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Jansatta Editorial: हरियाणा में नेतृत्व परिवर्तन के जरिये जातीय समीकरण को साधने की जुगत में भाजपा

जजपा से गठबंधन तोड़ने का प्रमुख कारण है कि भाजपा जाट वोट में बिखराव पैदा करना चाहती है। जजपा अलग होकर चुनाव लड़ेगी तो वह जाट वोट में भारी सेंधमारी कर सकती है।
Written by: जनसत्ता | Edited By: Bishwa Nath Jha
Updated: March 14, 2024 08:06 IST
jansatta editorial  हरियाणा में नेतृत्व परिवर्तन के जरिये जातीय समीकरण को साधने की जुगत में भाजपा
प्रतीकात्‍मक तस्‍वीर। फोटो- (इंडियन एक्‍सप्रेस)।
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हरियाणा में हुए नेतृत्व परिवर्तन को लेकर स्वाभाविक ही अटकलबाजियां शुरू हो गईं। सब कुछ इतनी तेजी से हुआ कि लोग हैरान रह गए। एक दिन पहले प्रधानमंत्री ने एक सार्वजनिक मंच से मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर की खूब तारीफ की थी और दूसरे दिन उनका इस्तीफा हो गया। उसके तुरंत बाद नए मुख्यमंत्री के नाम की घोषणा हो गई और उन्हें शपथ भी दिला दी गई।

जाहिर है, भाजपा ने पहले से इसकी तैयारी कर रखी थी और किसी को भनक तक नहीं लगने दी। लोगों में हैरानी इस बात को लेकर ज्यादा देखी गई कि अगर केंद्रीय नेतृत्व मनोहर लाल खट्टर के कामकाज को लेकर नाराज था, तो फिर प्रधानमंत्री ने एक दिन पहले उनकी इतनी तारीफ क्यों की थी। मगर इस नेतृत्व परिवर्तन का गणित तब समझ में आया, जब गठबंधन से अलग होने के बावजूद जननायक जनता पार्टी यानी जजपा ने भाजपा के प्रति किसी प्रकार की कड़वाहट जाहिर नहीं की।

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पिछले सवा चार साल से दोनों पार्टियां गठबंधन में थीं और जजपा प्रमुख दुष्यंत चौटाला उपमुख्यमंत्री बने रहे। पर वे अचानक गठबंधन से अलग हो गए, तो किसी मतभेद की वजह से नहीं। अब स्पष्ट हो चुका है कि यह समीकरण भाजपा ने लोकसभा चुनावों के मद्देनजर तैयार किया है।

मनोहर लाल खट्टर को हटाने के पीछे भी वजह स्पष्ट है। चूंकि वे नौ वर्षों से मुख्यमंत्री थे और उनके कामकाज को लेकर न तो पहले कार्यकाल में हरियाणा के लोग बहुत खुश थे, न इस कार्यकाल में। खासकर किसान आंदोलन के वक्त जिस तरह उन्होंने सख्ती दिखाई उससे वहां के लोग खासे नाराज थे।

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इस बार भी पंजाब-हरियाणा सीमा पर किसानों को रोक कर उन पर जिस तरह आंसू गैस के गोले बरसाए गए, उससे नाराजगी और बढ़ी है। फिर डेरा सच्चा सौदा के राम रहीम की गिरफ्तारी और जाट आरक्षण के समय जिस तरह व्यापक हिंसा हुई और बीते नौ सालों में हरियाणा में अपराध की दर बढ़ी है, उससे भी लोग खासे नाखुश हैं। अगर खट्टर अपने पद पर बने रहते, तो लोकसभा चुनाव में भाजपा को इसका खमियाजा भुगतना पड़ता।

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खट्टर के अपने पद पर न रहने से उनके कार्यकाल की कड़वाहटें भी धीरे-धीरे लोगों की स्मृति से धुंधली होती जाएंगी। यह प्रयोग भाजपा इससे पहले गुजरात, उत्तराखंड, कर्नाटक और त्रिपुरा में कर चुकी है। विधानसभा चुनाव से पहले वहां भी इसी तरह सबको हैरान करते हुए मुख्यमंत्री बदल दिए गए थे। कर्नाटक को छोड़ कर तीन जगहों पर भाजपा को इस प्रयोग का फायदा भी मिला था।

जजपा से गठबंधन तोड़ने का प्रमुख कारण है कि भाजपा जाट वोट में बिखराव पैदा करना चाहती है। जजपा अलग होकर चुनाव लड़ेगी तो वह जाट वोट में भारी सेंधमारी कर सकती है। हरियाणा में कांग्रेस और आम आदमी पार्टी का गठबंधन होने के बाद माना जा रहा था कि भाजपा को भारी नुकसान होगा। मगर अब जाट वोट बंटेगा, तो फायदा भाजपा को मिलेगा।

हालांकि यह गणित कितना कामयाब होगा, कहना मुश्किल है। लोकसभा चुनाव नजदीक हैं और उस पर से खट्टर सरकार की नाकामियों और ज्यादतियों की छाया हट जाएगी, दावा नहीं किया जा सकता। फिर, जजपा पर भी वही दाग हैं, जो भाजपा पर हैं, इसलिए जाट मतदाता कितना उसका साथ देंगे, देखने की बात होगी। भाजपा का अन्य पिछड़ा और दलित मतदाता को रिझाने का फार्मूला भी बहुत कारगर नजर नहीं आ रहा।

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