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संपादकीय: अयोध्या में सद्भाव की प्रतिष्ठा, जन्मस्थान पर विराजमान हुए प्रभु श्रीराम

राम विग्रह की प्राण प्रतिष्ठा से पहले और उसके बाद भी प्रधानमंत्री ने संकल्प दोहराया कि वे राम के आदर्शों पर चलते हुए सुशासन स्थापित करने का प्रयास कर रहे हैं। निश्चय ही यह संकल्प उम्मीदें जगाता है।
Written by: जनसत्ता
नई दिल्ली | Updated: January 23, 2024 08:12 IST
संपादकीय  अयोध्या में सद्भाव की प्रतिष्ठा  जन्मस्थान पर विराजमान हुए प्रभु श्रीराम
अयोध्या में भगवान की प्राण-प्रतिष्ठा के बाद रामलला की पहली तस्वीर। (ANI)
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अयोध्या में राम विग्रह की प्राण प्रतिष्ठा सौहार्द और उल्लासपूर्ण वातावरण में हो गई। इसके साथ ही लंबे समय से चला आ रहा विवाद भी समाप्त हो गया। राम भारतीय आस्था के प्रतीक हैं। पौराणिक प्रमाणों के अनुसार उनका जन्मस्थान उसी जगह को माना जाता है, जहां अभी भव्य मंदिर बना है। इसी जगह को लेकर करीब पांच सौ वर्षों से विवाद था। भाजपा की प्रमुख प्रतिज्ञाओं में से एक यह भी थी कि वह राम मंदिर का निर्माण राम के मूल जन्म स्थान पर ही कराएगी। इस तरह भाजपा की प्रतिज्ञा भी पूरी हो गई। विवाद इस बात को लेकर था कि राम मंदिर को ध्वस्त कर आक्रांता शासकों ने वहां मस्जिद खड़ी कर दी थी। उस जगह पर मालिकाना हक पाने के लिए संत समाज संघर्ष कर रहा था।

अंग्रेजी हुकूमत ने इसका निपटारा दोनों समुदायों के लिए अलग-अलग पूजा करने की इजाजत देकर किया था। मगर संत समाज उससे संतुष्ट नहीं था। आजादी के बाद उस जगह को प्राप्त करने के लिए देश के विभिन्न न्यायालयों का दरवाजा खटखटाया गया। कई मौकों पर केंद्र और उत्तर प्रदेश सरकार ने भी मामले को सुलझाने का प्रयास किया, मगर कोई व्यावहारिक हल नहीं निकल सका। फिर इसके लिए भाजपा ने देशव्यापी आंदोलन चलाया और कारसेवकों के दल ने विवादित ढांचे को ध्वस्त कर दिया था। तब अनवरत सुनवाइयों, गवाहियों के बाद आखिरकार सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला दिया कि विवादित जगह मूल रूप से राम जन्मस्थान है और उस पर संत समाज का हक है।

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इस मंदिर को बनने में इसलिए इतना वक्त लग गया कि संवैधानिक सिद्धांतों और लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत किसी एक आस्था के पक्ष में एकतरफा फैसला करना किसी भी सरकार के लिए मुश्किल जान पड़ता था। हालांकि उसमें राजनीतिक नजरिया भी शामिल था। जबकि आखिरकार सर्वोच्च न्यायालय ने तर्क दिया कि राम जन्मभूमि भारतीय आस्था से जुड़ा मामला है, इसलिए विवादित जगह पर उसे स्वामित्व दिया जाना चाहिए। दूसरे पक्ष के लिए अलग से जगह प्रदान की जानी और उस पर उनकी इच्छा के अनुरूप पूजा स्थल का निर्माण कराया जाना चाहिए। वह फैसला दोनों पक्षों ने मंजूर किया।

अगर इस मामले को राजनीतिक रंग न दिया गया होता, तो शायद यह इतना लंबा न खिंचता। जब राममंदिर आंदोलन शुरू हुआ तो अल्पसंख्यक समुदाय के भीतर तरह-तरह से भय भरने और उसे उकसाने का भी प्रयास किया जाता रहा। मगर अच्छी बात है कि सर्वोच्च न्यायालय का फैसला आने और उसके बाद राम मंदिर निर्माण की प्रक्रिया शुरू होने के बाद किसी तरह की कोई अप्रिय घटना नहीं घटी। किसी प्रकार का उन्माद का वातावरण नहीं बना।

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राम विग्रह की प्राण प्रतिष्ठा से पहले और उसके बाद भी प्रधानमंत्री ने संकल्प दोहराया कि वे राम के आदर्शों पर चलते हुए सुशासन स्थापित करने का प्रयास कर रहे हैं। निश्चय ही यह संकल्प उम्मीदें जगाता है। भारत जैसे धर्मबहुल और विविध संस्कृतियों वाले देश में सुशासन की नीव सद्भावना पर ही टिकती है। जिस तरह मंदिर निर्माण और उसमें प्राण प्रतिष्ठा तक सौहार्द और सद्भाव का वातावरण दिखाई दिया, वह इस नींव की मजबूती का भरोसा पैदा करता है। राम तो पुरुषोत्तम हैं, समदर्शी और सद्भावना के प्रतीक हैं। इसीलिए रामराज किसी भी शासन की आत्यंतिक कसौटी है। लोक आस्था से जुड़े राम का मंदिर लोक को समर्पित कर भाजपा और उसकी सरकारों ने अपना संकल्प पूरा कर दिया है, अब उसके सामने सद्भाव और सुशासन का वातावरण बनाने के संकल्प पर खरा उतरने की परीक्षा है।

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