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संपादकीय: लोकतंत्र में राजनेता और मर्यादा, अवांछित बयानों और शब्दों से गिर रही है राजनीति की गरिमा

लोकतंत्र में सहमति-असहमति एक जरूरी प्रक्रिया है। मगर इस क्रम में कोई भी नेता अगर किसी के खिलाफ अभद्र और अशिष्ट शब्द या लहजे का प्रयोग करता है, तो यह राजनीति में गिरावट का ही संकेत है।
Written by: जनसत्ता
नई दिल्ली | Updated: April 05, 2024 14:24 IST
संपादकीय  लोकतंत्र में राजनेता और मर्यादा  अवांछित बयानों और शब्दों से गिर रही है राजनीति की गरिमा
कांग्रेस नेता रणदीप सुरजेवाला। (इमेज- सोशल मीडिया/वीडियो ग्रैब)
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मुद्दों के आधार पर तर्कों के जरिए अपने प्रतिद्वंद्वी राजनेताओं के खिलाफ बयानबाजी करते हुए भाषा में तल्खी का इस्तेमाल अनुचित नहीं है, लेकिन अगर ऐसा करते हुए बदजुबानी या अभद्रता हावी होने लगे तो यह हर लिहाज से गलत है। अफसोसनाक यह है कि इस मसले पर अक्सर विवाद उभरने और ज्यादातर मामलों में माफी मांगने या सफाई देने की नौबत आने के बावजूद राजनीतिक शख्सियतों के बीच आरोप-प्रत्यारोप अक्सर बेलगाम बोल में तब्दील हो जाते हैं। न तो निजी स्तर पर अपनी सोच-समझ का ध्यान रखा जाता है, न ही चुनावों के संदर्भ में लागू आचार संहिता का। इससे एक ओर स्वस्थ बहस की स्थितियां बाधित होती हैं, वहीं कई बार ऐसी बातें बोल दी जाती हैं कि बाद में किसी मौके पर एक दूसरे का सामना करने में भी असहज होना पड़े।

नेताओं को ऐसे शब्दों को बोलने से परहेज करना चाहिए

अपनी बात कहने के क्रम में नाहक ही किसी शब्द का इस्तेमाल करने से उभरे विवाद के बाद किसी नेता की ओर से सफाई के तौर पर भले यह कहा जाता है कि उनकी बातों को आधे-अधूरे संदर्भ में या फिर तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया, मगर सवाल है कि बिना किसी जरूरत के किसी को लक्षित करके वैसे शब्दों का प्रयोग क्यों किया जाता है, जिसके लिए सफाई देना या माफी मांगना पड़े। विडंबना यह है कि ऐसे असुविधाजनक हालात और उनके हश्र बार-बार सामने आने के बावजूद कुछ नेताओं को न तो अपने प्रतिद्वंद्वियों की और न अपनी गरिमा का खयाल रखना जरूरी लगता है। फिलहाल आम चुनावों का कार्यक्रम घोषित होने के बाद सभी राजनीतिक दल अपने-अपने स्तर पर जनसंपर्क अभियान चला रहे हैं।

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सफाई के तौर पर 'आधे-अधूरे तरीके से पेश' की बात भी अनुचित

इस क्रम में कांग्रेस के नेता रणदीप सुरजेवाला ने अपने भाषण में जिस तरह भाजपा की एक महिला नेता की गरिमा का हनन करने वाले शब्दों का प्रयोग किया, वह सिर्फ एक उदाहरण है कि कई वरिष्ठ नेता भी अपनी जुबान पर काबू रखना जरूरी नहीं समझते। जब अवांछित शब्दों से विवाद खड़ा हो गया और मामले ने तूल पकड़ना शुरू किया तब सफाई के तौर पर सुरजेवाला ने कहा कि उनकी बातों को आधे-अधूरे तरीके से पेश किया गया। मगर सभी जानते हैं कि गैरजरूरी तरीके से कुछ बोल जाने के बाद इस तरह की सफाई का कोई मतलब नहीं होता। यह अकारण नहीं है कि इस मसले पर राष्ट्रीय महिला आयोग ने भी संज्ञान लिया। यह अकेला मामला नहीं है जिसमें किसी नेता ने अमर्यादित टिप्पणी की हो। अक्सर राष्ट्रीय पार्टियों के शीर्ष नेताओं के बोल भी बहक जाते हैं और किसी की गरिमा को चोट पहुंचा जाते हैं। अफसोसनाक यह भी है कि इस तरह बोलते हुए इसका खयाल रखना जरूरी नहीं समझा जाता कि किसी महिला को लक्ष्य बना कर अभद्र या मजाक उड़ाने की भाषा का प्रयोग करने का क्या असर पड़ता है।

इस तरह की बदजुबानी से न केवल किसी अन्य नेता के सम्मान को चोट पहुंचती है, बल्कि ऐसी बातें बोलने वाले के व्यक्तित्व में छिपी कुंठा भी सामने आती है। सवाल है कि भाषणों में बदजुबानी या गलत तरीके से कुछ बोलने के जरिए चुनाव में जीत की कोशिश करने वाले नेता क्या अपना सम्मान इसी तरह सुनिश्चित करना चाहते हैं! आमतौर पर चुनाव आयोग भी ऐसा करने वाले नेताओं के खिलाफ कार्रवाई कर कोई ठोस संदेश नहीं देता। लोकतंत्र में सहमति-असहमति एक जरूरी प्रक्रिया है। मगर इस क्रम में कोई भी नेता अगर किसी के खिलाफ अभद्र और अशिष्ट शब्द या लहजे का प्रयोग करता है, तो यह राजनीति में गिरावट का ही संकेत है।

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