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संपादकीय: अर्थव्यवस्था का हाल, गरीबी में कमी, लेकिन घरेलू खर्च हो गए दोगुने से अधिक

महंगाई और प्रति व्यक्ति खर्च बढ़ना एक स्वस्थ अर्थव्यवस्था की निशानी माना जाता है। मगर इसके साथ-साथ प्रति व्यक्ति आय में भी समतुल्य बढ़ोतरी दर्ज होना आवश्यक है।
Written by: जनसत्ता
नई दिल्ली | Updated: February 27, 2024 08:37 IST
संपादकीय  अर्थव्यवस्था का हाल  गरीबी में कमी  लेकिन घरेलू खर्च हो गए दोगुने से अधिक
जनता को लंबे समय से महंगाई से निजात मिलने की उम्मीद है। (Photo- Indian Express File)
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अर्थव्यवस्था के तेज विकास और दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति बनने के दावों के बीच हकीकत यह है कि पिछले बारह-तेरह सालों में लोगों का घरेलू खर्च बढ़ कर दोगुने से अधिक हो गया है। सांख्यिकी एवं कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय के ताजा घरेलू उपभोग व्यय सर्वेक्षण के मुताबिक मौजूदा कीमतों पर शहरी क्षेत्रों में प्रति व्यक्ति औसत घरेलू खर्च 2011-12 के 2,630 रुपए से बढ़ कर 2022-23 में दोगुने से अधिक यानी 6,459 रुपए हो गया है। इसी तरह ग्रामीण इलाकों में यह 1,430 रुपए से बढ़कर 3,773 रुपए हो गया है।

इसमें यह भी जाहिर हुआ है कि गैर-खाद्य वस्तुओं पर खर्च बढ़ा है, जबकि खाद्यान्न पर खर्च पहले की तुलना में कम हुआ है। फलों, सब्जियों, दूध, मछली, खाद्य तेल आदि पर खर्च बढ़ा है। इसी तरह शिक्षा, स्वास्थ्य, मनोरंजन, वस्त्र और दूसरी जरूरी उपभोक्ता वस्तुओं पर खर्च बढ़ा है। इसकी एक वजह तो यह बताई जा रही है कि कोविड के समय शहरों से गांवों की तरफ लौटे लोगों के कृषि क्षेत्र में समाहित हो जाने से उस क्षेत्र का औसत उपभोग खर्च बढ़ा है। मगर यही तर्क शहरी खर्च बढ़ने पर लागू नहीं होता। यह तब है, जब सरकार लगातार महंगाई पर काबू पाने का प्रयास कर रही है।

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इन आंकड़ों के समांतर दावा यह भी है कि गरीबी में पांच फीसद की कमी आई है। बहुआयामी गरीबी से करीब तेईस करोड़ लोगों के बाहर निकलने का आंकड़ा भी कुछ दिनों पहले चर्चा में था। इन सबके बीच एक तथ्य यह भी है कि प्रति व्यक्ति आय में कोई उल्लेखनीय बढ़ोतरी नहीं हुई है। ग्रामीण क्षेत्रों में प्रति व्यक्ति मासिक आय भी लगभग उतनी ही है, जितना प्रति व्यक्ति मासिक खर्च है।

मगर इससे प्रति व्यक्ति आय और प्रति व्यक्ति खर्च का समीकरण संतुलित नहीं होता। ज्यादातर परिवारों में एक ही व्यक्ति कमाने वाला होता है, जबकि उस पर निर्भर औसतन तीन लोग होते हैं। इन्हीं आंकड़ों के बीच सरकार का दावा है कि वह बयासी करोड़ लोगों को मुफ्त राशन उपलब्ध कराती है। यानी प्रति व्यक्ति मासिक घरेलू व्यय के औसत में इस आबादी का हिस्सा भी शामिल है। कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि चूंकि यह सर्वेक्षण ग्यारह सालों बाद आया है, इसलिए इसमें प्रति व्यक्ति खर्च ऊंचे स्तर पर नजर आ रहा है।

महंगाई और प्रति व्यक्ति खर्च बढ़ना एक स्वस्थ अर्थव्यवस्था की निशानी माना जाता है। मगर इसके साथ-साथ प्रति व्यक्ति आय में भी समतुल्य बढ़ोतरी दर्ज होना आवश्यक है। विचित्र है कि प्रति व्यक्ति आय उस अनुपात में नहीं बढ़ रही है, जिस अनुपात में महंगाई और घरेलू खर्च बढ़ रहा है। इसकी बड़ी वजह रोजगार के नए अवसर सृजित न हो पाना और कोविड के दौरान बाहर हुए लोगों का वापस रोजगार में न लौट पाना है। जो लोग कृषि क्षेत्र में समाहित हो गए हैं, उन्हें भी दैनिक मजदूरी उपलब्ध नहीं हो पाती। कृषि क्षेत्र खुद कई संकटों से गुजर रहा है।

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मौसम की मार से फसलों के बर्बाद होने और लागत के अनुपात में फसलों की वाजिब कीमत न मिल पाने की वजह से इस क्षेत्र में मजदूरी घटी है। मनरेगा जैसे कार्यक्रमों में भी काम सौ दिन से घट कर मुश्किल से साल में साठ दिन ही मिल पाता है। ऐसे में अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं कि घरेलू खर्च बढ़ने से लोगों को किन मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है।

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