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संपादकीय: घाटी में AFSPA हटाकर सुरक्षा व्यवस्था पुलिस को सौंपने की तैयारी, लोगों का विश्वास जीतने का अगला कदम

कानून-व्यवस्था राज्य सरकारों के अधिकार क्षेत्र का विषय है। मगर अफस्पा के तहत सशस्त्र बलों की तैनाती की जाती है, तो उससे राज्य के अधिकारों का हनन भी होता है।
Written by: जनसत्ता
नई दिल्ली | Updated: March 28, 2024 02:17 IST
संपादकीय  घाटी में afspa हटाकर सुरक्षा व्यवस्था पुलिस को सौंपने की तैयारी  लोगों का विश्वास जीतने का अगला कदम
इस वक्त जम्मू-कश्मीर में सबसे जरूरी है सरकार और नागरिकों के बीच विश्वास बहाली की।
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यह जम्मू-कश्मीर के लिए बड़ी राहत की बात होगी, अगर केंद्र सरकार वहां से सशस्त्र बल अधिनियम यानी अफस्पा हटा कर नागरिक ठिकानों की सुरक्षा-व्यवस्था पुलिस को सौंप दे। केंद्रीय गृहमंत्री ने इस पर विचार करने का आश्वासन दिया है। जल्दी ही वहां विधानसभा चुनाव कराने और कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी पूरी तरह पुलिस के हाथों में सौंप देने का वचन दोहराया है।

आतंकवाद पर काफी हद तक काबू पाया जा चुका है

सरकार का मानना है कि अब घाटी में आतंकवाद पर काफी हद तक काबू पाया जा चुका है। आतंकी संगठनों को वित्तपोषण करने वाले व्यक्तियों को सलाखों के पीछे डाला जा चुका, उनकी परिसंपत्तियां कुर्क की जा चुकी हैं और उनके बैंक खाते बंद कर दिए गए हैं। कई आतंकी संगठनों पर प्रतिबंध लगाए जाने के बाद उनकी सक्रियता समाप्त हो गई है। अब वहां की पुलिस भी सुरक्षा-व्यवस्था संभालने के मामले में सक्षम हो चुकी है।

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विधानसभा चुनाव की मांग भी जोर पकड़ रही है

हालांकि वहां से अफस्पा हटाने की मांग लंबे समय से की जाती रही है, मगर विशेष राज्य का दर्जा समाप्त होने के बाद जिस तरह वहां अलगाववादी ताकतें सक्रिय हो गई थीं, उसके मद्देनजर अधिक संख्या में सेना को उतारना और अफस्पा को लगाए रखना जरूरी हो गया था। अब वहां विधानसभा चुनाव की मांग भी जोर पकड़ रही है, ऐसे में जैसा कि केंद्र सरकार मानती है, वहां आतंकवाद कमजोर हुआ है, अफस्पा हटाने का फैसला एक बड़ा कदम साबित होगा।

घाटी में सेना पर ज्यादतियों के आरोप लगते रहे हैं

दरअसल, अफस्पा के तहत सशस्त्र बलों को शक के आधार पर किसी की भी गिरफ्तारी, बिना किसी मंजूरी के तलाशी और गोली तक चला देने के अधिकार मिले होते हैं। इससे घाटी में सेना पर ज्यादतियों के आरोप लगते रहे हैं। फर्जी मुठभेड़ों, बड़ी संख्या में नागरिकों के लापता होने, मानवाधिकारों के हनन और बेकसूर लोगों के मारे जाने की ढेरों शिकायतें दर्ज हैं। वैसे भी नागरिक ठिकानों पर सशस्त्र बलों की तैनाती जनतांत्रिक मूल्यों के लिहाज से अच्छी बात नहीं मानी जाती।

कानून-व्यवस्था राज्य सरकारों के अधिकार क्षेत्र का विषय है। मगर अफस्पा के तहत सशस्त्र बलों की तैनाती की जाती है, तो उससे राज्य के अधिकारों का हनन भी होता है। हालांकि इस वक्त जम्मू-कश्मीर में कोई राज्य सरकार नहीं है, पर नागरिक अधिकारों के लिहाज से सशस्त्र बलों की तैनाती और उन्हें अफस्पा का अधिकार दिया जाना उचित नहीं माना जाता है। वैसे भी सेना को नागरिक क्षेत्रों की सुरक्षा का प्रशिक्षण नहीं दिया जाता। उन्हें कानून-व्यवस्था संबंधी मामलों की समझ भी नहीं होती। पुलिस को न केवल नागरिक सुरक्षा, बल्कि अनेक स्थानीय विवादों को निपटाने की भी जिम्मेदारी होती है, वह सशस्त्र बलों की मौजूदगी से बाधित होती है।

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घाटी में सशस्त्र बलों की सघन मौजूदगी की वजह से स्थानीय नागरिकों में रोष देखा जाता रहा है। इससे सरकार की नागरिकों से दूरी भी बढ़ती है। अगर नागरिक ठिकानों से सेना को हटा दिया जाता है, तो सरकार की योजनाओं की पहुंच भी स्पष्ट नजर आएगी। स्वाभाविक है, इससे नागरिकों का सरकार पर भरोसा बनेगा। इस तरह विधानसभा चुनावों के बाद सरकारी गतिविधियों के लिए एक समतल जमीन बन सकेगी।

इस वक्त जम्मू-कश्मीर में सबसे जरूरी है सरकार और नागरिकों के बीच विश्वास बहाली की। इसके बिना स्थानीय युवाओं में भटकाव को दूर करना और उन्हें आतंकी गतिविधियों से मोड़ कर मुख्यधारा में लाना कठिन ही बना रहेगा, क्योंकि अफस्पा के चलते वहां के लोगों के भीतर अनेक प्रकार की कड़वाहटें भरी हुई हैं।

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