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संपादकीय: चुनाव से पहले उम्मीदवारों का आना-जाना, दलों का अनुशासन और जनता के प्रति जिम्मेदारी

चुनाव जीतने के लिए हर राजनीतिक दल अपने पैंतरे आजमाता ही है। जैसे कि आरोप लग रहे हैं, अगर भाजपा कांग्रेसी नेताओं को अपने पाले में खींचने में कामयाब हो रही है, तो इसे चुनावी गणित के हिसाब से गलत नहीं कहा जा सकता। असल सवाल है कि कांग्रेस ने अपने नेताओं को इस तरह अनुशासित क्यों नहीं रखा या उनमें ऐसा भरोसा क्यों नहीं भर सकी कि वे दूसरे किसी दल के प्रलोभन या दबाव में आ ही न पाएं।
Written by: जनसत्ता
नई दिल्ली | Updated: April 30, 2024 10:04 IST
संपादकीय  चुनाव से पहले उम्मीदवारों का आना जाना  दलों का अनुशासन और जनता के प्रति जिम्मेदारी
Delhi Congress Crisis: अरविंदर सिंह लवली ने चुनावी मौसम में बढ़ाई कांग्रेस की मुसीबत (सोर्स - PTI)
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राजनीतिक दलों में लोकतांत्रिक वातावरण होना अच्छी बात मानी जाती है, ताकि किसी भी सदस्य को अगर किसी बात पर एतराज हो तो वह उसे जाहिर कर सके। मगर इसका यह अर्थ कतई नहीं कि कोई पार्टी अपने भीतर अनुशासन बनाना ही बंद कर दे। चलते चुनाव के बीच जिस तरह कांग्रेस के नेता बगावत करते और दूसरे दलों का दामन थामते देखे जा रहे हैं, उसे कांग्रेस बेशक पार्टी का आंतरिक लोकतंत्र बता कर खुद अपनी पीठ थपथपाने की कोशिश करे, पर हकीकत यही है कि इससे उसमें अनुशासन की कमी जाहिर होती है।

अरविंदर सिंह लवली ने अपने चुनाव प्रभारी पर ही लगाया आरोप

कुछ दिनों पहले गुजरात में सूरत सीट से कांग्रेस के उम्मीदवार ने जानबूझ कर अपना पर्चा भरने में गड़बड़ी की, जिसके चलते उसका पर्चा निरस्त हो गया और भाजपा का प्रत्याशी निर्विरोध चुन लिया गया। अब इंदौर सीट से उम्मीदवार ने नामांकन वापस लेने के आखिरी दिन अपनी उम्मीदवारी वापस ले ली। एक दिन पहले दिल्ली प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष पद से अरविंदर सिंह लवली ने यह कहते हुए इस्तीफा दे दिया कि चुनाव प्रभारी उनकी बात नहीं सुनते। लवली ने पार्टी नेतृत्व पर भी कई आरोप लगाए हैं। हालांकि इन तीनों मामलों में भाजपा के दबाव और सांठगांठ की बातें भी की जा रही हैं, मगर इससे कांग्रेस की अनुशासनात्मक ढिलाई और अपने नेताओं को संभाल कर रख पाने में नाकामी छिप नहीं जाती।

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कई नेताओं को कांग्रेस में भविष्य नहीं आया, बीजेपी में चले गये

पिछले कुछ वर्षों में बड़ी संख्या में नेता कांग्रेस छोड़ कर भाजपा में शामिल हो गए। उनमें कई वरिष्ठ नेता भी थे। यह ठीक है कि कई नेताओं को जब कांग्रेस में अपना भविष्य नजर नहीं आया, तो उन्होंने भाजपा का दामन थाम लिया। कुछ के बारे में कहा जाता है कि वे अपने भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई से बचने के लिए सत्तापक्ष की तरफ चले गए। मगर इससे कांग्रेस नेतृत्व पर सवाल तो उठते ही हैं कि वह क्यों अपने नेताओं को संतुष्ट नहीं रख सकी। ऐसा क्या हुआ कि उसके जो नेता कल तक सिद्धांतों की दुहाई देते न थकते थे, वे अचानक विद्रोही और अवसरवादी नजर आने लगे।

उनका असंतोष अचानक फूट पड़ा और वे कांग्रेस के खिलाफ विष-वमन करने लगे। किसी भी पार्टी को ताकत इस बात से मिलती है कि उसके नेता और कार्यकर्ता कितने प्रतिबद्ध हैं। उन्हें कोई जिम्मेदारी मिलती है या नहीं मिलती, उन्हें चुनाव का टिकट मिलता है या नहीं मिलता, वे चुप रह कर पार्टी नेतृत्व का फैसला स्वीकार कर लेते और अपने प्रत्याशी को जिताने के लिए निष्ठा और एकजुटता का परिचय देते हैं। भाजपा इसीलिए इस वक्त सबसे ताकतवर पार्टी है कि उसका नेतृत्व अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं को अपने साथ जोड़ कर रखने में कामयाब है।

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चुनाव जीतने के लिए हर राजनीतिक दल अपने पैंतरे आजमाता ही है। जैसे कि आरोप लग रहे हैं, अगर भाजपा कांग्रेसी नेताओं को अपने पाले में खींचने में कामयाब हो रही है, तो इसे चुनावी गणित के हिसाब से गलत नहीं कहा जा सकता। असल सवाल है कि कांग्रेस ने अपने नेताओं को इस तरह अनुशासित क्यों नहीं रखा या उनमें ऐसा भरोसा क्यों नहीं भर सकी कि वे दूसरे किसी दल के प्रलोभन या दबाव में आ ही न पाएं। बीच चुनाव में इस तरह पार्टी का साथ छोड़ कर बड़े नेताओं, यहां तक कि उम्मीदवारों के दूसरे दल में शामिल होने से न केवल पार्टी की आंतरिक कमजोरी जाहिर होती, बल्कि उसकी रणनीति भी विफल होती है।

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