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संपादकीय: लोकतंत्र के उत्सव पर दुनिया की नजर, स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव बड़ी चुनौती

एक लोकतांत्रिक देश का जिम्मेदार नागरिक होने के नाते हर मतदाता से उम्मीद की जाती है कि न केवल वह अपने विवेक से मतदान करे, बल्कि मतदान की प्रक्रिया को भी बाधित होने से बचाए।
Written by: जनसत्ता
नई दिल्ली | Updated: March 18, 2024 09:59 IST
संपादकीय  लोकतंत्र के उत्सव पर दुनिया की नजर  स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव बड़ी चुनौती
शुक्रवार (15 मार्च 2024) को नई दिल्ली में नए ईसी सुखबीर सिंह संधू (बाएं) और ज्ञानेश कुमार के साथ सीईसी राजीव कुमार (बीच में) (ANI)
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आम चुनाव की तारीखों की घोषणा हो गई है। सात चरण में मतदान होंगे। पहले चरण के मतदान से लेकर नतीजों की घोषणा तक डेढ़ महीने चुनाव का माहौल बना रहेगा। पहले चरण के मतदान से पहले भी पूरा एक महीना राजनीतिक दलों को मिला है। यानी चुनाव कुल ढाई महीने की अवधि में फैला है। यों राजनीतिक दल इसके लिए काफी पहले से तैयारियों में जुट गए थे। उम्मीदवारों के नामों की घोषणा, सहयोगी दलों के साथ सीटों के बंटवारे आदि को लेकर मंथन काफी समय से चल रहा था। अब वे अपना-अपना समीकरण लेकर मैदान में उतरेंगे। मगर चुनाव का ज्यादा दारोमदार आखिरकार मतदाता पर होता है।

कुछ राज्यों में हिंसा की घटनाएं चिंता पैदा करती हैं

वह चुनाव को क्या दिशा देता है, इस पर दुनिया की नजर टिकी होती है। मगर कुछ चुनावों के अनुभवों से जाहिर है कि मतदाता चुनाव को लोकतंत्र के उत्सव के रूप में मनाने के बाजाय दलगत उन्माद से भर जाते हैं। इसी का नतीजा कई जगहों पर राजनीतिक हिंसा में दिखाई देता है। कुछ राज्यों में हिंसा की घटनाएं चिंता पैदा करती हैं। इसी के मद्देनजर भारतीय निर्वाचन आयोग को अपनी रणनीति तैयार करनी पड़ती है। चुनाव स्वतंत्र और निष्पक्ष रूप में संपन्न कराए जा सकें, यह निर्वाचन आयोग के सामने बड़ी चुनौती होता है।

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लोकतंत्र में असहमति अच्छी बात है, हिंसा गलत

चुनाव के वक्त राजनीतिक दल एक-दूसरे पर स्वाभाविक रूप से आरोप-प्रत्यारोप लगाते हैं। उसमें कई बार आपत्तिजनक बयान भी आ जाते हैं। उस पर नजर रखना निर्वाचन आयोग की जिम्मेदारी है। मगर पिछले कुछ चुनावों से देखा जा रहा है कि पार्टियों के समर्थक खुद राजनेताओं के बयानों के बचाव या विरोध में परस्पर गुत्थम-गुत्था हो जाते हैं। पश्चिम बंगाल और दक्षिण के कुछ राज्यों में ऐसा वातावरण कुछ अधिक देखने को मिलता है। लोकतंत्र में असहमति अच्छी बात है, मगर उसे लेकर हिंसा पर उतर जाना किसी भी रूप में लोकतांत्रिक नहीं कहा जा सकता। इससे नाहक निर्वाचन आयोग और सुरक्षाबलों की परेशानियां बढ़ती हैं। बहुत सारे मतदाताओं के मनोबल पर भी इसका असर पड़ता है और वे मतदान केंद्रों तक पहुंचने से हिचकते हैं।

एक लोकतांत्रिक देश का जिम्मेदार नागरिक होने के नाते हर मतदाता से उम्मीद की जाती है कि न केवल वह अपने विवेक से मतदान करे, बल्कि मतदान की प्रक्रिया को भी बाधित होने से बचाए। मतदान के बदले राजनीतिक दलों की तरफ से दिए जाने वाले पैसे और उपहार वगैरह के प्रलोभन से पार पाना भी बड़ी चुनौती बन गया है, इस मामले में भी मतदाताओं की मदद की अपेक्षा है।

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हालांकि इतने लंबे समय तक चुनाव को फैला देने पर कुछ राजनीतिक विशेषज्ञों के एतराज को सिरे से खारिज नहीं किया जा सकता। चुनाव की अवधि जितनी लंबी खिंचती है, उतनी ही उसमें गड़बड़ियों की आशंका भी बनी रहती है। इसे लेकर कई बार आपत्ति दर्ज कराई जा चुकी है। पहले चरण के मतदान के बाद करीब डेढ़ महीने तक वोटिंग मशीनों की निगरानी करनी पड़ेगी। इतने लंबे समय तक आदर्श आचार संहिता लागू रहने से सरकारी कामकाज भी प्रभावित होंगे।