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संपादकीय: मालदीव सरकार की नीतियां और चीन पर भरोसा, नए हालात से बढ़ेंगी राष्ट्रपति मुइज्जू की मुश्किलें

भारत से टकराव मोल लेकर होने वाले नुकसान की भरपाई मालदीव कैसे कर पाएगा, कहना मुश्किल है। मालदीव में अब भी बहुत सारे लोग राष्ट्रपति मुइज्जू की भारत-विरोधी नीति के खिलाफ हैं।
Written by: जनसत्ता
नई दिल्ली | Updated: January 16, 2024 08:45 IST
संपादकीय  मालदीव सरकार की नीतियां और चीन पर भरोसा  नए हालात से बढ़ेंगी राष्ट्रपति मुइज्जू की मुश्किलें
मालदीव राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू
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आखिरकार मालदीव सरकार ने भारतीय सैनिकों की वापसी का दिन तय कर दिया है। हालांकि नवंबर में पदभार संभालने के साथ ही राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू ने भारत से अपने सैनिकों को वापस बुलाने की अपील की थी। इस संबंध में दोनों देशों के अधिकारियों के बीच मंथन चल रहा था। मगर चीन यात्रा से वापस लौटते ही मुइज्जू ने बड़े तीखे अंदाज में कह दिया कि भारत अगले दो महीनों के भीतर अपने सैनिक वापस बुला ले। इसे लेकर दोनों देशों की उच्च स्तरीय समिति की बैठक हुई और आम सहमति भी बन गई बताया जा रहा है। मगर अभी यह तय नहीं हो सका है कि जिस काम के लिए भारतीय सैनिक वहां तैनात किए गए थे, वह काम कैसे संचालित होगा।

राष्ट्रपति को भरोसा- चीन करेगा जरूरतों को पूरा

गौरतलब है कि फिलहाल वहां अट्ठासी भारतीय सैनिक तैनात हैं, जो भारत द्वारा मालदीव को उपहार में दिए समुद्री गश्ती विमानों और दो हेलीकाप्टरों का संचालन करते हैं। इसके अलावा चिकित्सा सेवाएं और मालदीव के सैनिकों को युद्धक विमान आदि उड़ाने का प्रशिक्षण देते हैं। इस फैसले से भारत को कम, मालदीव को अधिक नुकसान होने वाला है। मगर वर्तमान राष्ट्रपति मुइज्जू का झुकाव चीन की तरफ है और उन्हें भरोसा है कि उनकी आर्थिक जरूरतें चीन से पूरी हो जाएंगी। चीन दौरे के वक्त उन्होंने कई महत्त्वपूर्ण समझौते भी किए हैं।

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मालदीव से भारत का बहुत पुराना संबंध है। हर मुश्किल के वक्त भारत ने उसका साथ दिया है। इसलिए मुइज्जू से पहले वहां के सभी शासक भारत के साथ दोस्ताना संबंध बनाए रखते रहे हैं। मगर मुइज्जू की पार्टी पिछले चुनाव में भारत को मालदीव से बाहर निकालने के नारे के साथ मैदान में उतरी थी। उसे कामयाबी मिली और मुइज्जू राष्ट्रपति बने तो उन्होंने दावा किया कि उनके भारत को बाहर निकालने के वादे को जनमत ने स्वीकार किया है, इसलिए उससे मुक्ति पाना उनकी सरकार की प्राथमिकता है।

पिछले दिनों जब मुइज्जू सरकार के तीन मंत्रियों ने भारतीय प्रधानमंत्री की लक्षद्वीप यात्रा के समय अपमानजनक टिप्पणियां कीं, तब दोनों देशों के बीच रिश्तों में तल्खी बढ़ गई। हालांकि मालदीव सरकार ने उन मंत्रियों को बर्खास्त कर दिया, पर वह खलिश शायद बनी हुई थी। भारतीय सैनिकों के वहां से वापस लौटने के बाद भारत को सामरिक सुरक्षा के मामले में कुछ चुनौतियां जरूर पेश आ सकती हैं। मालदीव चूंकि भौगोलिक रूप से भारत के बहुत नजदीक है और वहां भारत का रडार होने से उस क्षेत्र में निगरानी रखना आसान था। अब भारत को इसकी वैकल्पिक व्यवस्था करनी पड़ेगी।

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मगर भारत से टकराव मोल लेकर होने वाले नुकसान की भरपाई मालदीव कैसे कर पाएगा, कहना मुश्किल है। मालदीव में अब भी बहुत सारे लोग राष्ट्रपति मुइज्जू की भारत-विरोधी नीति के खिलाफ हैं। इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि राष्ट्रपति बनने से पहले वे जिस माले के मेयर थे, उस सीट पर हुए चुनाव में लोगों ने उनकी पार्टी के प्रत्याशी को हरा दिया और भारत समर्थक मालदीवियन डेमोक्रेटिक पार्टी के उम्मीदवार को मेयर चुना है।

फिर, मालदीव की अर्थव्यवस्था पर्यटन पर टिकी है, जिस तरह श्रीलंका की टिकी है। मालदीव जाने वाले सैलानियों में सबसे अधिक संख्या भारत के लोगों की होती है। श्रीलंका ने चीन का दामन थाम कर नतीजा देख लिया है। मगर मालदीव ने उससे सबक नहीं लिया। चीन कहीं उसका हाल भी श्रीलंका जैसा न कर दे। चीन से दोस्ती करके भारत के अलावा अमेरिका, फ्रांस आदि देशों से भी उसने दुश्मनी मोल ले ली है।

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