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Jansatta Editorial: देश के स्वच्छता सर्वेक्षण में इंदौर ने फिर से मिसाल कायम की

स्वच्छता सर्वेक्षण शहरों की नगरपालिकाओं और नागरिकों में साफ-सफाई के प्रति प्रतिस्पर्धात्मक जागरूकता पैदा करने के मकसद से शुरू किया गया था।
Written by: जनसत्ता | Edited By: Bishwa Nath Jha
नई दिल्ली | January 12, 2024 09:04 IST
jansatta editorial  देश के स्वच्छता सर्वेक्षण में इंदौर ने फिर से मिसाल कायम की
प्रतीकात्‍मक तस्‍वीर। फोटो- (इंडियन एक्‍सप्रेस)।
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शहरों की स्वच्छता प्रशासनिक संजीदगी और सक्रियता के साथ-साथ वहां रहने वालों के नागरिक बोध का भी पता देती है। इस मामले में निस्संदेह इंदौर ने फिर से मिसाल कायम की है। वह सातवीं बार देश के स्वच्छता सर्वेक्षण में अव्वल आया है। इस बार गुजरात का सूरत भी कंधे से कंधा मिलाकर उसके साथ खड़ा हो गया है। दोनों शहर पहले स्थान पर आए हैं।

राज्यों में महाराष्ट्र को पहला स्थान मिला है और गंगा किनारे के शहरों में वाराणसी को। सफाईमित्र सुरक्षा के लिहाज से चंडीगढ़ ने पहले स्थान पर जगह बनाई है। गौर करें तो स्वच्छता सर्वेक्षण की तालिका में वही राज्य और शहर इस बार भी परस्पर प्रतिस्पर्धा करते हुए आगे निकलने की कोशिश करते देखे गए, जो कई वर्ष से होड़ में रहे हैं। बाकी राज्यों और शहरों से बहुत उत्साहजनक तस्वीर नहीं आई है।

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स्वच्छता सर्वेक्षण शहरों की नगरपालिकाओं और नागरिकों में साफ-सफाई के प्रति प्रतिस्पर्धात्मक जागरूकता पैदा करने के मकसद से शुरू किया गया था। इसके आकलन के लिए कुछ पैमाने बनाए गए हैं। मसलन, घर-घर जाकर कूड़ा इकट्ठा करना, अगलनीय कचरे को अलग रखना, कचरे का पुनर्चक्रण आदि। इस प्रयास के बेहतर नतीजे भी देखने को मिले हैं।

सब जानते हैं कि स्वच्छता से जीवाणुओं और विषाणुओं के जरिए फैलने वाली अनेक बीमारियों पर लगाम लगाई जा सकती है। मच्छर और मक्खियों से फैलने वाली बीमारियों पर काबू पाना अब भी एक बड़ी चुनौती है। हर वर्ष बरसात के समय बड़ी संख्या में लोग इन बीमारियों की चपेट में आ जाते हैं। उनमें से बहुत सारे बच्चे असमय काल कवलित हो जाते हैं।

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इसके बावजूद गंदगी दूर करने को लेकर लोगों में अपेक्षित नागरिक बोध नहीं पैदा हो पाता। देश के बहुत सारे शहरों की नगरपालिकाएं कचरे का उचित निस्तारण नहीं कर पातीं। इसका नतीजा यह देखने को मिलता है कि जगह-जगह कचरे का ढेर जमा रहता है। जहां कचरा उठाया भी जाता है, वहां उसका उचित पुनर्चक्रण नहीं हो पाता।

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दिल्ली इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, जहां कचरे के पहाड़ खड़े हैं और उन इलाकों में रहने वाले, उन इलाकों से होकर गुजरने वाले हर समय जोखिम में रहते हैं। इन कचरे के पहाड़ों को खत्म करने को लेकर राजनीति भी चलती रहती है। यही स्थिति सफाई कर्मियों की सुरक्षा को लेकर है। वे हर समय जोखिम भरे वातावरण में काम करने को मजबूर हैं। सीवरों की सफाई के लिए आज भी मशीनों के बजाय सीधे लोगों को गटर में उतार दिया जाता है। इसकी वजह से हर वर्ष अनेक मौतें भी हो जाती हैं।

पर्यावरण प्रदूषण के बढ़ते खतरों के मद्देनजर भी साफ-सफाई, कचरे के निस्तारण, पुनर्चक्रण आदि में व्यावहारिक उपाय आजमाने पर जोर दिया जाता रहा है। अब तो मशीनों के इस्तेमाल ने इस काम को काफी आसान बना दिया है, मगर फिर भी अनेक नगरपालिकाएं इसे लेकर शिथिल ही नजर आती हैं।

यह ठीक है कि छोटे शहरों में स्वच्छता उपायों पर अमल कुछ आसान होता है, मगर जब मुंबई जैसा शहर भी इस दिशा में बेहतर प्रदर्शन कर रहा है, तो दूसरे महानगरों को इस मामले में कोई बहाना तलाशने की तुक नहीं बनती। जिन शहरों ने स्वच्छता के लिए उल्लेखनीय प्रयास किए हैं, उनसे प्रेरणा लेते हुए घर-घर से कूड़ा उठाने, सीवर के गंदे जल को नदियों में मिलने से रोकने, कचरा पुनर्चक्रण, हरित तकनीक और सफाईमित्रों के सुरक्षा संबंधी उपाय आजमाने की कोशिश दूसरे शहर क्यों नहीं कर सकते।

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