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संपादकीय: विदेश में भारतीय मिशनों पर हमले की कड़ियां, खालिस्तान समर्थकों की फंडिंग पर NIA की नजर

पिछले वर्ष 19 मार्च को लंदन में और 2 जुलाई को सैन फ्रांसिस्को में खालिस्तान समर्थक उग्रवादी तत्त्वों ने भारतीय दूतावास पर दो बार हमले किए थे। इसके बाद एनआइए के एक दल ने आगजनी और बर्बरता की घटनाओं की जांच के लिए अगस्त 2023 में सैन फ्रांसिस्को का दौरा किया था।
Written by: जनसत्ता
नई दिल्ली | Updated: January 02, 2024 07:42 IST
संपादकीय  विदेश में भारतीय मिशनों पर हमले की कड़ियां  खालिस्तान समर्थकों की फंडिंग पर nia की नजर
कई स्थानों पर एनआईए की छापेमारी की जा रही है। (NIA Photo- Express)
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अमेरिका और लंदन में भारत के उच्च राजनयिक कार्यालयों पर हमलों के समय से ही इस बात के स्पष्ट संकेत थे कि उनके पीछे खालिस्तान समर्थकों का हाथ हो सकता है। हालांकि भारत सरकार की ओर से इस मामले में ठोस कदम उठाने के लिए पुख्ता आधार जुटाए जा रहे थे, लेकिन अब राष्ट्रीय जांच एजंसी यानी एनआइए ने उन तैंतालीस खालिस्तान समर्थक आरोपियों की पहचान की है, जो लंदन में भारतीय उच्चायोग और अमेरिका के सैन फ्रांसिस्को स्थित दूतावास पर हमलों में शामिल थे।

इस बीच विदेश में भारतीय मिशनों पर हमले के पीछे साजिशों का खुलासा करने के मकसद से एनआइए ने पचास से ज्यादा जगहों पर छापे मारे। इस समूचे मामले में एक अभिन्न तथ्य यह भी है कि अगर अमेरिका, कनाडा या लंदन में कुछ खालिस्तान समर्थक इतनी गंभीर और आतंकी घटनाओं को अंजाम दे रहे हैं, तो ऐसे समूहों का कहीं न कहीं से वित्तपोषण होता है। इसी की कड़ियां पकड़ने के लिए केंद्रीय जांच एजंसी खालिस्तानी आतंकी संगठनों को धन मुहैया कराने के मामलों पर भी गौर कर रही है।

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गौरतलब है कि पिछले वर्ष 19 मार्च को लंदन में और 2 जुलाई को सैन फ्रांसिस्को में खालिस्तान समर्थक उग्रवादी तत्त्वों ने भारतीय दूतावास पर दो बार हमले किए थे। इसके बाद एनआइए के एक दल ने आगजनी और बर्बरता की घटनाओं की जांच के लिए अगस्त 2023 में सैन फ्रांसिस्को का दौरा किया था। यों कनाडा के साथ-साथ अमेरिका, लंदन औैर आस्ट्रेलिया जैसे देशों में खालिस्तान समर्थक तत्त्व सक्रिय रहे हैं, लेकिन हाल के वर्षों में ऐसे समूहों ने अपनी हरकतें तेज कर दी हैं।

लंदन और सैन फ्रांसिस्को में भारतीय उच्चायोग और दूतावासों पर हमले के जरिए वे अपने मकसद और अपनी मौजूदगी का संदेश देना चाहते थे। विडंबना है कि भारत पहले से ही इस संबंध में अपनी आशंका से कनाडा, अमेरिका और ब्रिटेन आदि को अवगत कराता रहा है कि वहां खालिस्तान समर्थक समूह आतंकी हमलों को अंजाम दे सकते हैं। मगर ऐसा लगता है कि इन देशों में भारत की आशंकाओं को समय पर महत्त्व नहीं दिया गया। नतीजा सामने है कि अमेरिका और लंदन में सबसे सुरक्षित मानी जाने वाली सुरक्षा व्यवस्था के बीच हमलों को अंजाम दिया गया, दूतावास में आग लगाई गई।

इससे यही साफ हुआ कि ऐसी आतंकी गतिविधियां संचालित करने वाले तत्त्वों का मनोबल किस स्तर तक बढ़ा हुआ है, साथ ही यह भी पता चलता है कि इन देशों में हर स्तर पर मजबूत माना जाना वाला खुफिया तंत्र होने के बावजूद इन्हें फलने-फूलने का मौका मिला। भारत की ओर से जब कनाडा में खालिस्तान समर्थक समूहों की साजिशों को लेकर सवाल उठाए जाते हैं, तब वहां एक तरह से इसे लेकर उदासीनता ही दिखाई जाती रही है। जबकि देखा जा सकता है कि कनाडा या अन्य कई देशों में रह कर कुछ समूह भारत में खालिस्तान समर्थक अभियानों की जमीन मजबूत करने की साजिश में लगे हुए हैं।

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यह ध्यान रखने की बात है कि किसी छोटी घटना की अनदेखी ही बड़ी साजिशों को अंजाम देने का आधार बन जाती है। जब दूतावासों पर हमले की घटनाएं सामने आईं, तब कनाडा ने खालिस्तान समर्थकों के विरोध को लेकर सचेत होने की बात जरूर कही, मगर हकीकत यह है कि जब तक भारत के खिलाफ संचालित होने वाली गतिविधियों को रोकने के लिए ठोस कदम नहीं उठाए जाएंगे, तब तक ऐसे आश्वासनों का कोई हासिल नहीं होगा।

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