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Jansatta Editorial: वादे और इरादे, आम मतदाताओं पर कितना प्रभाव छोड़ पाएगा 'संकल्प पत्र'

विपक्ष का कहना है कि सरकारी विभागों में खाली पदों पर भर्तियां करने का बजाय भाजपा निजी उद्यम के जरिए रोजगार उपलब्ध कराने का भरोसा दिला रही है।
Written by: जनसत्ता | Edited By: Bishwa Nath Jha
नई दिल्ली | Updated: April 16, 2024 08:01 IST
jansatta editorial  वादे और इरादे  आम मतदाताओं पर कितना प्रभाव छोड़ पाएगा  संकल्प पत्र
प्रतीकात्मक तस्वीर। फोटो -(इंडियन एक्सप्रेस)।
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राजनीतिक दलों के चुनावी घोषणापत्र एक प्रकार से उस दल के विभिन्न मुद्दों पर दृष्टिकोण और वचनबद्धता का दस्तावेज होते हैं। उनके आधार पर लोगों को यह निर्णय करने में मदद मिलती है कि किस पार्टी की सरकार उनके हितों के लिए काम करेगी। लगभग सभी पार्टियां अपने घोषणापत्र जारी कर चुकी हैं। भाजपा ने भी अपना संकल्प पत्र जारी कर दिया।

इसका लोगों को काफी समय से इंतजार था। इसलिए कि सत्ताधारी दल की घोषणाओं पर सबसे अधिक नजर रहती है। भाजपा अपने घोषणापत्र को ‘संकल्प पत्र’ कहती है, इस बार उसमें ‘मोदी की गारंटी’ पद और जोड़ दिया गया है। प्रधानमंत्री कई महीनों से सार्वजनिक मंचों से कुछ कार्यों और योजनाओं की गारंटी का एलान करते आ रहे हैं।

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वे बातें संकल्प पत्र में भी शामिल कर ली गई हैं। इसमें पिछले संकल्प पत्रों में किए गए वादों को पूरा करने का भी उल्लेख है, जिसमें अनुच्छेद तीन सौ सत्तर, राम मंदिर आदि शामिल हैं। मगर अगली सरकार में ज्यादातर पुरानी योजनाओं को ही आगे बढ़ाने और उनका दायरा विस्तृत करने पर जोर है। मसलन, आयुष्मान योजना, जन औषधि, प्रधानमंत्री आवास योजना, मुद्रा योजना, लखपती दीदी, अगले पांच साल तक मुफ्त राशन आदि।

इस पर विपक्ष ने यह कहते हुए निशाना साधना शुरू कर दिया है कि संकल्प पत्र में उन बुनियादी वादों को बड़ी चतुराई से छिपा दिया गया है, जो पिछले चुनावों में किए गए थे। इसके उदाहरण के रूप में वे गरीबी, बेरोजगारी, महंगाई और किसानों की आय दोगुनी करने का मुद्दा उठा रहे हैं। दरअसल, पहले ही कार्यकाल में भाजपा ने हर वर्ष दो करोड़ नौकरियां देने का वादा किया था।

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वह वादा अभी तक पूरा नहीं हो सका है। बेरोजगारी का स्तर चिंताजनक बन चुका है। भाजपा ने अपने ताजा संकल्प पत्र में भी दोहराया है कि उसके कार्यकाल में पच्चीस करोड़ लोग गरीबी से बाहर निकले, मगर सच्चाई यह भी है कि करीब बयासी करोड़ लोग मुफ्त राशन पर गुजारा करने को अभिशप्त हैं।

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अगर रोजगार के अवसर उपलब्ध होते, तो लोग खुद मेहनत करके कमाते और खाते। महंगाई से पार पाने में भारतीय रिजर्व बैंक के पसीने छूट रहे हैं। किसानों की आय अगर सचमुच दोगुनी हो गई होती तो इस तरह आंदोलन न खड़े होते, जिन पर काबू पाने के लिए सड़कों पर दीवारें खड़ी करनी पड़ीं और आंसू गैस के गोले बरसाने पड़े।

हालांकि विपक्ष के इन आरोपों के जवाब में भाजपा विकास का जो नक्शा पेश कर रही है, उसमें युवाओं, महिलाओं, किसानों और गरीबों के लिए गारंटीशुदा योजनाएं हैं। संकल्प पत्र में युवाओं के लिए आधारभत ढांचे, विनिर्माण, स्टार्टअप, खेल, निवेश, उच्चस्तरीय सेवाओं और पर्यटन के जरिए रोजगार के अवसर पैदा करने का नक्शा है।

विपक्ष का कहना है कि सरकारी विभागों में खाली पदों पर भर्तियां करने का बजाय भाजपा निजी उद्यम के जरिए रोजगार उपलब्ध कराने का भरोसा दिला रही है। इस तरह विकास की क्या सूरत बन सकती है? संकल्प पत्र में कही बातों के अलावा चुनावी मंचों से जो बातें कही जा रही हैं, वे अलग हैं। एक देश, एक चुनाव और समान नागरिक संहिता पर बल है।

भ्रष्टाचार मिटाने पर सबसे अधिक जोर दिया जा रहा है। मगर भ्रष्टाचार के प्रति प्रतिबद्धता को लेकर खुद सरकार के कामकाज पर गहरे सवाल उठ रहे हैं। देखना है, पक्ष और विपक्ष के इन विश्लेषणों से परे संकल्प पत्र आम मतदाता पर कितना प्रभाव छोड़ पाता है।

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