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Jansatta Editorial: उत्‍तर भारत में कोहरे की मार और ठंड में बढ़ोतरी से जनजीवन परेशान

हरियाणा, पंजाब सहित राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्‍ली में कड़ाके की ठंड के साथ कई जगहों पर दृश्यता इतनी कम थी कि वाहन को सुरक्षित आगे बढ़ा पाना जोखिम का काम हो गया है।
Written by: जनसत्ता | Edited By: Bishwa Nath Jha
नई दिल्ली | Updated: December 29, 2023 10:38 IST
jansatta editorial  उत्‍तर भारत में कोहरे की मार और ठंड में बढ़ोतरी से जनजीवन परेशान
प्रतीकात्‍मक तस्‍वीर। फोटो- (इंडियन एक्‍सप्रेस)।
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मौसम की अपनी गति होती है। इस लिहाज से देखें तो बीते दो-तीन दिनों से तापमान में गिरावट के साथ बढ़ती ठंड एक प्राकृतिक चक्र है और इसकी वजह से जनजीवन में पैदा होने वाली मुश्किलें आम रही हैं। मगर ठंड में बढ़ोतरी और कोहरे से उपजी समस्या का अनुमान लगा कर उसका सामना करने और उससे बचाव के इंतजाम किए जाएं, तो नुकसान और बाधाओं को कम जरूर किया जा सकता है।

यों इस वर्ष ठंड की शुरुआत हुए करीब एक पखवाड़ा गुजर चुका है और इस बीच वायुमंडल के घनीभूत होने की वजह से प्रदूषण एक अलग समस्या बन रही है, मगर पिछले दो-तीन दिनों में बढ़ती ठंड और कोहरे के चलते कई स्तर पर बाधाएं खड़ी हो रही हैं। बुधवार को कोहरा बढ़ने के साथ ही समूचे उत्तर भारत से सफर में मुश्किल से लेकर सड़क हादसों की जैसी खबरें आईं, उसके लिए जितना मौसम जिम्मेदार है, उससे ज्यादा इसकी प्रकृति को समझ कर उसके मुताबिक अपने कामकाज को निर्धारित करना गैरजरूरी मानने वाले लोगों की वजह से मुश्किलें पैदा होती हैं।

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गौरतलब है कि उत्तर भारत में हरियाणा और पंजाब के कई शहरों में सड़क पर दृश्यता शून्य तक पहुंच गई। दिल्ली सहित राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में भी कड़ाके की ठंड के साथ कई जगहों पर दृश्यता इतनी कम थी कि वाहन को सुरक्षित आगे बढ़ा पाना एक जोखिम का काम था। कई रेलगाड़ियां निर्धारित समय से काफी विलंब से चलीं और विमानों की उड़ान पर भी इसका विपरीत असर पड़ा।

ज्यादा त्रासदी सड़कों पर बरसी, जहां अलग-अलग होने वाले हादसों में कई लोगों की मौत हो गई। कोहरा और बेहद कम दृश्यता की वजह से सड़कों पर वाहनों के टकराने से उत्तर प्रदेश में आठ और राजस्थान में तीन लोगों की मौत के अलावा दिल्ली के शकूरबस्ती में धुंध से उपजे भ्रम का शिकार होकर एक ट्रेन से पिता-पुत्र की नाहक ही जान चली गई।

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हालांकि दिल्ली में मौसम और कोहरे के मद्देनजर लाल चेतावनी जारी की गई थी, लेकिन आबोहवा में जैसा कोहरा छा गया, उसमें आम जनजीवन और गतिविधियों पर काफी असर पड़ा। जैसी मुश्किल खड़ी हुई, उसमें मौसम की मार की वजह साफ है, मगर यह समझना मुश्किल है कि इससे उपजने वाली स्थितियों के मुताबिक आम गतिविधियों में थोड़ी सावधानी क्यों नहीं बढ़ाई जा सकती।

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सवाल है कि अगर कोहरे की वजह से सड़कों पर दृश्यता बेहद न्यून हो जाती है, तब वाहनों की रफ्तार और चलाने के तौर-तरीके को नियंत्रित करने को लेकर सजग क्यों नहीं हुआ जा सकता। गहरी धुंध में आमतौर पर कुछ मीटर आगे चल रहे या खड़े वाहन भी नहीं दिखाई देते और पीछे से आ रही गाड़ियां अक्सर सिलसिलेवार तरीके से टकराती चली जाती हैं।

सड़कों पर आम हो चुके इस तरह के हादसों से बचने के लिए बस थोड़ी-सी सावधानी की जरूरत होती है। खासतौर पर तब जब तेज रफ्तार वाहन चलाने की सुविधा वाली सड़कों पर कोई व्यक्ति वाहन चला होता है तो गंतव्य पर सुरक्षित पहुंचना प्राथमिक होनी चाहिए, न कि गाड़ी की गति को आम दिनों की तरह तेज चलाना।

कोहरे की वजह से ट्रेनों की लेटलतीफी हर वर्ष की एक गंभीर समस्या रही है, मगर अब तक ट्रेनों को कोहरा-रोधी या फिर कोहरे में आगे के सिग्नल की स्थिति की सटीक जानकारी देने वाले यंत्रों के जरिए रेल यात्रा को सहज बनाने की बातें घोषणाओं तक सीमित रही हैं। जरूरत इस बात की है कि हर वर्ष की इस आम स्थिति और इससे उपजने वाली मुश्किलों को ध्यान में रख कर उसी मुताबिक कुछ ठोस उपाय किए और अपनाए जाएं।

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