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संपादकीय: केंद्रीय एजेंसियों का दायरा और CJI की नसीहत, जांच-पड़ताल और निजता अधिकारों के बीच संतुलन जरूरी

प्रधान न्यायाधीश की इस नसीहत को जांच एजंसियां कितनी गंभीरता से लेंगी और उस पर कितना अमल करेंगी, कहना मुश्किल है।
Written by: जनसत्ता
नई दिल्ली | Updated: April 03, 2024 14:22 IST
संपादकीय  केंद्रीय एजेंसियों का दायरा और cji की नसीहत  जांच पड़ताल और निजता अधिकारों के बीच संतुलन जरूरी
CJI DY Chandrachud: सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़। (फोटो सोर्स: FILE/ANI)
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पिछले कुछ वर्षों से केंद्रीय जांच एजंसियों की कार्यप्रणाली लगातार प्रश्नांकित होती रही है। कई मौकों पर अदालतें भी उनकी जिम्मेदारी और जवाबदेही याद दिला चुकी हैं। उसी क्रम में सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश ने भी कहा कि जांच एजंसियों को उन अपराधों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए, जो देश की सुरक्षा, आर्थिक स्थिति और लोकव्यवस्था के लिए असल में खतरा पैदा करते हों। उन्होंने इस पक्ष को भी रेखांकित किया कि जांच अनिवार्यताओं और व्यक्तिगत गोपनीयता अधिकारों के बीच संतुलन बनाने की तत्काल आवश्यकता है।

प्रधान न्यायाधीश के इस कथन को प्रवर्तन निदेशालय, केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो और आयकर विभाग की पिछले कुछ सालों में की गई छापेमारी और गिरफ्तारियों, जब्ती वगैरह के मद्देनजर देखें, तो स्थितियां स्वत: स्पष्ट हो जाती हैं। हालांकि प्रधान न्यायाधीश की इस नसीहत को जांच एजंसियां कितनी गंभीरता से लेंगी और उस पर कितना अमल करेंगी, कहना मुश्किल है। बेशक प्रधान न्यायाधीश ने ये बातें सीबीआइ के ही एक आयोजन में कहीं। मगर जैसा कि अनेक मामलों में देखा जाता है, सार्वजनिक मंचों से कही बातों को अक्सर आदर्श वक्तव्य की तरह केवल सुन लिया जाता है, उन पर अमल करना जरूरी नहीं समझा जाता। सीबीआइ भी ऐसा ही करे, तो हैरानी की बात नहीं।

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केंद्रीय जांच एजंसियों पर लंबे समय से आरोप लगते रहे हैं कि वे सरकार के इशारे और उसकी इच्छा के अनुरूप काम करती हैं। पिछले कुछ वर्षों में भ्रष्टाचार पर नकेल कसने के इरादे से लगातार की जा रही कार्रवाइयों के मद्देनजर ये आरोप निरंतर गाढ़े होते गए हैं। इसकी बड़ी वजह यह भी है कि अधिकतर कार्रवाइयां विपक्षी दलों के नेताओं के खिलाफ ही की गई हैं। उसमें कई नेताओं को सलाखों के पीछे भी डाला गया। अनेक मामलों में आरोप लगते रहे कि गलत तरीके से जब्ती की गई, पूछताछ के नाम पर लोगों को नाहक परेशान और प्रताड़ित किया गया।

यह सवाल भी लगातार पूछा जाता है कि जांच एजंसियां जितने छापे मारती और कार्रवाइयां करती हैं, उनमें से पांच फीसद मामलों में भी दोष सिद्ध नहीं हो पाते। धनशोधन निवारण कानून की धाराएं इतनी सख्त हैं कि उनके तहत गिरफ्तार किए गए लोगों को तब तक जमानत नहीं दी जाती, जब तक कि वे निर्दोष साबित नहीं हो जाते। इसलिए सर्वोच्च अदालत ने पहले भी कहा था कि इस कानून के तहत गिरफ्तारी से पहले जांच एजंसियों को पूरी तरह आश्वस्त होना चाहिए कि मामले में दोषसिद्धि की कितनी संभावना है। मगर इसे भी गंभीरता से नहीं लिया गया।

ताबड़तोड़ छापों से परेशान होकर विपक्षी दलों ने इन पर रोक लगाने के लिए सर्वोच्च न्यायालय से गुहार लगाई, तब अदालत ने कहा था कि धनशोधन का मामला आतंकवादी और राष्ट्रविरोधी गतिविधियों से भी जुड़ा हो सकता है, इसलिए एजंसियों को इस काम से रोका नहीं जा सकता। अब प्रधान न्यायाधीश ने जांच एजंसियों का दायरा स्पष्ट कर दिया है कि उन्हें उन्हीं मामलों पर अपना ध्यान केंद्रित करने की जरूरत है, जिनसे राष्ट्र की सुरक्षा, आर्थिक स्थिति और लोकव्यवस्था को खतरा पैदा होता हो। उसमें व्यक्ति के निजी अधिकारों की सुरक्षा का भी ध्यान रखने की जरूरत है। जांच एजंसियां जांच के नाम पर अक्सर व्यक्तियों के फोन, कंप्यूटर जैसे निजी उपकरण भी जब्त कर लेती हैं, जिनमें उनकी व्यक्तिगत सामग्री हो सकती है। इन नैतिक और कानूनी तकाजों का ध्यान एजंसियां तभी रख सकती हैं, जब उनमें वास्तव में स्वतंत्र रूप से काम करने की इच्छाशक्ति हो।

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