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संपादकीय: मणिपुर में उपद्रवियों के हौसले बढ़े, शांति बहाली में इच्छाशक्ति की कमी बड़ी चुनौती

मणिपुर में कुकी और मैतेई समुदाय के बीच संघर्ष, एक भ्रमपूर्ण बयान की वजह से भड़क उठा था। हालांकि अब वहां की अदालत खुद इस संभावना को खारिज कर चुकी है कि मैतेई समुदाय के लोगों को जनजातीय समुदाय का दर्जा दिया जाना चाहिए।
Written by: जनसत्ता
नई दिल्ली | Updated: June 12, 2024 07:34 IST
संपादकीय  मणिपुर में उपद्रवियों के हौसले बढ़े  शांति बहाली में इच्छाशक्ति की कमी बड़ी चुनौती
मणिपुर से मुख्यमंत्री बीरेन सिंह (PTI)
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एक वर्ष से अधिक समय बीत गया, मगर अभी तक मणिपुर में खूनी संघर्ष समाप्त नहीं हो पाया है। शुरू से ही वहां शांति बहाली के प्रयास शिथिल नजर आते हैं। प्रशासन और सुरक्षाबलों ने इच्छाशक्ति दिखाई होती, तो बहुत पहले इस समस्या का समाधान निकल गया होता। मगर उनकी भूमिका संदिग्ध बनी हुई है। इसी का नतीजा है कि सोमवार को उपद्रवियों ने घात लगा कर मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह के काफिले पर हमला कर दिया। गनीमत है कि उसमें सिर्फ एक सिपाही घायल हुआ, कोई बड़ा नुकसान नहीं हुआ। इससे वहां के उपद्रवियों के हौसले का अंदाजा लगाया जा सकता है।

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संघ प्रमुख मोहन भागवत ने मणिपुर की स्थिति पर जाहिर की चिंता

अब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने मणिपुर की स्थिति पर चिंता जाहिर करते हुए कहा है कि इतने लंबे समय से वहां अशांति का वातावरण है, मगर उसे हल करने की कोशिश नहीं की गई। इसे प्रथमिकता में रखते हुए शांति बहाली का प्रयास किया जाना चाहिए। पिछले दस वर्षों से वहां शांति का वातावरण था। हालांकि भागवत ने भी इस मामले में बयान देने में काफी वक्त लगा दिया। इसे लेकर विपक्षी दल लगातार सवाल उठाते रहे हैं। संसद में भी प्रश्न पूछे गए, मगर कोई संतोषजनक उत्तर नहीं मिल सका। अभी तक पूछा जाता है कि मणिपुर पर प्रधानमंत्री क्यों खामोश हैं।

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मणिपुर में कुकी और मैतेई समुदाय के बीच संघर्ष, एक भ्रमपूर्ण बयान की वजह से भड़क उठा था। हालांकि अब वहां की अदालत खुद इस संभावना को खारिज कर चुकी है कि मैतेई समुदाय के लोगों को जनजातीय समुदाय का दर्जा दिया जाना चाहिए। मगर न तो राज्य और न केंद्र सरकार मणिपुर के खूनी संघर्ष को रोक पाई है। शुरू में जरूर केंद्रीय गृहमंत्री वहां गए थे, मगर फिर कोई उल्लेखनीय कार्रवाई नहीं हो सकी।

बाद में सर्वोच्च न्यायालय ने मामले का संज्ञान लेते हुए जांच और कार्रवाई के लिए समितियां गठित कर दी, मगर उसका भी कोई नतीजा नजर नहीं आ रहा। पिछले वर्ष मई में शुरू हुए इस संघर्ष में अब तक सवा दो सौ से अधिक लोगों के मारे जाने, चार सौ से अधिक लोगों के घायल होने, हजारों घरों के जलाए जाने और साठ हजार से अधिक लोगों के विस्थापित होकर राहत शिविरों में शरण लेने के तथ्य उजागर हैं। सरकारों को अब यह बहाना जरूर मिल गया है कि मणिपुर के संघर्ष को रोकने की कार्रवाई सर्वोच्च अदालत की निगरानी में चल रही है, इसलिए वे इसमें बहुत हस्तक्षेप नहीं कर सकतीं। मगर यह उनका अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेने का एक और तरीका है।

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यह समझना मुश्किल है कि कैसे कोई भी कल्याणकारी सरकार अपने नागरिकों को इस तरह मारकाट करते देखती रह सकती है। राज्य सरकार तो इस मामले में शुरू से नाकाम साबित हुई है, मगर केंद्र सरकार ने इस पर अपेक्षित गंभीरता क्यों नहीं दिखाई, समझ से परे है। जिस तरह वहां महिलाओं को निर्वस्त्र करके घुमाया गया, उनके साथ सामूहिक बलात्कार किया गया, उससे पूरी दुनिया में देश की छवि खराब हुई। मणिपुर के लोगों का सरकार और प्रशासन पर से भरोसा उठ चुका है। गांव वाले खुद सुरक्षा दल बना कर पहरेदारी करते और उपद्रवियों से बचने की कोशिश करते हैं। यानी वहां के लोगों को एक तरह से उनके हाल पर छोड़ दिया गया है। संघ प्रमुख की मणिपुर को लेकर प्रकट की गई चिंता को केंद्र सरकार कितनी गंभीरता से लेती है, देखने की बात है।

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