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Jansatta Editorial: कूनो राष्ट्रीय उद्यान में चीतों की मौत की घटनाओं से उपजे सवाल

भारत में 1952 में आधिकारिक रूप से एशियाई चीतों के लुप्त होने की घोषणा कर दी गई थी। हालांकि उन्नीसवीं सदी के पहले तक भारत और समूचे एशिया में चीते आम थे।
Written by: जनसत्ता | Edited By: Bishwa Nath Jha
नई दिल्ली | Updated: January 18, 2024 09:25 IST
jansatta editorial  कूनो राष्ट्रीय उद्यान में चीतों की मौत की घटनाओं से उपजे सवाल
प्रतीकात्‍मक तस्‍वीर। फोटो- (इंडियन एक्‍सप्रेस)।
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मध्य प्रदेश के कूनो राष्ट्रीय उद्यान में चीतों की मौत की घटनाएं यह बताने के लिए काफी हैं कि उत्साह के बरक्स संरक्षण को लेकर दूरदर्शिता में कमी और पारिस्थितिकी की बारीकियों को नजरअंदाज करना कैसे नतीजे दे सकता है। गौरतलब है कि मंगलवार को कूनो उद्यान में ‘शौर्य’ नाम के एक चीते की मौत हो गई। नामीबिया और दक्षिण अफ्रीका से लाए गए चीतों में से अब तक दस की मौत हो चुकी है।

कुछ समय पहले से ऐसी लगातार घटनाओं को लेकर चिंता जताई जा रही है और अपेक्षा की जा रही है कि सरकार बचे हुए चीतों के जीवन की सुरक्षा के लिए जरूरी उपाय करेगी। मगर जिस तरह कुछ अंतराल पर चीतों की मौत की खबरें आ रही हैं, उससे यह सवाल उठ रहा है कि क्या भारत का मौसम इन चीतों के लिए प्रतिकूल है या फिर यह व्यवस्था और देखरेख में कमी की वजह से उपजी समस्या है।

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आखिर क्या वजह है कि नामीबिया और दक्षिण अफ्रीका से लाए जाने के कुछ समय बाद चीतों के मरने का सिलसिला शुरू हो गया? अपने मूल देशों के जलवायु में रचे-बसे चीतों को भारत में लाने के साथ क्या यह सुनिश्चित किया गया कि उन चीतों को उनके अनुकूल पारिस्थितिकी मिल सके, ताकि वे अपना स्वाभाविक जीवन जी सकें!

भारत में 1952 में आधिकारिक रूप से एशियाई चीतों के लुप्त होने की घोषणा कर दी गई थी। हालांकि उन्नीसवीं सदी के पहले तक भारत और समूचे एशिया में चीते आम थे। मगर बेलगाम शौक के तहत चीतों को कैद करने या फिर उनका शिकार करने की वजह से इस क्षेत्र के ज्यादातर देशों में एशियाई कहे जाने वाले चीते खत्म हो गए।

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अब करीब सात दशक बाद भारत में चीतों को फिर से बसाने के लिए ‘प्रोजेक्ट चीता’ के तहत प्रयास शुरू तो हुए, मगर इस बीच कूनो में जो चीते लाए गए, वे अफ्रीकी आबोहवा से जीवन पाने वाले हैं। इस बारे में आई एक खबर में शोधकर्ताओं और वैज्ञानिकों के हवाले से यह भी बताया गया कि इस पुनर्वास के दौरान ‘स्थानीय पारिस्थितिकी’ के पहलू को नजरअंदाज किया गया।

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इन चीतों की जरूरत के मुकाबले कूनो राष्ट्रीय उद्यान के आकार को भी बहुत कम बताया गया। हालांकि इस मसले पर उपजी आलोचनाओं और सुप्रीम कोर्ट की ओर से जताई गई चिंता के बाद सरकार ने पिछले साल यह सफाई दी थी कि इस बात पर विश्वास करने का कोई कारण नहीं है कि चीतों की मौतें किसी अंतर्निहित अनुपयुक्तता की वजह से हुईं। सवाल है कि फिर एक-एक करके चीते क्यों दम तोड़ते जा रहे हैं!

यह संभव है कि अफ्रीकी जलवायु के अभ्यस्त रहे चीतों को भारत का मौसम रास नहीं आ रहा हो और उनका शरीर यहां जीवित रहने को लेकर संतुलन बना पाने में नाकाम हो रहा हो। यह भी हैरानी की बात है कि बीते कई महीने से चीतों की मौत का सिलसिला कायम रहने के बावजूद अब तक उनके मरने का कोई स्पष्ट कारण नहीं खोजा जा सका है।

‘प्रोजेक्ट चीता’ के बावजूद जिस तरह यहां इस पशु की जान जा रही है, उससे यह सवाल उठना लाजिमी है कि या तो उनकी पारिस्थितिकी और प्राकृतिक बनावट के मुताबिक जलवायु की जरूरत पर गौर करने की जरूरत नहीं समझी गई या फिर अब तक उनके रखरखाव को लेकर जरूरी समझ नहीं बन सकी है। यह ध्यान रखने की जरूरत है कि बड़े शिकारी जीवों के इलाके में कई वनस्पतियों को फिर से पनपने के लिए अनुकूल स्थितियां बनती हैं। जिस तरह ये चीते अपना इलाका और जीवन खो रहे हैं, उसका असर न सिर्फ उनकी आबादी पर, बल्कि समूची पारिस्थितिकी पर पड़ेगा।

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