scorecardresearch
For the best experience, open
https://m.jansatta.com
on your mobile browser.

Jansatta Editorial: महंगाई और बेरोजगारी पर काबू पाना अब भी बड़ी चुनौती

समीक्षा रिपोर्ट में कहा गया है कि पिछले दस वर्षों में कई उल्लेखनीय सुधार हुए हैं, जिसका असर आर्थिक प्रगति पर स्पष्ट देखा जा रहा है।
Written by: जनसत्ता | Edited By: Bishwa Nath Jha
नई दिल्ली | Updated: January 31, 2024 07:56 IST
jansatta editorial  महंगाई और बेरोजगारी पर काबू पाना अब भी बड़ी चुनौती
प्रतीकात्‍मक तस्‍वीर। फोटो- (इंडियन एक्‍सप्रेस)।
Advertisement

इस बार आर्थिक सर्वेक्षण के बजाय वित्त मंत्रालय ने बजट पूर्व आर्थिक समीक्षा रिपोर्ट पेश की। चुनावी वर्ष होने की वजह से इस बार अंतरिम बजट पेश होगा, इसलिए सरकार ने फैसला किया कि आर्थिक सर्वेक्षण के बजाय समीक्षा रिपोर्ट पेश की जाएगी। आर्थिक सर्वेक्षण चुनाव के बाद पेश होने वाले पूर्ण बजट के समय प्रकाशित किया जाएगा। अभी तक यही परंपरा रही है कि बजट से एक दिन पहले आर्थिक सर्वेक्षण प्रकाशित किया जाता है।

उसमें बताया जाता है कि पिछले बजट में सरकार ने जो लक्ष्य तय किए थे, उन्हें कहां तक हासिल किया जा सका है। इस तरह आर्थिक सर्वेक्षण एक तरह से सरकार के पूरे एक वर्ष के प्रदर्शन का मूल्यांकन भी करता है। मगर इस वर्ष वह परंपरा बदल दी गई। समीक्षा रिपोर्ट में कहा गया है कि चालू वित्तवर्ष में भारत की विकास दर सात फीसद रहेगी।

Advertisement

अगले तीन वर्षों में पांच लाख करोड़ डालर के सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी के साथ दुनिया की तीसरी अर्थव्यवस्था बन जाएगा। अभी 3.7 लाख करोड़ डालर की अनुमानित जीडीपी के साथ दुनिया की पांचवीं अर्थव्यवस्था है। 2030 तक इसके सात लाख करोड़ डालर तक पहुंचने और 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने की उम्मीद जताई गई है।

समीक्षा रिपोर्ट में लगभग वही बातें कही गई हैं, जो पिछले काफी अरसे से कही जा रही हैं। पांच लाख करोड़ डालर की अर्थव्यवस्था बनना सरकार का महत्त्वाकांक्षी लक्ष्य है। अभी जिस तरह दुनिया मंदी के दौर से गुजर रही है, मगर उसके बीच भारतीय अर्थव्यवस्था का रुख ऊपर की तरफ बना हुआ है, उसमें इसके पांच लाख करोड़ डालर के लक्ष्य तक पहुंचना मुश्किल नहीं माना जा रहा।

Advertisement

समीक्षा रिपोर्ट में कहा गया है कि पिछले दस वर्षों में कई उल्लेखनीय सुधार हुए हैं, जिसका असर आर्थिक प्रगति पर स्पष्ट देखा जा रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक घरेलू मांग और निवेश बढ़ा है, जिसके चलते पिछले तीन वर्षों से विकास दर सात फीसद से अधिक रही है। हालांकि समीक्षा रिपोर्ट में कही गई बातों से कितने आर्थिक विशेषज्ञ सहमत होंगे, देखने की बात है।

Advertisement

एक संतुलित अर्थव्यवस्था में विकास दर की जो गति होनी चाहिए, वह लड़खड़ाती नजर आती है। महंगाई और बेरोजगारी की दर पर काबू पाना अब भी बड़ी चुनौती है। इसलिए घरेलू मांग और निवेश का बढ़ना कुछ असंगत जान पड़ता है। औद्योगिक उत्पादन क्षेत्र में उत्साह नजर नहीं आ रहा। निर्माण और विनिर्माण क्षेत्र भी उतार-चढ़ाव के दौर से गुजर रहे हैं। ऐसे में विकास दर में संतुलन को लेकर सवाल बने रहते हैं।

हालांकि दुनिया की सभी रेटिंग एजंसियां मानती हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही है और इस वर्ष इसके सात फीसद से ऊपर रहने का अनुमान है। मगर व्यापार घाटे और राजकोषीय घाटे से पार पाना अब भी कठिन बना हुआ है। रोजगार के अपेक्षित नए अवसर सृजित न हो पाने के कारण बड़ी संख्या में लोगों की क्रयशक्ति कमजोर हुई है।

बाजार में पूंजी का प्रवाह संतुलित नहीं हो पा रहा, जिसके चलते भारतीय रिजर्व बैंक को रेपो दरों के मामले में कड़ा रुख अपनाए रखना पड़ रहा है। आय में असमानता बढ़ रही है, जो बड़ी चिंता का विषय है। इसलिए गरीबों की संख्या में कमी आने को लेकर भी संदेह जताए जा रहे हैं। ऐसे में अर्थव्यवस्था की गुलाबी तस्वीर निस्संदेह उत्साह पैदा करती है, पर बुनियादी कमजोरियों को दूर किए बिना विकसित राष्ट्र के दावे शायद अधूरे ही रहें।

Advertisement
Tags :
Advertisement
tlbr_img1 राष्ट्रीय tlbr_img2 ऑडियो tlbr_img3 गैलरी tlbr_img4 वीडियो