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Jansatta Editorial: भारतीय अर्थव्यवस्था के तेजी से बढ़ने के तमाम दावों के बावजूद महंगाई पर नियंत्रण बनी चुनौती

श्रम मंत्रालय के ताजा आंकड़ों से स्पष्ट है कि निम्न मध्यवर्ग और गरीबों की परेशानी बढ़ी है। वस्तुओं की खुदरा कीमतें इस स्तर पर पहुंचने के बाद एक बड़ी आबादी खाने-पीने में कटौती करने को मजबूर हो जाती है।
Written by: जनसत्ता | Edited By: Bishwa Nath Jha
नई दिल्ली | December 22, 2023 08:37 IST
jansatta editorial  भारतीय अर्थव्यवस्था के तेजी से बढ़ने के तमाम दावों के बावजूद महंगाई पर नियंत्रण बनी चुनौती
प्रतीकात्‍मक तस्‍वीर। फोटो- (इंडियन एक्‍सप्रेस)।
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भारतीय अर्थव्यवस्था के तेजी से बढ़ने के तमाम दावों के बावजूद महंगाई पर नियंत्रण चुनौती बनी हुई है। महंगाई के मोर्चे पर मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रहीं और धरातल पर नतीजे नहीं दिख रहे। चावल, गेहूं आटा, दालें, प्याज, हल्दी, लहसुन, मिश्रित मसाले जैसी जरूरी वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि से कृषि श्रमिकों के लिए खुदरा मुद्रास्फीति नवंबर में बढ़कर 7.37 फीसद हो गई है।

ग्रामीण श्रमिकों के लिए यह 7.13 फीसद रही। हालांकि, अक्तूबर में खुदरा मुद्रास्फीति थोड़ी कम थी - कृषि श्रमिकों की 7.08 फीसद और ग्रामीण श्रमिकों की 6.92 फीसद। श्रम मंत्रालय के ताजा आंकड़ों से स्पष्ट है कि निम्न मध्यवर्ग और गरीबों की परेशानी बढ़ी है। वस्तुओं की खुदरा कीमतें इस स्तर पर पहुंचने के बाद एक बड़ी आबादी खाने-पीने में कटौती करने को मजबूर हो जाती है।

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ठंड की शुरुआत के बाद बाजार में कीमतों में कमी आती है, लेकिन ताजा आंकड़े इसके अनुकूल नहीं दिख रहे। मौजूदा स्थिति अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल असर डालेगी, क्योंकि जब खाने-पीने के सामान की कीमतें लोगों की पहुंच से दूर होने लगती हैं, तो इसका सीधा असर उनके बाकी खर्चों पर पड़ता है।

आमतौर पर जब थोक बाजार में कीमतें बढ़ती हैं तो खुदरा बाजार में इसकी तुलना में काफी अधिक कीमतें बढ़ जाती हैं। इससे आम उपभोक्ता की जेब पर असर पड़ता है। लेकिन चावल, गेहूं आटा, दालें, प्याज, हल्दी, लहसुन, मिश्रित मसालों के मामले में हकीकत कुछ और है। इन वस्तुओं के आयात और निर्यात में असंतुलन बड़ा कारण है।

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मसलन, कई साल से दालों का उत्पादन जरूरत से ज्यादा हो रहा है, पर दूसरे देशों से करार के मुताबिक दालों का आयात किया जा रहा है। नतीजा यह कि किसान स्थानीय बाजारों में न्यूनतम समर्थन मूल्य से भी कम दर पर दालें बेचने को विवश हो रहे हैं। दूसरी ओर, आयातित दालें थोक बाजार की मार्फत बिक रही हैं, जिनकी कीमत अधिक होती है। इसी तरह की स्थिति गेहूं, आटा, मसालों आदि के मामले में है।

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अफसोस कि महंगाई नियंत्रित करने के लिए तैयार किया गया समकालीन ढांचा महंगाई को केवल आपूर्ति पक्ष से जोड़कर देख रहा है। महंगाई के मामले में राहत के उपाय खोज रहे नीति नियंताओं को यह समझना होगा। खासकर उस स्थिति में, जब वे एशिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था को महामारी से उपजी मंदी के बाद टिकाऊ तरीके से उबारने की पुरजोर कोशिश में जुटे हैं।

इन हालात में उपभोक्ताओं के कंधों पर असंगत तरीके से महंगाई का बोझ पड़ना ठीक नहीं है। आवास, स्वास्थ्य, शिक्षा, मनोरंजन और व्यक्तिगत देखभाल सहित सेवा श्रेणी की कीमतों में भी क्रमिक वृद्धि देखी गई है, क्योंकि मांग में धीरे-धीरे सुधार हुआ है। सेवा प्रदाताओं के सामने संभलकर आगे बढ़ने की चुनौती है।

ऐसे में कीमतों का गणित समझने से पहले नीति नियंताओं को खाद्यान्न उत्पादन, खपत और सरकारी खरीद का हिसाब-किताब समझना होगा। आम आदमी की जेब में बचत के कुछ न कुछ पैसे तो जरूर होने चाहिए। इससे आम आदमी निश्चिंत होकर अपने जीवन के अन्य पक्षों पर ध्यान दे सकेगा। अगर महंगाई के कारण कुछ नहीं बचा पाया तो फिर वह बाजार में खरीदारी करने कैसे जाएगा। बाजार टूटने का सीधा असर अर्थव्यवस्था पर होता है। इसलिए जरूरी है कि महंगाई पर काबू पाने के लिए वस्तुओं के विपणन, भंडारण और आयात पर तर्कसंगत नजरिए से काम हो।

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