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संपादकीय: मणिपुर का दर्द! एक साल में नहीं उठाया गया खास कदम

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने भी कुछ दिनों पहले सरकार की कड़े शब्दों में निंदा की। शायद उसी का असर हो कि केंद्रीय गृह मंत्रालय ने मणिपुर की सुरक्षा को लेकर फिक्र जताई है।
Written by: जनसत्ता
नई दिल्ली | Updated: June 19, 2024 06:09 IST
संपादकीय  मणिपुर का दर्द  एक साल में नहीं उठाया गया खास कदम
मणिपुर मामले पर गृह मंत्री अमित शाह ने सुरक्षा बलों के साथ बैठक की।
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मणिपुर में शांति बहाली को लेकर अब केंद्र सरकार कुछ गंभीर नजर आई है। गृहमंत्री की अध्यक्षता में हुई बैठक में वहां सुरक्षा बलों की तैनाती बढ़ाने, हिंसा करने वालों के खिलाफ सख्त कदम उठाने और जल्दी ही मैतेई और कुकी समुदाय के लोगों के साथ बातचीत करने का फैसला किया गया। एक वर्ष से ऊपर हो गया वहां हिंसा होते, मगर न तो केंद्र और न राज्य सरकार ने कोई उल्लेखनीय कदम उठाया। इसे लेकर लगातार दोनों सरकारों पर अंगुलियां उठती रही हैं।

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पिछले वर्ष मई में जब वहां हिंसा भड़की, तब सेना की गश्ती बढ़ा दी गई थी। इसका नतीजा यह हुआ कि हिंसा पर एकदम से काबू पा लिया गया था। मगर फिर महीने भर के भीतर ही फिर से हिंसा भड़क उठी थी। उसके बाद उस पर काबू पाने का कोई गंभीर प्रयास नहीं किया गया।

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उपद्रवियों ने पुलिस शस्त्रागार से बड़े पैमाने पर हथियार लूट लिए, दोनों समुदाय घात लगा कर एक-दूसरे पर हमले करने लगे थे। उस दौरान केंद्रीय गृहमंत्री ने वहां का दौरा किया था। तब भी उन्होंने हिंसा करने वालों को कड़ी चेतावनी दी थी, लूटे गए हथियार वापस करने का आह्वान किया था, मगर उसका कोई खास असर नहीं हुआ।

तब से जैसे वहां के लोगों को उनके हाल पर छोड़ दिया गया है। राज्य सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठी रही और केंद्र सरकार ने कोई कड़ाई नहीं दिखाई। इसका नतीजा यह हुआ कि बहुत सारे घर जला दिए गए, पूजा स्थलों को ध्वस्त कर दिया गया, साठ हजार से ऊपर लोग अपने घरों से विस्थापित होकर राहत शिविरों में रह रहे हैं, दो सौ से ऊपर लोग मारे जा चुके हैं, कई महिलाओं से सामूहिक बलात्कार किया गया, कुछ को निर्वस्त्र घुमाया गया।

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इन सबके बावजूद सरकारें तमाशबीन बनी रहीं। प्रधानमंत्री पर आरोप है कि वे आज तक मणिपुर पर कुछ नहीं बोले। इस स्थिति में सर्वोच्च न्यायालय ने संज्ञान लेते हुए अपनी निगरानी में जांच समिति गठित की और राज्य पुलिस को कड़ी चेतावनी दी। मगर उसका भी कोई उल्लेखनीय नतीजा नहीं निकल पाया है।

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अभी स्थिति यह है कि इंफल से ऊपर के पहाड़ी इलाकों में रहने वाले कुकी समुदाय के लोग खुद अपनी सुरक्षा चौकियां बना कर पहरेदारी करते हैं। राहत शिविरों में रह रहे लोगों को न तो ढंग का भोजन मिल पाता है, न पीने का पानी, न स्वास्थ्य सुविधाएं। बच्चों की पढ़ाई-लिखाई सब कुछ बाधित है।

इस तरह एक पूरे राज्य के लोगों को उनके हाल पर छोड़ देना किसी भी कल्याणकारी सरकार की जवाबदेही पर स्वाभाविक ही सवाल खड़े करता है। इसे लेकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने भी कुछ दिनों पहले सरकार की कड़े शब्दों में निंदा की। शायद उसी का असर हो कि केंद्रीय गृह मंत्रालय ने मणिपुर की सुरक्षा को लेकर फिक्र जताई है।

लोकसभा चुनाव में मणिपुर के हालात की अनदेखी के नतीजे भी सामने हैं। विपक्ष उसे लेकर लगातार सत्तापक्ष को घेरता रहा है। नई सरकार में अब विपक्ष इसे और मजबूती के साथ उठाता, इसलिए भी संसद का सत्र शुरू होने से पहले सरकार ने मणिपुर पर बैठक बुलाई और कड़ाई से पेश आने का आश्वासन दिया। देखने की बात होगी कि मणिपुर को लेकर केंद्र सरकार कितनी गंभीर है, गृहमंत्रालय की बैठक में किए गए फैसले केवल घोषणा तक सीमित रहते हैं या वास्तव में उन पर गंभीरता से अमल भी किया जाता है।

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