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Jansatta Editorial: चुनावी चंदे का विवाद बना राजनीतिक दलों के लिए गले की हड्डी

लोकतंत्र में राजनीतिक दलों से पारदर्शिता की अपेक्षा की जाती है। अगर वे चंदा जुटा कर अपनी ताकत का प्रदर्शन और अनाप-शनाप खर्च की होड़ शुरू कर दें तो इसे मतदाताओं के साथ गंभीर धोखा ही कहा जाएगा।
Written by: जनसत्ता | Edited By: Bishwa Nath Jha
नई दिल्ली | Updated: March 09, 2024 01:12 IST
jansatta editorial  चुनावी चंदे का विवाद बना राजनीतिक दलों के लिए गले की हड्डी
प्रतीकात्मक तस्वीर। फोटो -(इंडियन एक्सप्रेस)।
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चुनावी चंदे का विवाद राजनीतिक दलों के लिए गले की हड्डी बनता जा रहा है। भले वे पार्टियां इसे बढ़-चढ़ कर राजनीतिक रंग देने की कोशिश में जुटी हैं, जिन्हें कम चंदा मिला है, मगर पारदर्शिता उनके यहां भी नहीं है। चाहे वे राष्ट्रीय दल हों या क्षेत्रीय, सबने अज्ञात स्रोतों से चंदा हासिल किया है।

एसोसिएशन फार डेमोक्रेटिक रिफार्म यानी एडीआर नामक संगठन ने अपने अध्ययन में खुलासा किया है कि राजनीतिक दलों को मिले कुल चंदे के बयासी फीसद हिस्से के बारे में कोई जानकारी नहीं है। वह चुनावी बांड से प्राप्त हुआ धन है। चुनावी बांड का प्रावधान इसलिए किया गया था कि चंदे के रूप में काले धन का प्रवाह रोका जा सके। मगर वह तरीका कारगर साबित नहीं हुआ।

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इसे लेकर विवाद तब और बढ़ गया, जब देखा गया कि सत्तापक्ष और विपक्ष के सारे दलों को मिले चंदे की राशि में बहुत अंतर है। कुल चंदे का करीब आधा हिस्सा अकेले सत्तापक्ष को मिला और बाकी में सारे दलों का हिस्सा है। विचित्र बात यह कि एक करोड़ की राशि वाले चंदों की संख्या अधिक थी और छोटी राशि के चंदे बहुत कम आए।

मगर चुनावी बांड के नियमों के मुताबिक चूंकि चंदा देने वालों के नाम उजागर नहीं किए जा सकते, इसलिए उनके स्रोत अज्ञात ही बने रहे। इसलिए सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि लोकतंत्र में मतदाता को यह जानने का अधिकार है कि किस पार्टी को कितना और कहां-कहां से चंदा मिला।

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हालांकि पिछले महीने सर्वोच्च न्यायालय ने चुनावी बांड को असंवैधानिक करार देते हुए उस पर रोक लगा दी और भारतीय स्टेट बैंक से तीन हफ्ते के भीतर वे सारे नाम निर्वाचन आयोग को सौंपने को कहा, जिन्होंने पिछले पांच वर्षों में राजनीतिक दलों को चंदे दिए हैं। मगर स्टेट बैंक ने सर्वोच्च न्यायालय में समय सीमा बढ़ा कर जून तक करने की फरियाद लगा दी।

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इसे लेकर स्वाभाविक ही एक नए तरह का विवाद शुरू हो गया। अब सर्वोच्च न्यायालय में गुहार लगाई गई है कि स्टेट बैंक की इस नाफरमानी पर अवमानना की कार्रवाई हो। देखने की बात है कि अदालत इस पर क्या रुख लेती है। मगर एडीआर के अध्ययन से एक बार फिर यही जाहिर हुआ है कि चुनावी बांड का प्रावधान इसी मंशा से किया गया था कि राजनीतिक दल मनमाने तरीके से चंदा जुटा सकें और उसके बारे में लोगों को जानकारी भी न मिलने पाए।

लोकतंत्र में राजनीतिक दलों से पारदर्शिता की अपेक्षा की जाती है। अगर वे चंदा जुटा कर अपनी ताकत का प्रदर्शन और अनाप-शनाप खर्च की होड़ शुरू कर दें तो इसे मतदाताओं के साथ गंभीर धोखा ही कहा जाएगा। मतदाता को पूरा हक है कि जिस दल के पक्ष में वह मतदान करता है, उसके बारे में हर जानकारी प्राप्त करे। उसके आय-व्यय का हिसाब भी उसे पता हो।

फिर जो कंपनियां राजनीतिक दलों को चंदा देती हैं, उन्हें भी ओट में न रखा जाए, क्योंकि बहुत सारे लोगों के शेयर उन कंपनियों में लगे होते हैं। इस तरह उन्हें जानने का हक है कि जिस कंपनी के साथ वे जुड़े हैं, वह कहीं उनका पैसा किसी गलत जगह तो नहीं लगा रही। आयकर विभाग राजनीतिक दलों के चंदे का भी हिसाब रखता है, मगर चुनावी बांड नियमों की वजह से वह भी अंधेरे में रह जाता है कि चंदे का स्रोत क्या है।

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