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संपादकीय: राष्ट्र की संप्रभुता का सम्मान, केजरीवाल की गिरफ्तारी पर अमेरिका, जर्मनी और UNO की टिप्पणियां अनुचित

अरविंद केजरीवाल की गिरफ्तारी कोई ऐसा मामला नहीं था, जिसका अंतरराष्ट्रीय समुदाय पर कोई बुरा और व्यापक असर पड़ता हो। यहां की जांच एजंसियों ने कानून के दायरे में रहते हुए उनके खिलाफ कार्रवाई की और उसको केजरीवाल की तरफ से अदालत में चुनौती भी दी गई है।
Written by: जनसत्ता
नई दिल्ली | Updated: April 04, 2024 14:28 IST
संपादकीय  राष्ट्र की संप्रभुता का सम्मान  केजरीवाल की गिरफ्तारी पर अमेरिका  जर्मनी और uno की टिप्पणियां अनुचित
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दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की गिरफ्तारी पर अमेरिका, जर्मनी और संयुक्त राष्ट्र के अधिकारियों की टिप्पणियों पर भारत सरकार ने सख्त एतराज जताया था। अब विदेशमंत्री ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय को आगाह किया है कि उन्हें भारत के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप से परहेज करना चाहिए, नहीं तो इसका बहुत कड़ा जवाब मिलेगा। आमतौर पर अपेक्षा की जाती है कि हर राष्ट्र दूसरे राष्ट्र की संप्रभुता का सम्मान करे और उनके आंतरिक मामलों में दखल देने से परहेज करे, मगर अक्सर देखा जाता है कि कमजोर देशों के मामलों में ताकतवर देश हस्तक्षेप करने का प्रयास करते हैं। इसी आदत के चलते जर्मनी, अमेरिका और संयुक्त राष्ट्र के अधिकारियों ने भारत सरकार को लोकतांत्रिक मूल्यों का पाठ पढ़ाने की कोशिश की थी।

ऐसा नहीं माना जा सकता कि उन राजनयिकों को इस बात की जानकारी नहीं थी कि भारत किस कदर भ्रष्टाचार और धनशोधन संबंधी मामलों को लेकर गंभीर है। ऐसे मामलों के आरोपियों के खिलाफ सख्त कदम उठाता है। फिर भी उन्होंने अरविंद केजरीवाल की गिरफ्तारी पर टिप्पणी की तो उससे यही जाहिर हुआ कि वे भारत के विपक्षी दलों के सुर में सुर मिला रहे हैं। उनकी टिप्पणियों से विपक्षी दलों को सरकार की आलोचना करने का आधार मिल गया था।

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यह ठीक है कि यह पहला मौका था जब किसी मुख्यमंत्री को पद पर रहते हुए गिरफ्तार किया गया। उस गिरफ्तारी में समय के चुनाव को लेकर भी सवाल उठे, क्योंकि तब तक आम चुनाव की तारीखों की घोषणा हो चुकी थी। इस तरह चुनाव में सभी राजनीतिक दलों को समान सुविधाएं और अवसर उपलब्ध कराने का सैद्धांतिक पक्ष बाधित नजर आने लगा। मगर इस पर नजर रखने और कार्रवाई करने का अधिकार भारत के निर्वाचन आयोग और अदालतों को है, न कि संयुक्त राष्ट्र, अमेरिका या जर्मनी के किसी राजनयिक को।

यह भी ठीक है कि हर देश अपने राजनयिकों के जरिए दूसरे देशों की राजनीतिक गतिविधियों पर नजर रखता, वहां के चुनावों की खोज-खबर लेता रहता है, मगर वह चुनाव प्रक्रिया या वहां के राजनीतिक विवादों में पक्षकार की तरह शामिल नहीं हो सकता। वैसे भी अमेरिका, जर्मनी और संयुक्त राष्ट्र पर अनेक बार सवाल उठते रहे हैं कि वह अपने मित्र राष्ट्रों में हो रहे मानवाधिकारों के उल्लंघन तक पर चुप्पी साधे रहते हैं। फिलिस्तीन के खिलाफ नियम-कायदों को ताक पर रख कर चलाई जा रही इजराइल की कार्रवाइयों पर वे क्यों मुखर होकर नहीं बोलते या तन कर खड़े होते!

अरविंद केजरीवाल की गिरफ्तारी कोई ऐसा मामला नहीं था, जिसका अंतरराष्ट्रीय समुदाय पर कोई बुरा और व्यापक असर पड़ता हो। यहां की जांच एजंसियों ने कानून के दायरे में रहते हुए उनके खिलाफ कार्रवाई की और उसको केजरीवाल की तरफ से अदालत में चुनौती भी दी गई है। उसके गलत या सही होने का निर्णय अदालत को करना है। उनके पहले भी इसी मामले में कई दूसरे नेता गिरफ्तार किए जा चुके थे। अमेरिका, जर्मनी, संयुक्त राष्ट्र या किसी भी दूसरे देश को उसमें हस्तक्षेप करने का कोई तुक नहीं बनता। हर देश की अपनी संप्रभुता है और वह अपने नियम-कायदों, कानूनों के जरिए चलता है। संयुक्त राष्ट्र को उसके किसी फैसले पर तभी कोई टिप्पणी करने का हक है, जब उससे अंतरराष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन होता हो। इसलिए भारत के विदेश मंत्रालय ने उचित ही अंतरराष्ट्रीय समुदाय को ऐसी टिप्पणियों के प्रति आगाह किया है।

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