानिक करार दिया था। उसने बीते करीब पांच वर्षों में इस तरह हुई चंदे की लेन-देन का विवरण सार्वजनिक करने का आदेश दिया था, ताकि लोगों को पता चल सके कि किस राजनीतिक दल ने किन-किन लोगों और कंपनियों के कितना चंदा लिया।

Advertisement

दरअसल, आरोप था कि कई घाटे में चल रही कंपनियों ने भी राजनीतिक दलों को करोड़ों रुपए का चंदा दिया है। इसमें रिश्वत, कालेधन को सफेद करने और फर्जी नाम से चल रही विदेशी कंपनियों के जरिए धनशोधन का मामला भी बन सकता है। चूंकि चंदा उगाही की इस पूरी प्रक्रिया को सूचनाधिकार के दायरे से बाहर रखा गया था, इसलिए इसके बारे में सही जानकारी नहीं मिल पा रही थी। इसीलिए सर्वोच्च न्यायालय ने इसे राजनीतिक दलों के बराबरी के हक का उल्लंघन और असंवैधानिक करा दिया था।

Advertisement

कुछ लोगों के इस तर्क को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि स्टेट बैंक इसलिए जून तक का समय मांग रहा है कि तब तक लोकसभा के चुनाव संपन्न हो चुके होंगे और चुनावी चंदे में आए नामों को लेकर राजनीतिक विवाद पैदा होने से बचा जा सकेगा। चूंकि पिछले पांच वर्षों में सबसे अधिक चुनावी चंदा सत्ताधारी दल को मिला है, इसलिए विपक्षी दलों को इस पर अंगुली उठाने का मौका मिल गया है।

सर्वोच्च न्यायालय स्टेट बैंक की फरियाद पर क्या रुख अख्तियार करता है, देखने की बात है। मगर जिस तरह उसने इस पूरी प्रक्रिया को असंवैधानिक करार दिया, उससे उम्मीद बनती है कि इस पर वह कड़ा रुख अपना सकता है। स्टेट बैंक की इस दलील को मान भी लिया जाए कि चुनावी बांड के ब्योरे का एक हिस्सा हाथ से दर्ज किया गया है, तब भी अगर मंशा सही हो, जिम्मेदारी से बचने का मामला नहीं हो और सिर्फ कुछ कर्मचारियों को इसी काम में लगा दिया जाए तो सारा विवरण सामने आने में वक्त नहीं लगेगा।

Advertisement
Tags :
Advertisement
tlbr_img1 राष्ट्रीय tlbr_img2 ऑडियो tlbr_img3 गैलरी tlbr_img4 वीडियो