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संपादकीय: कानून का घेरा और परीक्षाओं में गड़बड़ी करने वालों पर शिकंजा, सरकार के एक्शन का कितना होगा असर

हाल में नीट और यूजीसी-नेट की परीक्षाओं में प्रश्न-पत्रों के बाहर आ जाने और अन्य गड़बड़ियों से उपजे विवाद के बीच इस कानून को लागू करने के कदम को महत्त्वपूर्ण माना जा रहा है।
Written by: जनसत्ता
नई दिल्ली | Updated: June 24, 2024 08:07 IST
संपादकीय  कानून का घेरा और परीक्षाओं में गड़बड़ी करने वालों पर शिकंजा  सरकार के एक्शन का कितना होगा असर
नीट यूजी विवाद को लेकर झारखंड के देवघर से दो गिरफ्तारियां हुई हैं।
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पिछले कुछ दिनों से राष्ट्रीय स्तर पर कुछ महत्त्वपूर्ण परीक्षाओं में धांधली, प्रश्न-पत्रों के बाहर आ जाने के मसले पर जिस तरह का रोष देखा जा रहा है, वह स्वाभाविक है। ऐसे हर विवाद के बाद सरकार का यही आश्वासन सामने आता रहा है कि वह मामले की जांच और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई करेगी। मगर वर्षों से यह समस्या बदस्तूर कायम है। अब शुक्रवार को केंद्र सरकार ने जिस कानून को लागू किया है, उसका उद्देश्य प्रतियोगी परीक्षाओं में गड़बड़ी और कदाचार पर रोक लगाना है।

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दरअसल, करीब चार महीने पहले लोक परीक्षा (अनुचित साधनों का निवारण) विधेयक, 2024 को मंजूरी मिली थी और अब इसे कानून की शक्ल में लागू किया गया है। इसके प्रावधानों को बेहद सख्त माना जा रहा है और उम्मीद की जा रही है कि अब अलग-अलग स्तर की परीक्षाओं में धांधली पर लगाम लगेगी। हाल में नीट और यूजीसी-नेट की परीक्षाओं में प्रश्न-पत्रों के बाहर आ जाने और अन्य गड़बड़ियों से उपजे विवाद के बीच इस कानून को लागू करने के कदम को महत्त्वपूर्ण माना जा रहा है।

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गौरतलब है कि इस कानून का मुख्य उद्देश्य संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी), कर्मचारी चयन आयोग (एसएससी), रेलवे, बैंकिंग भर्ती परीक्षाओं और राष्ट्रीय परीक्षा एजंसी (एनटीए) आदि द्वारा आयोजित परीक्षाओं में अनुचित साधनों के प्रयोग को रोकना है। यों परीक्षा में नकल या प्रश्न पत्रों को समय से पहले ही बाहर निकालना पहले भी गैरकानूनी रहा है, मगर इस कानून के पहले कोई धांधली किए जाने या अपराध होने की स्थिति में उससे निपटने के लिए कोई विशिष्ट कानून नहीं था।

अब अगर नकल कराने जैसी अवैध हरकत के आरोप में कोई पकड़ा जाता है, दोषसिद्धि की स्थिति में उसे न्यूनतम तीन से पांच वर्ष तक के कारावास और ऐसे संगठित अपराध में शामिल लोगों को पांच से दस वर्ष तक की जेल की सजा दी जाएगी। इसमें न्यूनतम एक करोड़ रुपए जुर्माने का भी प्रावधान है। हालांकि इस कानून के तहत प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं में शामिल होने वाले विद्यार्थियों को इसके दायरे से बाहर रखा गया है।

यह जगजाहिर हकीकत रही है कि अपराधों पर रोक लगाने के लिए कानून बनाए जाते हैं, लेकिन उनकी अहमियत कई बार दस्तावेजों में सीमित रहती है। उसे वास्तव में लागू करने को लेकर मजबूत इच्छाशक्ति नहीं दिखती है। जबकि सख्ती से अमल को सुनिश्चित किए बिना कोई भी कानून बेमानी रहेगा। सरकार और संबंधित महकमों को इस बात पर मंथन करना चाहिए कि नकल का रोग पहले भी गैरकानूनी रहा है, मगर उस पर नकेल कसने के प्रति उदासीनता के क्या कारण रहे? आखिर किन वजहों से स्कूल-कालेज स्तर की परीक्षाओं में नकल की बीमारी नौकरियों और चिकित्सा या इंजीनियरिंग पाठ्यक्रमों में दाखिले के लिए होने वाली परीक्षाओं तक में फैल गई?

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जबकि पिछले कुछ वर्षों में संवेदनशील परीक्षाओं में आधुनिक और उन्नत तकनीकी संसाधनों का इस्तेमाल बढ़ा है, साइबर क्षेत्र में नित नए प्रयोगों के जरिए भी बहुस्तरीय निगरानी का तंत्र भी मजबूत बनाया गया है। इसके बावजूद राष्ट्रीय स्तर पर बेहद अहम मानी जाने वाली परीक्षाओं में नकल या प्रश्न-पत्रों के बाहर आने जैसी धांधली को रोकने में सरकार नाकाम रही। अब नया कानून तभी सार्थक साबित हो सकेगा, जब इसे लागू करने को लेकर वास्तव में इच्छाशक्ति दिखाई जाए, ताकि राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित अहम परीक्षाओं में पूरी पारदर्शिता सुनिश्चित की जा सके।

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