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संपादकीय: प्रतियोगी परीक्षाओं में नकल के ठेकेदार, छात्रों के भविष्य के साथ खेल

उत्तर प्रदेश पुलिस भर्ती कोई पहली प्रतियोगी परीक्षा नहीं है, जिसके पर्चे परीक्षा शुरू होने से पहले बाहर आ गए। अब तो जैसे यह सिलसिला-सा बन चुका है कि जब भी कोई प्रतियोगी परीक्षा होती है, उसमें नकल कराने वाले सेंध लगाने का उपाय तलाश ही लेते हैं।
Written by: जनसत्ता
नई दिल्ली | Updated: February 26, 2024 09:56 IST
संपादकीय  प्रतियोगी परीक्षाओं में नकल के ठेकेदार  छात्रों के भविष्य के साथ खेल
उत्तर प्रदेश सरकार का दावा है कि उसने अपराधियों के हौसले पस्त कर दिए हैं। पुलिस भर्ती में वर्षों से चली आ रही धांधली को खत्म कर पारदर्शिता लाई गई है। मगर नकल पर नकेल कसने में वह विफल कैसे साबित हो रही है!
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प्रतियोगी परीक्षाओं में धांधली रोकने के तमाम उपाय नकल के धंधेबाजों के आगे विफल नजर आते हैं। अब उत्तर प्रदेश पुलिस भर्ती की परीक्षा में नकल कराने वालों ने सेंधमारी कर ली। आखिरकार सरकार को परीक्षा रद्द करनी पड़ी। पर्चा बाहर होने से परीक्षार्थी नाराज थे, विरोध प्रदर्शन कर रहे थे। उत्तर प्रदेश सरकार ने उन्हें भरोसा दिलाया है कि छह महीने के भीतर दुबारा परीक्षा कराई जाएगी।

परीक्षा केंद्रों से ऐसे लोग भी पकड़े गए हैं जो पर्चा हल कर भीतर भेजते थे

मुख्यमंत्री ने कहा है कि परीक्षाओं में शुचिता से कोई समझौता नहीं किया जा सकता। युवाओं की मेहनत के साथ खिलवाड़ करने वाले किसी भी दशा में बख्शे नहीं जाएंगे। इस सेंधमारी की जांच विशेष कार्यबल को सौंप दी गई है। हालांकि कुछ परीक्षा केंद्रों से ऐसे लोगों को गिरफ्तार भी किया गया है, जो पर्चा हल कर भीतर भेज रहे थे। मगर हर बार की तरह यह सवाल अनुत्तरित ही रह जाना है कि आखिर प्रतियोगी परीक्षा का प्रश्नपत्र बाहर हुआ कैसे। आजकल ज्यादातर परीक्षाएं चाक-चौबंद कंप्यूटर केंद्रों पर होने लगी हैं। जो परीक्षाएं इस तरह नहीं होतीं, उनमें प्रश्न पत्र और उत्तर पुस्तिकाएं रखने की जगहों तथा परीक्षा केंद्रों पर सख्त निगरानी रखी जाती है। मगर विचित्र है कि उत्तर प्रदेश पुलिस खुद पुलिस भर्ती परीक्षा के प्रश्नपत्रों की सुरक्षा नहीं कर पाई।

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हर राज्य इस समस्या से परेशान है, ऑनलाइन परीक्षाओं में भी गड़बड़ी

यह कोई पहली प्रतियोगी परीक्षा नहीं है, जिसके पर्चे परीक्षा शुरू होने से पहले बाहर आ गए। अब तो जैसे यह सिलसिला-सा बन चुका है कि जब भी कोई प्रतियोगी परीक्षा होती है, उसमें नकल कराने वाले सेंध लगाने का उपाय तलाश ही लेते हैं। हर राज्य इस समस्या से ग्रस्त है। यहां तक कि जो परीक्षाएं कंप्यूरीकृत प्रणाली से होती हैं, उनमें भी ऐसी गड़बड़ी देखी गई है।

अंदाजा लगाया जा सकता है कि इस तरह परीक्षा रद्द होने से विद्यार्थियों को कितनी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। न केवल परीक्षा की तैयारी में लगी उनकी मेहनत बर्बाद जाती है, बल्कि बहुत सारे विद्यार्थी तो जैसे-तैसे जुगाड़ करके परीक्षा का शुल्क अदा करते और फिर परीक्षा केंद्रों तक आने-जाने का बंदोबस्त करते हैं। इनमें हजारों ऐसे छात्र होते हैं तो जमीन, जेवर वगैरह गिरवी रखकर परीक्षा के लिए पैसे का इंतजाम करते हैं।

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पुलिस भर्ती के लिए महीनों वर्जिश करके खुद को तैयार करते हैं। उत्तर प्रदेश पुलिस भर्ती में पचास हजार पदों के लिए करीब पचास लाख युवाओं ने आवेदन किया था। हालांकि राज्य सरकार ने परीक्षार्थियों से दुबारा आवेदन शुल्क न लेने और परीक्षा के लिए राज्य परिवहन की बसों में निशुल्क यात्रा की सुविधा देने का वादा किया है। मगर नकल माफिया के सक्रिय रहते परीक्षा में पारदर्शिता का भरोसा कैसे किया जा सकता है।

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उत्तर प्रदेश सरकार का दावा है कि उसने अपराधियों के हौसले पस्त कर दिए हैं। पुलिस भर्ती में वर्षों से चली आ रही धांधली को खत्म कर पारदर्शिता लाई गई है। मगर नकल पर नकेल कसने में वह विफल कैसे साबित हो रही है! ऐसा नहीं माना जा सकता कि परीक्षाओं को सेंधमारों से पूरी तरह सुरक्षित नहीं बनाया जा सकता। लोक सेवा आयोग की परीक्षाएं ऐसे धंधेबाजों की पहुंच से दूर बनी हुई हैं।

उसी तरह राज्य स्तरीय और अधीनस्थ कर्मचारी चयन की परीक्षाओं को क्यों अभेद्य और पारदर्शी नहीं बनाया जा सकता। जब तक धांधली की इस प्रवृत्ति की जड़ों प्रहार नहीं किया जाएगा, नकल के कारोबारी सेंधमारी और बहुत सारे योग्य युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ करते रहेंगे।

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