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संपादकीय: गरिमा के विरुद्ध बयान से अपनी ही सरकार हुई असहज, संकट बने मालदीव के मंत्री

स्वाभाविक ही उनके बयानों को लेकर भारत और खुद मालदीव के भीतर भी तीखी प्रतिक्रिया उभरी तथा इस मसले पर आधिकारिक रूप से जवाब-तलब करने की जरूरत पड़ी।
Written by: जनसत्ता
नई दिल्ली | Updated: January 10, 2024 08:00 IST
संपादकीय  गरिमा के विरुद्ध बयान से अपनी ही सरकार हुई असहज  संकट बने मालदीव के मंत्री
मालदीव के राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू (PTI Photo)
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सरकार में उच्च पद पर रहते हुए राजनेताओं को सबसे पहले अपनी भाषा और व्यवहार को संयमित और संतुलित रखने के प्रति सचेत होना चाहिए। मगर ऐसा लगता है कि मालदीव सरकार के कुछ मंत्री खुद ही अपने व्यक्तित्व की गरिमा का ध्यान रखना जरूरी नहीं समझते और वे किसी मसले पर अपनी राय जाहिर करते हुए अन्य देशों के नेताओं की मर्यादा का हनन करने से नहीं चूकते। दरअसल, भारत के प्रधानमंत्री और लक्षद्वीप को लेकर उनके अनुभवों के संदर्भ में मालदीव सरकार के कुछ मंत्रियों ने जैसी बातें कीं, वे न केवल अपरिपक्व प्रतिक्रियाएं थीं, बल्कि कई लिहाज से आपत्तिजनक भी थीं।

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अगर मंत्रियों को अपने देश के पर्यटन स्थलों के महत्त्व को लेकर ज्यादा भरोसा है, तो वे उसकी प्रशंसा में कई स्तर पर काम कर सकते हैं। लेकिन इसके लिए उन्हें अपनी भाषा बिगाड़ने और किसी देश के प्रधानमंत्री के बारे में अनर्गल बातें करने का अधिकार नहीं है। अफसोसनाक है कि मालदीव के मंत्रियों को जिम्मेदार पदों पर रहने के सलीके और अपनी बात कहने के तरीके को लेकर न्यूनतम गरिमा का ध्यान रखना जरूरी नहीं लगा।

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स्वाभाविक ही उनके बयानों को लेकर भारत और खुद मालदीव के भीतर भी तीखी प्रतिक्रिया उभरी तथा इस मसले पर आधिकारिक रूप से जवाब-तलब करने की जरूरत पड़ी। गौरतलब है कि सोमवार को भारत में मालदीव के राजदूत को विदेश मंत्रालय ने तलब किया और वहां के कुछ मंत्रियों द्वारा सोशल मीडिया पर की गई टिप्पणियों पर गंभीर चिंता व्यक्ति की गई। भारतीय जनमानस में भी इस मुद्दे पर आक्रोश उभरा। मामले के तूल पकड़ने पर मालदीव सरकार ने संबंधित तीनों मंत्रियों को निलंबित कर दिया।

अव्वल तो किसी व्यक्ति या नेता के भीतर ऐसा विवेक खुद होना चाहिए कि उसके विचार, उसकी भाषा और अभिव्यक्ति परिपक्व हों और वह अपने साथ-साथ दूसरों की गरिमा का खयाल रखने का जरिया बने। सरकार में मंत्री बनने के साथ किसी भी नेता पर यह अतिरिक्त जिम्मेदारी आ जाती है कि उसकी गतिविधियों से लेकर बयान तक से खुद उसकी सरकार और उसके देश के लिए कोई असहज स्थिति न पैदा हो। अगर ऐसा स्वाभाविक तरीके से नहीं होता, तो उसे अपने पद की जिम्मेदारी और गरिमा के मुताबिक बर्ताव करने का प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए।

मालदीव के मंत्रियों ने बिल्कुल बचकाने और बेलगाम तरीके से जिस तरह अपने बातूनी होने का परिचय दिया, वह भारतीयों के लिहाज से आपत्तिजनक था और खुद उनके देश और वहां की सरकार के लिए असुविधा की स्थिति पैदा करने वाला। अच्छा यह है कि अपने मंत्रियों के बातूनीपने से उपजे हालात की अहमियत को वहां की सरकार ने समझा और उनके खिलाफ सख्त कदम उठाए। हालांकि मालदीव की नई सरकार के नेता भारत के लिए सकारात्मक रुख नहीं रखते हैं और इसकी कोई बड़ी वजह नहीं है।

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मगर यह ध्यान रखने की जरूरत है कि पर्यटन के जरिए अर्थव्यवस्था में एक बड़ा योगदान करने से लेकर कई स्तर पर मालदीव के लिए भारत बेहद महत्त्वपूर्ण सहयोगी रहा है और हर जरूरत के वक्त उसके साथ रहा है। अगर सरकार में शामिल लोगों की अपरिपक्व बयानबाजी की वजह से दोनों देशों के संबंधों में गैरजरूरी विवाद पैदा होता है तो इसका नाहक नुकसान मालदीव को ही उठाना पड़ सकता है। यों भी, मर्यादा का ध्यान रखते हुए अपनी भाषा और अपने व्यवहार की अभिव्यक्ति में संयम बरतना सभी स्तरों पर गरिमा को कायम रखने की प्राथमिक कसौटी है।

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