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संपादकीय: फैसला और संदेश, असली शिवसेना पर रार खत्म, लेकिन दरार कायम

सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद विधानसभा अध्यक्ष की ओर से अब जो फैसला सामने आया है, उसके मुताबिक 21 जून, 2022 को जब पार्टी दो समूह में बंटी, तब उसके बाद और चुनाव आयोग के रिकार्ड में भी एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाला गुट ही वास्तविक शिवसेना था।
Written by: जनसत्ता
नई दिल्ली | Updated: January 11, 2024 08:17 IST
संपादकीय  फैसला और संदेश  असली शिवसेना पर रार खत्म  लेकिन दरार कायम
महाराष्ट्र के सीएम एकनाथ शिंदे और पूर्व सीएम उद्धव ठाकरे।
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महाराष्ट्र में शिवसेना के बागी विधायकों की योग्यता के मसले पर पिछले काफी समय से चल रहा जद्दोजहद तकनीकी रूप से आखिर अपने अंजाम तक पहुंच गया लगता है। राज्य विधानसभा के अध्यक्ष ने समूचे मामले में बारह सौ पन्नों में दर्ज ब्योरे के आधार पर जो फैसला सुनाया, वह महाराष्ट्र की राजनीति में लंबे समय से एक अहम प्रभाव रखने वाली शिवसेना के उद्धव ठाकरे गुट के लिए एक बड़ा झटका साबित हुआ। हालांकि इस फैसले के आने से पहले तक दोनों पक्षों के बीच एक कशमकश बनी हुई थी, इसके बावजूद एकनाथ शिंदे का समूह संख्या बल अपने साथ होने के आधार पर अपने हक में फैसला आने को लेकर एक तरह से आश्वस्त था।

उद्धव ठाकरे गुट को उम्मीद थी कि फैसला उसके पक्ष में आएगा

वहीं उद्धव ठाकरे गुट के बीच एक आखिरी उम्मीद थी कि शायद विधानसभा अध्यक्ष की राय उनके पक्ष की दलीलों पर आधारित होगी। मगर विधानसभा अध्यक्ष ने उद्धव गुट की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें शिवसेना से बगावत करने वाले सोलह विधायकों की योग्यता को रद्द करने की मांग की गई थी। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद विधानसभा अध्यक्ष की ओर से अब जो फैसला सामने आया है, उसके मुताबिक 21 जून, 2022 को जब पार्टी दो समूह में बंटी, तब उसके बाद और चुनाव आयोग के रिकार्ड में भी एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाला गुट ही वास्तविक शिवसेना था।

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फैसले के बाद उद्धव ठाकरे और उनके समूह को घोर निराशा हुई है

जाहिर है, इस फैसले के बाद उद्धव ठाकरे और उनके समूह को घोर निराशा हुई है, जो यह मान कर चल रहे थे कि कानूनी प्रक्रिया में जाने के बाद उनके गुट को ही वास्तविक शिवसेना के रूप में मान्यता मिलेगी। मगर विधानसभा अध्यक्ष ने पार्टी पर शिंदे गुट का हक होने के पक्ष में शिवसेना के ही उस संविधान का उल्लेख किया, जो 1999 में तैयार किया गया था। उसके अनुसार चुनाव आयोग में पार्टी का 1999 का ही संविधान सौंपा गया था, इसलिए फैसले का आधार भी वही होगा। जबकि शिवसेना के संविधान में 2018 किए गए संशोधन के मुताबिक पार्टी प्रमुख का फैसला ही पार्टी का फैसला होगा।

फैसले से शिंदे गुट के सोलह विधायकों को बड़ी राहत मिली है

जाहिर है, इस पुराने संविधान में की गई व्यवस्था की कसौटी पर उद्धव ठाकरे गुट का पक्ष कमजोर साबित हुआ और यही शिंदे समूह के लिए मददगार बना। इसी बुनियाद पर विधानसभा अध्यक्ष ने यह व्यवस्था दी कि एकनाथ शिंदे को पार्टी से निकालने का अधिकार उद्धव ठाकरे को नहीं है। स्वाभाविक ही इस फैसले से शिंदे गुट के जिन सोलह विधायकों पर अयोग्यता की तलवार लटकी हुई थी, उन्हें बड़ी राहत मिली है।

इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने इस मसले पर निर्णय के लिए विधानसभा अध्यक्ष को ही उचित प्राधिकार बताया था और दस जनवरी तक का वक्त निर्धारित किया गया था। मगर अब विधानसभा अध्यक्ष के फैसले के बाद उद्धव ठाकरे के गुट की ओर से यह कहा गया है कि फैसला उम्मीद के उलट है, इसलिए इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की जाएगी। यानी एक बार फिर यह मामला शीर्ष अदालत के कठघरे में जा सकता है। जो हो, फिलहाल जो तस्वीर सामने आई है, उससे यही लगता है कि अब उद्धव ठाकरे के समूह के सामने अपना नया राजनीतिक अस्तित्व खड़ा करने की जरूरत पड़ेगी।

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अगर ऐसा होता है तो महाराष्ट्र के मौजूदा राजनीतिक समीकरण में नई तस्वीर भी उभर सकती है। राज्य की राजनीति में लंबे समय से शिवसेना का प्रभाव अलग-अलग रूप में कायम रहा है। अब दो समूहों में बंटने के बाद और राज्य में मुख्य रूप से भाजपा के समांतर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के ध्रुवों के बीच सिमटी शक्ति के साथ शिवसेना की राज्य की राजनीतिक दिशा को तय करने में कितनी और क्या भूमिका होगी, यह देखने की बात होगी।

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