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संपादकीय: ब्रह्मांड में ब्लैक होल का रहस्य, वैज्ञानिकों के लिए पर्दा हटाना अब भी बड़ी चुनौती

नब्बे के दशक तक भारत को उपग्रह प्रक्षेपण के मामले में भी दूसरे देशों पर निर्भर रहना पड़ता था, अब वह न केवल इस क्षेत्र में आत्मनिर्भर हुआ है, बल्कि दुनिया के उपग्रह प्रक्षेपण के बाजार में विकसित देशों से होड़ कर रहा है।
Written by: जनसत्ता
नई दिल्ली | Updated: January 02, 2024 07:59 IST
संपादकीय  ब्रह्मांड में ब्लैक होल का रहस्य  वैज्ञानिकों के लिए पर्दा हटाना अब भी बड़ी चुनौती
सौरमंडल के सारे ग्रह गुरुत्वाकर्षण बल के जरिए ही परस्पर जुड़े, एक-दूसरे को संतुलित करते हुए गतिमान हैं।
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ब्रह्मांड से जुड़े अनेक तथ्य आज भी अवधारणाओं तक सीमित हैं। वैज्ञानिक खोजों के जरिए उन पर से पर्दा हटाना अब भी एक बड़ी चुनौती है। कृष्ण विवर यानी ब्लैक होल भी एक ऐसा ही रहस्य है। वैज्ञानिकों का मानना है कि जब भी कोई तारा अपने भीतर सिकुड़ जाता है तो कृष्ण विवर में परिवर्तित हो जाता है। उस खाली जगह का गुरुत्वाकर्षण इतना तीव्र होता है कि वह आसपास के तारों को भी अपने भीतर खींच लेता है। इस तरह उनका द्रव्यमान भी उसी में समाहित हो जाता है।

अरबों वर्ष बाद सूर्य भी दूसरे ग्रहों को अपने मिलाकर ब्लैक होल बन जाएगा

अवधारणा है कि अरबों वर्ष बाद सूर्य भी एक कृष्ण विवर में परिवर्तित होकर दूसरे तारों को अपने में समाहित करना शुरू कर देगा। माना जाता है कि इसी तरह एक दिन सारे ग्रह ब्लैक होल में समा जाएंगे। मगर अभी तक किसी कृष्ण विवर की विश्वसनीय तस्वीर सामने नहीं आ सकी है। जो भी तस्वीरें उपलब्ध हैं, वे वैज्ञानिकों की कल्पना पर ही आधारित हैं। अब इस रहस्य पर से पर्दा उठाने के मकसद से भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी इसरो ने एक्स-रे पोलरिमीटर यानी एक्सपोसैट का प्रक्षेपण किया है। इससे अंतरिक्ष में एक ऐसी वेधशाला स्थापित की जाएगी, जो विशेष रूप से कृष्ण विवर का ही अध्ययन करेगी।

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अमेरिकी अंतरिक्ष अनुसंधान केंद्र नासा अपनी एक Observatory बनाया है

हालांकि इससे पहले कृष्ण विवर के अध्ययन के लिए अमेरिकी अंतरिक्ष अनुसंधान केंद्र नासा अपनी एक वेधशाला स्थापित कर चुका है। मगर उसकी उम्र केवल दो साल की थी, जो अब समाप्त होने को है। भारतीय एक्सपोसैट के पांच साल तक काम करने का अनुमान है। इस तरह यह वेधशाला अधिक समय तक अंतरिक्ष में रह कर ब्लैक होल का पता लगाने और उससे जुड़े तथ्य जुटा पाने में सक्षम होगा।

भारत पहले ही चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर चंद्रयान तृतीय की ‘साफ्ट लैंडिंग’ करा कर और सूर्य का अध्ययन करने के उद्देश्य से आदित्य एल-1 का प्रक्षेपण कर अंतरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र में अपनी उपलब्धियों का परचम लहरा चुका है। एक्सपोसैट का प्रक्षेपण कर एक नया कीर्तिमान स्थापित किया है। अगर इस अभियान में इसरो कृष्ण विवर से जुड़े रहस्यों पर से पर्दा उठाने में कामयाब रहता है, तो निस्संदेह यह दुनिया के अंतरिक्ष अनुसंधान में बहुत बड़ी उपलब्धि होगी।

नब्बे के दशक तक भारत को उपग्रह प्रक्षेपण के मामले में भी दूसरे देशों पर निर्भर रहना पड़ता था, अब वह न केवल इस क्षेत्र में आत्मनिर्भर हुआ है, बल्कि दुनिया के उपग्रह प्रक्षेपण के बाजार में विकसित देशों से होड़ कर रहा है। अब वह अपने बूते बहुत कम लागत में उपग्रह निर्माण कर अनुसंधान के लिए भी भेजना शुरू कर चुका है। एक्सपोसैट उसी की अगली कड़ी है।

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दरअसल, ब्रह्मांडीय विचलनों के चलते पृथ्वी ग्रह पर जीवन को लेकर अनेक चुनौतियां पैदा होने लगी हैं। चूंकि सौरमंडल के सारे ग्रह गुरुत्वाकर्षण बल के जरिए ही परस्पर जुड़े, एक-दूसरे को संतुलित करते हुए गतिमान हैं, इसलिए मंदाकिनी के तारों का अचानक लुप्त होना और अपने पीछे एक ब्लैक होल छोड़ जाना सौरमंडल के लिए खतरे का संकेत है।

इनका द्रव्यमान इतना सघन और गुरुत्वाकर्षण इतना तीव्र होता है कि प्रकाश की किरणें भी उनके पार नहीं जा पातीं। वे उन्हें अवशोषित कर लेते हैं। इनका अध्ययन उन उपायों की तलाश का रास्ता भी खोलेगा, जिनसे कृष्ण विवर के खतरों से पार पाया जा सके। एक्सपोसैट पचास संभावित ब्रह्मांडीय स्रोतों से निकलने वाली ऊर्जा का पता लगा सकेगा। इसके अध्ययन से मानव जीवन के बहुत सारे रहस्यों पर से भी पर्दा उठ सकेगा।

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