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संपादकीय:भारत-फ्रांस के बीच सहयोग का सफर, नई चुनौतियों से निपटने में मददगार होगा यह रिश्ता

भारत और फ्रांस ने दो वर्ष पहले हिंद-प्रशांत त्रिपक्षीय विकास सहयोग कोष की स्थापना की। इसका उद्देश्य संयुक्त अरब अमीरात के साथ मिल कर अफ्रीका के पूर्वी तट से सुदूर प्रशांत तक समुद्री क्षेत्र में जागरूकता और सुरक्षा सुनिश्चित करना है। इससे क्षेत्रीय संतुलन कायम करने में काफी मदद मिलेगी।
Written by: जनसत्ता
नई दिल्ली | Updated: January 26, 2024 08:15 IST
संपादकीय भारत फ्रांस के बीच सहयोग का सफर  नई चुनौतियों से निपटने में मददगार होगा यह रिश्ता
पीएम मोदी के साथ फ्रांस के राष्ट्रपति एमेनुएल मैक्रों। (रॉयटर्स)
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फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की भारत यात्रा कई मायनों में महत्त्वपूर्ण है। वे गणतंत्र दिवस के मौके पर मुख्य अतिथि तो हैं ही, उनके आने से दोनों देशों के बीच के रिश्ते और प्रगाढ़ होंगे। पिछले वर्ष दोनों देशों ने परस्पर सहयोग के पच्चीस वर्ष पूरे होने का जश्न मनाया। हालांकि फ्रांस के साथ भारत के संबंध हमेशा से बेहतर रहे हैं, मगर इस समय जब दुनिया के राजनीतिक समीकरण बदल रहे हैं, इन दोनों के रिश्तों की मजबूती कई चुनौतियों से पार पाने में मददगार साबित होगी। प्रधानमंत्री ने मैक्रों का जयपुर में स्वागत किया, दोनों ने एक साथ जनसमूह का अभिवादन स्वीकार किया और फिर लंबी बातचीत की।

फ्रांस भारत का दूसरा बड़ा डिफेंस सप्लायर है

जलवायु परिवर्तन, स्वच्छ ऊर्जा, रक्षा, सुरक्षा, व्यापार, छात्रों और पेशेवरों के वीजा मामले में सहयोग बढ़ाने आदि विषयों पर बातचीत हुई। गणतंत्र दिवस परेड में फ्रांस की टुकड़ी भी हिस्सा ले रही है। भारत के लिए फ्रांस का महत्त्व इस बात से समझा जा सकता है कि वह भारत का दूसरा बड़ा रक्षा आपूर्तिकर्ता देश है। रफाल लड़ाकू विमान और स्कार्पियन पनडुब्बी की आपूर्ति के अलावा वह भारत के एक बड़े रणनीतिक साझीदार के रूप में उभरा है। खासकर हिंद महासागर में दोनों देशों के बीच संयुक्त सामरिक समझौते हैं।

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अंतरराष्ट्रीय मंचों पर फ्रांस हमेशा समर्थक रहा

अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी फ्रांस हमेशा भारत का समर्थन करता रहा है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सदस्यता और परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह में उसके प्रवेश का वह समर्थक रहा है। पोकरण परमाणु परीक्षण के बाद जब भारत अलग-थलग पड़ गया था, तब फ्रांस ने ही उसका साथ दिया। पिछले पच्चीस वर्षों में भारत में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश करने वाले देशों की श्रेणी में फ्रांस तेजी से आगे बढ़ता देखा गया है। उसने कई महत्त्वपूर्ण उपक्रम यहां लगाए हैं। वाणिज्य और व्यापार के मामले में भी दोनों के बीच बारह अरब डालर से अधिक का वार्षिक कारोबार होता है।

अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन की शुरुआत में बना सहयोगी

यह अलग बात है कि दोनों देशों के बीच व्यापार संतुलन नहीं है, फ्रांस की तुलना में भारत काफी कम उसे निर्यात कर पाता है। मगर विज्ञान और तकनीक, जलवायु परिवर्तन आदि से जुड़े मसलों पर भारत को फ्रांस से काफी ताकत मिली है। फ्रांस पहला देश है, जिसके साथ मिल कर भारत ने अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन की शुरुआत की थी। दोनों देशों का जोर नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में काम करने पर है, इस क्षेत्र में दोनों के लिए असीमित संभावनाएं हैं।

सबसे महत्त्वपूर्ण है कि दोनों देशों के बीच रक्षा क्षेत्र में रिश्ते लगातार मजबूत हुए हैं। ऐसे समय में जब हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन का प्रभुत्व बढ़ रहा है और यह दोनों देशों के लिए चिंता का विषय है, भारत और फ्रांस ने दो वर्ष पहले हिंद-प्रशांत त्रिपक्षीय विकास सहयोग कोष की स्थापना की। इसका उद्देश्य संयुक्त अरब अमीरात के साथ मिल कर अफ्रीका के पूर्वी तट से सुदूर प्रशांत तक समुद्री क्षेत्र में जागरूकता और सुरक्षा सुनिश्चित करना है। इससे क्षेत्रीय संतुलन कायम करने में काफी मदद मिलेगी।

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ऐसे दौर में जब रूस-यूक्रेन, इजराइल-हमास संघर्ष चल रहा है और इसके चलते विश्व की आपूति शृंखला प्रभावित हुई है। दुनिया के तमाम देश मंदी की मार झेल रहे हैं। तब नए वैश्विक समीकरण के लिए शांति और सहयोग की दिशा में इन दोनों देशों की दोस्ती से काफी उम्मीदें जगती हैं। दोनों के बीच अनुसंधान, विज्ञान और प्रौद्योगिकी, वाणिज्य-व्यापार आदि के क्षेत्र में असीमित संभावनाएं हैं। मैक्रों की इस भारत यात्रा से उन दिशाओं में नए दरवाजे खुलेंगे।

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