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Jansatta Editorial: जलवायु परिवर्तन की वजह से विभिन्न क्षेत्रों में महंगाई बढ़ने की आशंका

हमारे कृषि क्षेत्र का बड़ा हिस्सा आज भी मानसून पर निर्भर है। बहुत सारे इलाकों में सिंचाई के संसाधन उपलब्ध नहीं हैं। जिस वर्ष उन इलाकों में बारिश कम होती है या नहीं होती, उस वर्ष वहां उत्पादन खासा नीचे चला जाता है।
Written by: जनसत्ता | Edited By: Bishwa Nath Jha
नई दिल्ली | Updated: April 25, 2024 07:48 IST
jansatta editorial  जलवायु परिवर्तन की वजह से विभिन्न क्षेत्रों में महंगाई बढ़ने की आशंका
प्रतीकात्मक तस्वीर। फोटो -(इंडियन एक्सप्रेस)।
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जलवायु परिवर्तन का असर अब दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं पर नजर आने लगा है। खासकर कृषि क्षेत्र इससे बुरी तरह प्रभावित हो रहा है। मौसम का मिजाज बदलने से फसलें चौपट हो रही हैं, जिसका सीधा असर खाद्यान्न की कीमतों पर पड़ रहा है। अब भारतीय रिजर्व बैंक ने भी माना है कि प्रतिकूल मौसम की वजह से महंगाई बढ़ सकती है।

यह निस्संदेह रिजर्व बैंक के लिए भी बड़ी चिंता का विषय है। वह महंगाई को चार फीसद के नीचे रखना चाहता है। इसलिए मार्च में जब खुदरा महंगाई 4.9 फीसद दर्ज हुई तो कुछ उत्साह देखा गया था। तब रिजर्व बैंक ने दावा किया था कि वह जल्दी ही महंगाई पर काबू पा लेगा। मगर अब मौसम का रुख देखते हुए उसे लगने लगा है कि यह काम आसान नहीं होगा।

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अभी जब गेहूं की फसल कट कर खलिहान में पहुंची है, तो देश के अनेक इलाकों में मूसलाधार बारिश ने उसे भिगो दिया। बहुत सारा अनाज गोदाम में पहुंचने से पहले ही भीग गया। इस तरह बहुत सारा अनाज सड़ कर बर्बाद हो जाएगा। यह अब जैसे हर वर्ष का सिलसिला हो गया है। बेमौसम बारिश हजारों टन अनाज बर्बाद कर डालती है।

खुदरा महंगाई में सबसे अधिक चिंता खाने-पीने की वस्तुओं की कीमतों को लेकर है। रोजमर्रा इस्तेमाल होने वाले अनाज और सब्जियों की कीमतें सामान्य आयवर्ग की पहुंच से दूर होती जा रही हैं। इसकी एक वजह र्इंधन की कीमतों में बढ़ोतरी भी है, जिससे ढुलाई पर खर्च बढ़ गया है। अभी जिस तरह की वैश्विक स्थितियां हैं उसमें आपूर्ति शृंखला गड़बड़ होने से कच्चे तेल की कीमतें अनिश्चित बनी हुई हैं।

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इससे भी रिजर्व बैंक की महंगाई को लेकर चिंता बनी हुई है। पहले रूस-यूक्रेन संघर्ष के चलते दुनिया भर में मुश्किलें पैदा हुई थीं, अब इजराइल-फिलिस्तीन संघर्ष में ईरान के कूद पड़ने और उस पर अमेरिका की सख्त व्यापारिक पाबंदियों से संकट और गहरा हो गया है। भारत चूंकि कच्चे तेल के लिए दूसरे देशों पर निर्भर है, ऐसी स्थिति में उसे तेल की कीमतें नीचे ला पाना कठिन होगा।

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मगर मौसम की मार से पार पाने का कोई रास्ता किसी के पास नजर नहीं आता। सर्दी, गर्मी, बरसात की अवधि असंतुलित हो गई है। एक ही वक्त में कहीं तेज बारिश और बाढ़ की वजह से फसलें चौपट हो जाती हैं, तो कहीं सूखे की वजह से। सर्दी की अवधि सिकुड़ने के चलते खासकर गेहूं की फसल पर बुरा असर पड़ रहा है। गर्मी का मौसम जल्दी शुरू हो जाने से गेहूं का उत्पादन कम हो रहा है।

हमारे कृषि क्षेत्र का बड़ा हिस्सा आज भी मानसून पर निर्भर है। बहुत सारे इलाकों में सिंचाई के संसाधन उपलब्ध नहीं हैं। जिस वर्ष उन इलाकों में बारिश कम होती है या नहीं होती, उस वर्ष वहां उत्पादन खासा नीचे चला जाता है। अभी तक का आकलन है कि मौसम का मिजाज गड़बड़ होने से सकल घरेलू उत्पाद में करीब डेढ़ फीसद तक का नुकसान उठाना पड़ रहा है।

जैसी कि जलवायु परिवर्तन की वजह से विभिन्न क्षेत्रों पर बुरा असर पड़ने की आशंकाएं जताई जा रही हैं, कृषि क्षेत्र उनमें सबसे अधिक प्रभावित होगा। ऐसे में महंगाई पर काबू पाना रिजर्व बैंक के लिए आसान नहीं होगा। बेरोजगारी बढ़ने और प्रतिव्यक्ति आय कम होने से महंगाई की मार ज्यादा गहरी पड़ रही है। इससे निपटने के लिए रिजर्व बैंक को वैकल्पिक व्यवस्था बनानी पड़ेगी।

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